आक्रोश पर्वत का - कविता
आक्रोश पर्वत का
हिंदी कविता
पर्वतों की सैर को सैलानी बहुतेरे आते
भीषण गर्मी से हटकर ठंडक यहाँ पाते
नामी होटलों में ठहरते , आनंद उठाते
जहां के कर्मचारी उन्हे बातों से रिझाते
कि सर यहाँ के मौसम के क्या हैं कहने
पर्वत के झोंके सुनाते हरदम मधुर तराने
मैडम, मौसम की तो है अजीब ख़ासियत
त्वचा को प्रदान करती कुदरती गुलाबियत
शीत ऋतु में चलती यद्यपि हवा सर्द
वातावरण होता श्वेत बिछ जाती ज़ब बर्फ
तब सब लूटते मज़े स्कीइंग करते
बर्फ के गोले की मार से घायल करते
ग्रीष्म ऋतु की तो बस निराली है बात
मन को करे शीतल, देते ताज़गी झोंके वात
जब तापमान होता अपनी अधिकतम सीमा पर
और देश के मैदानी इलाक़ों में चलते एसी कूलर
अर्थात देश में सर्वत्र होती गर्मी प्रचंड
पर्वतों पर अहसास दिलाती सूक्ष्म ठंड
कि वास्तव में पर्वतों का जीवन है काफ़ी सुहाना
हर पग पर है खूबसूरती, हर झोंका सुनाता तराना
सैलानियों को दिखाते वो ग्राम सुंदर सा
ज़हां का ज़ीवन लगता कुछ मोहक सा
कोई नहीं जानता कि पहाड़ क्यों नहीं पनप सका
वहाँ जड़ फैला चुका है सुरूर दारू का
मर्द फूंकता बीड़ी दिन भर गाँव की चौपाल में
औरत का जीवन बटता खेत और घर में
सुबह सवेरे करके घर का कार्य निकल पड़ती
वो खेतों की ओर, श्रम से हर पौंधों को सींचती
तब कहीं परवरिश कर पाती वो बच्चों की
मर्द रात्रि को लगाते दारू की चुस्की
औरत का ज़ीवन तो घर की चक्की में पिसता
और यूँ ही ख़त्म हो जाता , कोई ना पूछता
कोई ना पूछता कि मर्द तू बना क्यों ना लायक
हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठा है रे कायर
उठ बना अपने घर को भी चमन
अपनी ब्याहता के पूरे कर कुछ स्वप्न
वास्तव में ज़रूरत है शिक्षा के प्रकाश की
औरतों को कुछ पग निडर उठाने की
औरतों का गहना है सहनशीलता
पर मर्द से बेबात दबना है कायरता
सबको मिलना चाहिए समान अधिकार
तब ही वतन में आएगी बहार
पहाड़ सही अर्थों में तब शुरू करेगा दमकना
सर्वत्र बिखरा होगा सोना ही सोना
...मई १९९३
भीषण गर्मी से हटकर ठंडक यहाँ पाते
नामी होटलों में ठहरते , आनंद उठाते
जहां के कर्मचारी उन्हे बातों से रिझाते
कि सर यहाँ के मौसम के क्या हैं कहने
पर्वत के झोंके सुनाते हरदम मधुर तराने
मैडम, मौसम की तो है अजीब ख़ासियत
त्वचा को प्रदान करती कुदरती गुलाबियत
शीत ऋतु में चलती यद्यपि हवा सर्द
वातावरण होता श्वेत बिछ जाती ज़ब बर्फ
तब सब लूटते मज़े स्कीइंग करते
बर्फ के गोले की मार से घायल करते
ग्रीष्म ऋतु की तो बस निराली है बात
मन को करे शीतल, देते ताज़गी झोंके वात
जब तापमान होता अपनी अधिकतम सीमा पर
और देश के मैदानी इलाक़ों में चलते एसी कूलर
अर्थात देश में सर्वत्र होती गर्मी प्रचंड
पर्वतों पर अहसास दिलाती सूक्ष्म ठंड
कि वास्तव में पर्वतों का जीवन है काफ़ी सुहाना
हर पग पर है खूबसूरती, हर झोंका सुनाता तराना
सैलानियों को दिखाते वो ग्राम सुंदर सा
ज़हां का ज़ीवन लगता कुछ मोहक सा
कोई नहीं जानता कि पहाड़ क्यों नहीं पनप सका
वहाँ जड़ फैला चुका है सुरूर दारू का
मर्द फूंकता बीड़ी दिन भर गाँव की चौपाल में
औरत का जीवन बटता खेत और घर में
सुबह सवेरे करके घर का कार्य निकल पड़ती
वो खेतों की ओर, श्रम से हर पौंधों को सींचती
तब कहीं परवरिश कर पाती वो बच्चों की
मर्द रात्रि को लगाते दारू की चुस्की
औरत का ज़ीवन तो घर की चक्की में पिसता
और यूँ ही ख़त्म हो जाता , कोई ना पूछता
कोई ना पूछता कि मर्द तू बना क्यों ना लायक
हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठा है रे कायर
उठ बना अपने घर को भी चमन
अपनी ब्याहता के पूरे कर कुछ स्वप्न
वास्तव में ज़रूरत है शिक्षा के प्रकाश की
औरतों को कुछ पग निडर उठाने की
औरतों का गहना है सहनशीलता
पर मर्द से बेबात दबना है कायरता
सबको मिलना चाहिए समान अधिकार
तब ही वतन में आएगी बहार
पहाड़ सही अर्थों में तब शुरू करेगा दमकना
सर्वत्र बिखरा होगा सोना ही सोना
...मई १९९३
लेखिका की कलम से
दोस्तों,
भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।
धन्यवाद
🙏 आभार
प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें