चाक पर थिरकते हाथ कुम्हार के - कविता

 

chak par thirakte haath kumhaar ke kavita pic

चाक पर थिरकते हाथ कुम्हार के!

हिंदी कविता

चाक पर थिरकते हाथ कुम्हार के,

चाक पर नित नई गढ़ती कृतियां,

कुम्हार की कैसी यह 

अद्भुत कलाकारी!

कितनी मनोहारी लगती वो 

माटी पर सुघड़ हाथों की कारीगरी!

जब थिरकते सधे हाथ 

चाक के ऊपर लय कौशल से,

प्रतीत होता है 

मानो संगीत पर कुशल 

नर्तन हो रहा किसी का!

माटी के वो बरतन‌

तब आंच में पककर निकलते

निखरते पक्के होकर!

जीवन-चक भी चाक है,

चढ़ा जिसपर हर मनुष्य है

उम्र पर्यंत!

अनुभव से, संघर्ष से, 

परिश्रम से, मेहनत से,

धधकती धूप में, 

पसीने की हरेक बूंद से 

तपकर निखर जाता है

बन जाता तब ही कुंदन,

जीवन की राहों में आ जाता ठहराव,

मन में उतरती समझदारी और परिपक्वता,

हर कदम पर मिल जाता संतुलन का भाव।


फ़िलासफी छोड़ मैं तो

फिर माटी पर आती हूॅं।

कुछ सुहानी यादों के 

झरोखे में लिए चलती हूॅं।

बचपन में गढ़े थे हमने भी 

छोटे-छोटे चूल्हा,भगौने,

कटोरी-गिलास चम्मच और

चकला-बेलन तवा चिमटा 

अपने नन्हें नन्हें हाथों से। 

खेलकर मिट्टी से लथपथ हों

जब घर आते थे,

कसम से दोस्तों 

सफेद भूत नजर आते थे।

चुपके से मुंह-हाथ-पैर धोकर

अच्छे बच्चे तब बन जाया करते थे।

हाँ, कभी दिवाली पर जब 

दीया लेने जाते थे 

तब कुम्हार काका का 

चाक घुमाकर उल्टी-सीधी

टेढ़ी-मेढ़ी शेप बनाया करते थे

और तब ही कुम्हार काका के 

जरा से हाथ के सहारे से

चाक गढ़ देता अनुपम कृति!

वो सुंदर दीया बन जाने

पर इठलाया भी खूब करते थे,

दादी-बाबा, बुआ-मम्मी सभी को

शान से दिखलाया करते थे।

बचपन के उस पल में 

अनायास ही कलाकार 

हम भी बन जाया करते थे।


-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

(मौलिक व स्वरचित)

२७  सितंबर, २०२५  

लेखिका की कलम से 

दोस्तों,

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धन्यवाद 
🙏 आभार

प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

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