सीमा: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की? - कविता

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सीमा: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की?

हिंदी कविता 

अभी अभी ये सवाल मन में आया,
क्यों मैं ही , आखिर मैं ही क्यों?
उदार होना रास न आया ,
मन उदास हो आया। 
सब ने अपना समेटा  है 
छिपाया है , कहो तो भड़के हैं 
और-
क्योंकि मैं उदार तो 
आक्षेप का ग्राही मैं ही?
पहरा शब्दों की सीमा का हो
तो 
शायद मनमानी रुके 
हरेक को लोकतंत्र में 
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है 
कदाचित मतलब नहीं कि 
निशाना साधा जाये लगातार 
गहराइयों को टटोले बिना 
सच को जाने  बिना 
समाधान- 
रोक ज़रूरी है 
हर वक़्त का मज़ाक 
लगे असहनीय 
फिर कमियां कहाँ नहीं 
खूबियां हरेक में तो 
ज़रुरत है 
मिलजुलकर, एकजुट होकर,
एक ऐसा पुष्पों का 
गुलदस्ता बनने की,
जहाँ हो 
भांति भांति के कुसुम 
अपने अपने शूलों के साथ 
परन्तु दंश इतना भी न हो कि 
कोई भी पुष्प मुरझा जाये। 

लेखिका की कलम से 

दोस्तों,
भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।
धन्यवाद 
🙏 आभार
प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

टिप्पणियाँ

  1. बेनामी4/2/26, 4:34 pm

    very nice expressions

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    उत्तर
    1. प्रियंका की कलम से 🖋8/2/26, 1:30 pm

      बहुत शुक्रिया आपका 🙏🙏

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  2. उत्तर
    1. बहुत शुक्रिया आपका समीक्षा हेतु 🙏🙏

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    2. बहुत शुक्रिया आपका समीक्षा हेतु 🙏🙏

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