डायरी की शिकायत - कविता

Diary ki shikayat kavita pic

डायरी की शिकायत

हिंदी कविता

डायरी मेरी आजकल मुझसे कहा करती है-

क्यों मैं यूं ही पड़ी रह जाती हूँ?

क्या तुम कुछ पाती नहीं लिखने लायक

या मन भर गया है मुझसे तुम्हारा?


मैं वहाँ अटारी पर रखी मैली,

धूल-धुसरित हुई जाती हूँ।

पन्ने मेरे पलटे बिना चिपक गए‌ हैं,

कागज मेरा पीला पड़ने लगा है।


डायरी की शिकायत सुन निशब्द हुई मैं,

खुद पर लज्जित, शर्मिंदा हो बोली-

तुम तो मेरी प्रिय सखी हों,

मेरी भावनाओं के सैलाब को सम्हाले हों!


क्या करूं कि शब्द मेरे कुछ बिखर से ग‌ये हैं,

आंचल में चुनकर बांधा उनको है मैंने।

आती हूँ सखी मिला करूंगी तुमसे,

किस्से साझा अनगिनत होंगे तब,


कुछ दिन प्रहर गुजर गए यूँ ही,

कुछ अनुभूतियाँ समय में ठहर गईं,

कलम को और पैनी कर लिया मैंने,

धार से प्रहार‌ करना सीख लिया है अब।

-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

(मौलिक व स्वरचित)

२५  सितंबर, २०२५  

लेखिका की कलम से 

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धन्यवाद 
🙏 आभार

प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

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