माँ कभी अशुभ नहीं होती है - कहानी

माँ कभी अशुभ नहीं होती है – सामाजिक संदेश देती हिंदी कहानी

माँ कभी अशुभ नहीं होती है

 हिंदी कहानी 

दीनानाथ जी और सुमित्रा जी ने कुछ दिन पहले ही अपने छोटे बेटे की शादी की। छह-सात दिनों के बाद सुमित और नीता  हनीमून से लौट कर आए। सुमित की नौकरी दूसरे शहर में है तो एक दो दिन रुक कर वे वहां चले गए।

घर में रह गए दीनानाथ जी, सुमित्रा जी, बड़ा बेटा मोहित, बड़ी बहू मीरा और उनका चार साल का बेटा राज  अमित ने अपनी शादी के दो साल के भीतर ही घर ले लिया था। जिन्दगी फिर से बंधे-बंधाए ढर्रे पर चलने लगी।
सुमित्रा जी को खूबसूरत रंग जैसे हरा और लाल रंग बहुत अच्छे लगते हैं। उन्हें बार्डर वाली साड़ियां बेहद पसंद हैं। जल्दी से किसी का लाया कपड़ा भाता नहीं  है, सुमित्रा जी को।

दीनानाथ जी और सुमित्रा जी साल में करीब पंद्रह दिनों के लिए सुमित के यहां जाते और वहां रहते। दीनानाथ जी का मन इतने दिनों में ही भर जाता और वो वापस जाते।

सुमित्रा जी जरूर आकर दिखाती कि नीता ने उन्हें बायना में क्या क्या दिया जो भी त्योहार उनके सामने पड़े और जो भी पिछले साल भर में निकले उनके भी।

मीरा भी अपने हिसाब से सभी त्योहारों के बायने सासु माँ को शादी के बाद से दिया करती है। 

कुछ त्योहार जैसे करवाचौथ, होई अष्ठमी, तीज, बड़मावस, बरसाते, सकठ ( संकट चतुर्थी) आदि त्योहारों में सास या जेठानी या ननद या ससुराल पक्ष की बड़ी बूढ़ी औरतों को या फिर बेटा या भतीजे को पूरी-पुए मिठाई एवम् साथ में श्रद्धानुसार कपड़ा, पैसा , जेवर दिया जाता है , उसे बायना कहते हैं। क्रमानुसार लिखा है, जैसे किसी की सास हों तो जेठानी या ननद या उपरोक्त अनुसार ही अधिकतर घरों में बायने का चलन है।

सुमित और नीता  भी एक प्यारे से बेटे के मम्मी पापा बन गए। बाबा दादी ने पोते राहुल के लिए दिल खोलकर फंक्शन किया, राज  के होने में जैसे किया वैसे ही। दो साल बाद मीरा और अमित को भी पुत्री रत्न की प्राप्ति हुई। बाबा दादी ने इस बार भी अपनी पोती सिया के लिए भारी भरकम फंक्शन का आयोजन किया। 

सभी कुछ अच्छा जा रहा था कि अचानक से हृदयाघात से दीनानाथ जी चल बसे। एक तूफान सा गया सबकी जिंदगी में। मीरा -अमित और कनिका-सुमित ने मांजी को सम्भाला। कुछ दिन रुक कर नीता  और सुमित वापस चलें गए।

मांजी लाल हरे रंग पहनने से मना करने लगी। मीरा  एक पढ़ी लिखी समझदार महिला है तो उसने प्यार से मांजी को बताया कि मांजी को स्वयं और पापाजी को भी मांजी पर ये रंग बढ़िया लगते थे। मांजी मीरा की बात और उसके पीछे छिपी उसकी भावना समझ कर मान गईं और इस तरह मांजी अपने पुराने ढंग से रहने लगीं।

कुछ समय पश्चात राज   का जन्मदिन पड़ा। फैमिली ग्रुप में मीरा ने फोटो शेयर किए।

फोटो देख नीता  बोली," दीदी, मांजी को हल्के रंग पहनाया करो। पापाजी के बाद उन्हें ये रंग नहीं पहनने चाहिए।"

