हिन्दी; सदा ही, इक दिन की बात नहीं - कविता
प्रयोग हिन्दी का मात्र एक दिन के लिए नहीं,
प्रयोग सफल/असफल हो जाते हैं.
ये तो मातृभाषा है, पहचान है,
भारत की संपूर्ण विश्व में.
जीवन की परिभाषा है,
हर जन की अभिलाषा है.
आधार है, माध्यम है
अभिव्यक्ति का.
फिर क्यों हिन्दी बोलने, समझने, जानने से
शर्मिंदा है मनु संतान?
उठ, हाथ से हाथ जोड़, बना मानव श्रंखला,
संवाद स्वभाषा में कर,
जन-जन अपनाकर हिन्दी को,
नई उचाई तक ले जाए.
कर तिलक हिन्दी से
भारत माता का मस्तक.
गौरवान्वित करे स्वदेश को,
अभिमान कर हिन्दी पर.
एक स्पष्ट बात भारत वासियों से,
कि अर्थ का अनर्थ ना निकाल ले कोई,
अन्य भाषा का ज्ञान आवश्यक है,
समय की आवश्यकता भी है.
किंतु स्वभाषा को तुच्छ समझने की प्रवृति,
पर लगाम लगाना भी ज़रूरी है।
१४ सितम्बर, २०१३
प्रयोग सफल/असफल हो जाते हैं.
ये तो मातृभाषा है, पहचान है,
भारत की संपूर्ण विश्व में.
जीवन की परिभाषा है,
हर जन की अभिलाषा है.
आधार है, माध्यम है
अभिव्यक्ति का.
फिर क्यों हिन्दी बोलने, समझने, जानने से
शर्मिंदा है मनु संतान?
उठ, हाथ से हाथ जोड़, बना मानव श्रंखला,
संवाद स्वभाषा में कर,
जन-जन अपनाकर हिन्दी को,
नई उचाई तक ले जाए.
कर तिलक हिन्दी से
भारत माता का मस्तक.
गौरवान्वित करे स्वदेश को,
अभिमान कर हिन्दी पर.
एक स्पष्ट बात भारत वासियों से,
कि अर्थ का अनर्थ ना निकाल ले कोई,
अन्य भाषा का ज्ञान आवश्यक है,
समय की आवश्यकता भी है.
किंतु स्वभाषा को तुच्छ समझने की प्रवृति,
पर लगाम लगाना भी ज़रूरी है।
१४ सितम्बर, २०१३
लेखिका की कलम से
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धन्यवाद 🙏
- प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
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- प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

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