ससुराल में मायके का एहसास!

 "कहीं जा रही हो क्या साक्षी?" अमिता जी ने सुबह ग्यारह बजे अपनी बहू को तैयार होते देखकर पूछा

"जी मम्मी जी, मेरी बचपन की सहेली कविता का अभी थोड़ी देर पहले फोन आया था, आप पूजा कर रही थीं| कविता एक कान्फ्रेंस के लिए यहाँ आई है| शाम को चली जाएगी तो मैंने सोचा अभी वो फ्री है तो मिल कर आती हूँ।" साक्षी ने बताया

"अरे, यहीं बुला लो कविता को| हम भी मिल लेंगे और साथ में लंच कर लेंगे। " अमिता जी ने साक्षी से कहा

साक्षी खुशी से बोली, "सच मम्मी जी! बुला लें उसको?"

"हाँ, साक्षी क्यों नहीं? देखो, बेटा माना तुम्हारी शादी को अभी कुछ महीने ही हुए हैं | पर पिया,तुम्हारी ननद, की भी सहेलियाँ घर आती थीं और खाना पीना होता था| अभी पिया की शादी हुए भी दो साल हो गए हैं तो उसकी सहेलियों का आना भी कम हो गया है| आज अच्छा लगा कि तुम्हारी सहेली आ रही है|" अमिता जी अपनी रौ में बोली जा रही थीं

 सहसा रुक कर वो बोली,"ये सब बातें होती रहेंगी| पहले तुम अपनी सहेली को बोल दो लंच के लिए| "

"जी मम्मी जी,अभी फोन करती हूँ| "

फोन पर कविता को आमंत्रित कर साक्षी और अमिता जी ने मेन्यू निश्चित किया| 

साक्षी ने अमिता जी को आराम करने को बोला और कहा अब वो बनाना शुरू करती है| डेढ़ घंटे में करीब एक बजे तक कविता आ जाएगी| 

अमिता जी ने कहा," साथ मिलकर करते हैं| तो जल्दी काम हो जाएगा| और तुम भी सहेली के साथ समय बिता सकोगी, ज्यादा थके बिना| "

कविता के आने तक दोनों ने सब तैयार कर लिया| खाना साथ खाकर अमिता जी ने दोनों को अकेले छोड़ दिया| कविता और साक्षी ने जमकर बातें की| जाते जाते कविता अमिता जी की खूब तारीफ साक्षी से कर गई| अमिता जी से अपने शहर घूमने का वादा लेकर गई|

शाम की चाय पर सास-बहू अपने अपने प्याले लेकर लिविंग रूम में बैठी|

शुक्रिया बोलते हुए साक्षी ने कहा,"आपने आज मुझे मेरे मायके का एहसास करवा दिया| दिल से धन्यवाद, मम्मी जी|"

"साक्षी, बेटा मैंने कोई एहसान नहीं किया है| तुम अपने माँ-पापा की तरह हमें सम्मान देती हो| घर को अपना लिया है तुमने| जब कोई लड़की विवाह के बाद एक नए घर में, नए परिवेश में कदम रखती है तो सब उससे तो यह आशा करते हैं कि वो सब को अपनाकर ससुराल के माहौल में ढल जाए| परन्तु कोई ये भी तो सोचे कि नई आई बहू को भी हम भी समझें, उसे अपनापन का एहसास करवाएं| मैंने हमारा वहीं कर्तव्य निभाया है और आगे भी मैं तुम्हें इस घर में कभी मायके की कमी महसूस न होने दूँगी| मेरे लिए जैसी पिया है वैसी ही तुम हो|" अमिता जी ने बड़े साफ अन्दाज में अपनी बात समझाई

साक्षी, अमिता जी, से उनकी बातों से बहुत प्रभावित हुई| उनके आदर्शों और उसूलों पर चलने का वादा मन ही मन में स्वयं से कर लिया उसने|  

दोस्तों, सच ही है अगर हर लड़की को अपने मायके जैसा माहौल ससुराल में मिल जाए तो नए घर परिवार को अपनाने में आसानी होती है| बस अमिता जी की सोच को समझने की देर है!

मेरी इस कहानी के द्वारा मैंने एक सरल उपाय के जरिए , आपसी सम्बन्धों में अपनापन और जुड़ाव लाने की बात रखी है|

आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी| आप अपने सुझाव कमेंट सेक्शन में साझा कर सकते हैं| यदि आपको मेरी रचना और उसमें निहित संदेश पसंद आया है तो कृपया लाइक एवं शेयर कीजिए| 

 ऐसी ही अन्य खूबसूरत रचनाओं के लिए आप मुझे फॉलो  भी कर सकते हैं।

प्रियंका की कलम से 🖋

धन्यवाद।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट

हिंदी साहित्य का महत्व: इतिहास, काल विभाजन और आधुनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता