देवी ना बनाओ मुझको तुम - कविता
देवी ना बनाओ मुझको तुम
हिंदी कविता
देवी ना बनाओ मुझको तुम,
मानव हूँ, मानव रहने दो।
यूँ महिमा-मंडित मत करो,
झूठे आडंबर मत करो,
मानवीय भावों से परिपूर्ण
साधारण-सी एक नारी हूँ।
वही बनी मुझे, तुम रहने दो।
देवी ना बनाओ मुझको तुम।
मर्जी से सिर पर चढ़ाते हो,
नवरात्रि में देवी कहते हो,
पलभर भी न लगाते हो
क्षणांश में अपमानित करते हो।
क्यों भला ऐसा किया करते हो?
देवी ना बनाओ मुझको तुम।
ऊँचा मत बैठाओ मुझको तुम,
जैसी हूँ वैसी रहने दो,
देवी बनाकर कुछ दिन की
मुझको तुम, नित दिन
धरातल पर घसीटो मत।
देवी ना बनाओ मुझको तुम।
ना मेरे त्याग को ताज बनाओ,
ना मेरे धैर्य को कमजोरी बताओ।
मैं हँसती, रोती, सपने बुनती,
जीवन की हर डगर पर चलती।
नज़रों में चढ़ाकर फिर गिराओ मत।
देवी ना बनाओ मुझको तुम।
यूँ दिखावा ना करो कुछ दिन का,
नारी हूँ ,नारी मुझे रहने दो।
हर रोज़ की तरह मुझे जीने दो।
बस इंसान की तरह पहचान दो,
देवी ना बनाओ मुझको तुम,
मानव हूँ , मानव रहने दो!
-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
(मौलिक व स्वरचित)
२७ सितंबर, २०२५
लेखिका की कलम से
दोस्तों,
भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।
धन्यवाद 🙏 आभार
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प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

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