बिखेरा है उत्साह कण-कण में प्रणेता ने - कविता
बिखेरा है उत्साह कण-कण में प्रणेता ने!
हिंदी कविता
बिखेरा है उत्साह कण-कण में प्रणेता ने,
रंग इन्द्रधनुष के अनुपम दर्शाए हैं प्रकृति ने!
ढुलकाए हैं, अनगिनत रुपहले मोती पृथ्वी पर।
चुन लो जो मन चाहे तुम, प्रकृति से।
उगता सूरज आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है,
ढलता हुआ भास्कर समय की महत्ता दर्शाता है।
खिलती कली-पुष्प नवजीवन का संचार करते हैं,
चहचहाते पक्षी जीवन का कलरव सुनाते हैं।
निर्मल चांदनी शीतलता का दर्पण दिखा जाती है,
निशा की तन्हाई आत्मविश्लेषण का अवसर दे जाती है।
नदी अनवरत निरंतर बहना सिखाती है,
बारिश मन पर पड़ी धुंध को साफ कर जाती है।
प्रकृति है उत्साह का बेशकीमती भंडार अगाध ,
कुछ सीख जीवन में उतार, मनुसंतान जीवन तू साध।
-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
(मौलिक व स्वरचित)
२५ सितंबर, २०२५
लेखिका की कलम से
दोस्तों,
भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।
धन्यवाद 🙏 आभार
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