बिनसर यात्रा - कविता
हिंदी कविता
ज्ञात हुआ गया था भ्रमण हेतु बिनसर
८ तारीख मई १९९३ को छात्र छात्राओ का समूह
साथ थे आदरणीय गुरुजन, बना एक परिवार
नाम सार्थक करते बढ़ते जाते गुरु श्री अभय
अनुरूप अर्थ के अत्यधिक लगाव है गुरु श्री गिरिजा को
नपा तुला हर कदम था हिमालय के वक्षस्थल पर
आनंददायक अनुभव का अहसास होता हर पग पर
मंद मंद समीर भी कर रही हो मानो हर्ष करतल
यकायक सम्मिलित हो आया समूह मेघों का भी
लगा बरस बरस दिखाने अपनी प्रसन्नता
कड़क कड़क कर विधुत भी मानो कर रही हो नृत्य
बढ़ रहा था समूह भाँति भाँति के गान सुनाता
भय का नही था नामोनिशान वहाँ पर
युवाशक्ति में हो रहा नित नवसंचार
पीछे रह जाते साथियों के लिए रुकते जाते
मार्ग दुश्वार होने परहाथ पकड़ आगे ले जाते
पहुँच गये वन विभाग के विश्रामालय तक
तत्काल व्यवस्था की अग्नि जलाने की
कुछ हाथ तपते, सर्दी दूर भागाते
कुछ लगे थे पेय पदार्थ बनाने में
तब ही सब बैठ पाए आराम से
फिर शुरू हुआ पाक कला का एक नया दौर
तब पता चला सबकी गुणवत्ता का
मिलकर काम करने में आता अलग ही आनंद
भोजन के उपरांत भी नींद आँखों में कहाँ
हुड़दंग काटते , गाने गाते ही गुज़री रात फिर
प्रातः भ्रमण को निकल पड़े चहुँ दिशाओं में
लगे अपलक निहारने नैसर्गिक सुंदरता को
कुछ ने बंद किया उन्हे कैमरे में
कुछ यूँ ही रस पानकर रहे थे इस सुधा का
सूक्ष्म जल पान के बाद की गयी तैयारी
अब आ गयी बेला विदा की
थके थके मन से अब विदा लेते
फिर आएँगे ऐसा मन में विचारते
तब फिर सबके मन प्रफ्फुलित हो गये
नव उत्साह उमंग से चल पड़े बिनसर से दूर
हो गया अल्प समय में ही जितना नेह
राह भर बातें करते, मौज मानते
आ चुके भीमताल के प्रांगड़ में
आभारी हैं गुरुजनों के जिनके प्रयास से
हम हिमालय की उँचाइयों को छूने जाते।
सन १९९३
लेखिका की कलम से
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धन्यवाद 🙏
- प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
धन्यवाद 🙏
- प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

Nice Poem!
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