आँखें - कविता
आँखें
हिंदी कविता
आँखों के सिवा, कोई दरिया हो समंदर हो,
हर डूबने वाले को मालूम है गहराई।
तन्हाई हो या कि मेला हो,
साथ हो या विरह हो,
आँखों से झलकता,
बयान होता,
शिकवा भी, मनुहार भी,
क्रोध भी, प्यार भी,
शैतानियत भी, मासूमियत भी,
शिकायत भी, खिलखिलाहट भी,
नाराज़गी भी, मुस्कुराहट भी,
शर्मिंदगी भी, गौरवान्वित भी,
कठोर भी, कोमल भी,
जड़ भी, कोपल भी,
अहंकार भी, विनम्र भी,
लुप्त भी, साक्षात भी,
अनजानी भी, पहचानी भी,
नादानी भी, मानिनी भी,
सार है, मर्म है, सभी रसों का शृंगार है,
आँखों की पलकों में समाया समस्त संसार है।
१ अगस्त, २०१३
लेखिका की कलम से
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धन्यवाद 🙏
- प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
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- प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

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