होली ऐसे कैसे हो ली - कविता

Holi aise kaise ho li kavita pic

होली ऐसे कैसे हो ली!

हिंदी कविता

होली की मस्ती हो, 

धमाल हो, कुछ कमाल हो,

रंग से सराबोर हो, 

गुलाल की फुहार हो,

मस्ती का आलम हो, 

भांग का खुमार हो,

गुजिया की मिठास हो, 

दही बड़े की चाट हो,

कांज़ी का तीखापन हो, 

साथ अपनों का हो,

रंग से लिपे पुते मस्ताने,

लोगों का हुजूम हो।

उड़ता रहे गुलाल, 

बरसता रहे  रंग, 

बिखरती रहे मुस्कान, 

मन में उठे तरंग, 

रंग नीला-पीला-लाल-गुलाबी, 

ना माने कोई बंधन, 

होली के बहुरंगों में 

हर्षाता रहे तन मन। 

अभी तो इक टीका गुलाल का 

और लो जी हो गयी होली!

मेरी तो समझ से परे है,

होली ऐसे कैसे हो ली! 



अब ना घोला जाता 

टेसू के फूलों को,

ना घोंटा जाता 

घंटों ठंडाई को,

अब ना सुनाई देती 

वंशी की स्वर लहरी,

वो पाजेब की, पायल की,

रुनझुन की मधुर तान,

ना बजते ढोल-मृदंग, 

सजती नहीं अब संगत,

ना कसी जाती ढोलक,

बजते नहीं मंजीरे,

फ़ाग भी होने लगे विलुप्त,

कि पड़ती नहीं अब ज़ोरों की थाप है।  

फ़ाग बिन होली रहती थी अधूरी,

अब तो ऐसी ही मने है अब होरी।  

क्यों इतनी अजनबियत, 

क्यों भरी दिलों में खटास है ! 

डाइट-डाइट कर,

होली से गायब मिठास है। 

ना उठती रसोई से पकवानों की खुशबू ,

ना ठिठकते कदम राहगीरों के हैं,

मेरी तो समझ से परे है ,

होली ऐसे कैसे हो ली!



ना रिश्तों में चुहल,

ना कोई उत्सुकता है,

उमंग से परे, 

अजनबी से बने,

अपनेपन का सर्वत्र अभाव है,

कृत्रिमता का ही प्रमुख भाव है। 

ना ताज़गी का एहसास है ,

ना बच्चों में ही उल्लास है,

कोई हर्बल हर्बल का शोर मचाये,

रंगों, गुलाल से भगत-छिपता फिरे। 

किसी को स्किन इन्फेक्शन 

होने का घोर अंदेशा है,

जल बचाओ, पानी बचाओ  

कहकह कर, शोर मचाकर ,

त्यौहार की धुली 

अब तो रौनक है। 

सूखे सूखे ही मने अब होली है ,

होली का ये कैसा ही आगाज़ है। 

रंग से डरते 

अपनेआप में गुम हर कोई है,

ना  दिखाई दे  रंगे-पुते दीवानों की 

अब होली की टोली , 

मेरी तो समझ से परे है ,

होली ऐसे कैसे हो ली!



१५ मार्च २०१४ 
अपराह्न १:३९ बजे 

लेखिका की कलम से 

दोस्तों,
भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।
धन्यवाद 
🙏 आभार
प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट

हिंदी साहित्य का महत्व: इतिहास, काल विभाजन और आधुनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता