ज़िंदगी कड़वाहट का प्याला है - कविता
ज़िंदगी कड़वाहट का प्याला है
हिंदी कविता
ज़िंदगी कड़वाहट का प्याला है,
सुख तो क्षणिक पाहूना है.
कड़वेपन में मिठास का अनुभव है,
पर कड़वाहट का भारी पाला है.
ज़िंदगी हसीन प्रतीत होती थी,
रंगीनियों से दमकती लगती थी .
ज़िंदगी बहार सी लगती थी,
हर तरफ आनंद की फुहार लगती थी.
पर ज़िंदगी क्या वास्तव में ऐसी है?
ज़िंदगी पहेली सरीखी है,
उलझनों का अजब मेला है.
दुखों का पैगाम है सेहरा में.
एक नन्ही सी ज़ान उलझ गयी,
क्या करूँ क्या ना करूँ?
समझ ना पाई.
सब तरफ पूछा पता मंज़िल का,
पा ना सकी वो संतोषज़नक हल.
यथार्थ में ज़िंदगी ज़ी ही सका वो,
जिसने सुकरात बन ज़िया उसे.
बेख़टके ज़हर को पिया उसने.
क्योंकि सामना करने से ही,
विश्वास जागता है.
दूर बैठ कर तो पानी से भी डर लगता है.
आग के बीच में ही जलन होती है.
इस कड़वाहट की दावानल से न बच सका,
मानव की तो बिसात क्या, देवता अपवाद नहीं.
शिव ने पी ज़हर, संचित किया कंठ में,
नाम मिला तब नीलकंठ.
इतना सब कहने का सार बस यही,
कि ज़िंदगी को जी सको जिंदादिली से,
क्योंकि ज़िंदगी कब नज़रें चुरा ले पता नहीं?
भविष्य कब जाना है किसने ?
आत्मविश्वास से कर सामना मुश्किलों का,
कि कड़वाहट का अजब आनंद है.
जलन का अजब नशा है.
निराशा का अजब सुरूर है.
इस तरह ज़िंदगी सम्मिलन है-
कुछ खट्टी, कुछ मीठी,
कुछ तीखी, कुछ कड़वी बातों का…....
८ जुलाई, १९९३
लेखिका की कलम से
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धन्यवाद 🙏
- प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
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- प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

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