सुनकर मीरा   को उसकी छोटी सोच पर अफसोस हुआ पर मीरा ने उसको भी अपने विचारों से अवगत करा दिया। हां, मांजी को ये बात नहीं पता चलने दी।

थोड़े दिन बाद नीता  की  प्रेगनेंसी सुनकर मांजी उसकी देखभाल के लिए वहां गईं। पूरे आठ महीने उसकी देखभाल की। नवें महीने में नीता  की मम्मी भी वहां गईं घर में आई एक और नन्ही परी और उसका नाम रखा गया अन्वी। नामकरण में मोहित, मीरा और बच्चे भी गए। नामकरण धूमधाम से करवा कर दादी की तरफ से भी सब बढ़िया दे दिला कर मांजी अमित के साथ लौट आईं। नीता की मम्मी दो महीने अभी नीता  के पास ही रुकने वाली थीं।

इस बार नीता  ने जितने बायने पड़े थे साल भर में , वो मीरा  को दिए। मीरा   ने कहा भी कि ये हक तो मांजी का है, तो नीता से पहले उसकी मम्मी ने कहा कि क्योंकि सुमित्रा जी अब विधवा हैं , अशुभ हैं, तो उन्हें ये बायना नहीं दिया। नीता  ने भी अपनी मम्मी की हां में हां मिलाते हुए कहा कि मीरा भी दें बायना सुमित्रा जी को।

जिसपर मीरा ने दो टूक जवाब देकर माँ -बेटी का मुंह बंद कर दिया कि, "माँ कभी अशुभ नहीं हो सकती बच्चों के लिए। मैं शुरू से मांजी को देती आई हूँ और हमेशा उनको ही दूंगी।"

नीता  और उसकी मम्मी ने फिर भी मीरा से ये कहा,"देख लो कहीं कुछ ग़लत हो जाए। एक विधवा को बायना दे रही हो तुम।"

मीरा ने अब सोच लिया कि इनको समझाना व्यर्थ है, बस इतना कहा, "आप चिंता करें।"

घर आने के बाद मीरा ने गौर किया कि मांजी हल्के रंग की साड़ी ही रोज़ाना पहन रही हैं।

मीरा ने हरे रंग की साड़ी निकाल कहा," मांजी, ये पहनिए ये बहुत अच्छी लगती है आप पर। "

मांजी ने साड़ी वापस करते हुए कहा, "नहीं, अब  मैं ऐसे ही रंग पहनती हूँ  यह रंग मुझ पर अब भले नहीं लगते हैं।"

"पर मांजी आपको तो ये रंग पसंद हैं।" मीरा  हैरानी से बोली

"नीता  ने भी कहा है और उसकी मम्मी ने भी समझाया कि अब मैं ऐसे रंग पहना करूं।" मांजी ने बताया

"क्या?" मीरा  को अब कुछ समझ में आने लगा।

"ये देखो, अन्वी के नामकरण में समधन जी ने कितनी सही रंग की साड़ी दी है। तुम भी ऐसे ही दो-एक साड़ी ले आना। ऐसे ही रंग पहनूंगी मैं अब।" मांजी ने साड़ी मीरा   की ओर बढ़ाते हुए कहा

मीरा ने देखा कि एक बहुत ही अजीब सी साड़ी, जिसका रंग कुछ नीला-बैंगनी और मटमैले भूरे रंगों का  मिला-जुला है, कोई डिज़ाइन कुछ बस खड़ी तिरछी कहीं कहीं पर लाइनें बनी हैं।

अमित भी ऑफिस से आकर सास-बहू की बातें सुन रहा था। वो बोला,"मम्मी, ये भी कोई साड़ी है पोता लग रही है, कामवाली भी लेने से मना कर देगी।"

मीरा ने वो साड़ी हटाई और हरी साड़ी पकड़ाते हुए कहा, "हमारी मांजी वैसे ही रंग पहनेंगी जैसे उनको हमेशा से पसंद हैं। कोई उनको आर्डर या जबरदस्ती नहीं कर सकता कि उनको कैसे रंग पहनने चाहिए। हमें अपनी मांजी पुरानी वाली ही चाहिए।"

