रिश्ते जी ले - कविता


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रिश्ते जी ले 

हिंदी कविता

आज का वीरानापन, 
मन का रीतापन।
भीगा था बचपन,
अल्हड था यौवन। 
सूना  है आँगन,
यादें समेटे प्रांगण।
कोयल को ढूंढे मन,
कोने में रिक्त है आसन। 
कौवे की  पुकार को तरसे जन,
हालात का मारा मन। 
अतिथि के न आने से तरसा मन,
दो बोल के भूखे मन-प्रान। 

जंगलात में पशु तन्हा,
शहरों में अकेला आदम।
भागमभाग ज़िन्दगी,
समय का अभाव।
हंसी से परे,
मशीन ही बने।
हर पल सोचना,
कि पाना है मंज़िल।
अरे ! बस बहुत हुआ।
थम जा! अब रुक भी जा।
आत्ममंथन कर,
कि जिन्दगी में ठहराव जरूरी है।

कृत्रिम चेहरे बनावटी बातें ,
दिखावे  का भव्य महासागर ,
शुष्क हुए सब रिश्ते नाते, 
संवेदनारहित भावविहीन मानव,
पीछे पड़ी शुष्क पत्ती
को देख तनिक रुककर,
आज इस सूखे पेड़ को,
जल से अभिसिंचित कर ले।
कुदरत के लचीलेपन से,
मिले अपनापन।
नेह में भीगे तन-मन,
प्रफ्फुलित हो जीवन। 

जिंदगी चार दिनों का खेल,
न रह तू किसी से अबोल।
स्नेह प्यार से,
रिश्ते संवार दे।
कुम्हला गए रिश्ते,
को नवजीवन दे।
दिल के सभी मतभेद,
मिटा कर जी ले।
आज! बस आज ये कर जा।
रिश्तों को अपने ताज़ा कर ले।
कल किसका हुआ कभी 
आज, बस आज खुलकर रिश्ते जी ले।

लेखिका की कलम से 

दोस्तों,
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धन्यवाद 
🙏 आभार
प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'



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