"पर मीरा   समाज क्या कहेगा?" मांजी बोली

"समाज जबरन निर्धारित नहीं कर सकतामम्मी। और आपके बेटे-बहू आपके साथ हैं। आप जैसे पहले साड़ी पहनती थी वैसे ही पहनोगी।" अमित बोला

"हम भी आपके साथ हैं, दादी।छोटी सी सिया, राज के साथ सुर में सुर मिलाते हुए बोली।

सुमित्रा जी की आँखों में आंसू गए। और उन्होंने अपने परिवार को बाहों में भर लिया।

कुछ दिनो बाद तीज का त्योहार आया। मीरा ने सुमित्रा जी को पूजा के बाद बायना दिया।

सुमित्रा जी चौंककर पीछे हटते हुए बोली," मीरा, बायना राज को दो, मुझे नहीं।"

मीरा   ने हक से बायना उनके हाथ पर रखकर पैर छुए और कहा, "मांजी, माँ बच्चों के लिए हमेशा शुभ होती है। आप आशीर्वाद दीजिए कि मैं हमेशा आपको बायना देती रहूँ"

मांजी ने मीरा  को ढेरों आशीर्वाद देते हुए कहा , "नीता ने बायना देना छोड़ दिया पापा के जाने के बाद से।"

मीरा   बोली, "मांजी मुझे मालूम है पर मैं दकियानूसी बातों को नहीं मानती हूँ "

मांजी को अपनी बहू मीरा की सोच पर नाज़ हो आया। बोली,"मैंने जरूर पिछले जन्म में मोती दान किए होंगे जो मुझे तुम जैसी बहू मिली।"

इस बार सास-बहू के बीच में अमित और बच्चे नहीं आए वो लोग दूर से ही देख रहे थे और अमित को मीरा जैसी जीवनसंगिनी पर गर्व और प्यार दोनों ही गया।

लेखिका की टिप्पणी

दोस्तों, क्यों समाज किसी औरत के पति की मृत्यु के बाद उसके जीवन को बेरंग करने पर लग जाता है? कोई माॅ॑ विधवा होने पर अपने बच्चों के लिए अशुभ कैसे हो सकती है? ये दो सवाल इस कहानी को जामा पहनाते वक्त मेरे दिमाग में थे। और मैं इन बातों को सिरे से नकारती हूॅ॑। पहले ही किसी अपने के खोने से दुखी इंसान के जीवन से रंग भी छीन कर उसकी जिंदगी को बदरंग कर दो, कहां की इंसानियत है ये? यह सब लोगों की छोटी सोच को दर्शाता है। साथ ही मेरा ये मानना है कि माँ कभी अशुभ या अपशगुनी नहीं हो सकती है। वो सिर्फ और सिर्फ बच्चों का भला चाहती है और उनसे प्यार करती है। माँ का सम्मान करें। और ऐसी परिस्थितियों में उनके सहारा बनें नाकि उनको किनारा कर दें।

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🙏 आभार

✍️ लेखिका के बारे में

प्रियंका सक्सेना ‘जयपुरी’ समकालीन हिंदी साहित्य में सक्रिय लेखिका हैं। वे कविता, ग़ज़ल, कहानी और विचारात्मक लेखन में रुचि रखती हैं। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, मौन के अर्थ, प्रेम की नाज़ुकता, जीवन की क्षणभंगुरता और रिश्तों की जटिल भावनाएँ सूक्ष्मता से उभरती हैं। पारंपरिक शिल्प को आधुनिक दृष्टि से जोड़ते हुए, वे शब्दों में सादगी और भावों में गहराई रचती हैं। उनकी रचनाओं में आत्मसंवाद, विरह और अस्तित्व के प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरते हैं, जो पाठक को भीतर तक छू जाते हैं।

“प्रियंका की कलम से” उनके साहित्यिक लेखन और भाव-अभिव्यक्ति का सजीव मंच है।

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