सांस लेते ही तुम मुझमें रच-बस गईं मानो - कविता
सांस लेते ही तुम मुझमें रच-बस गईं मानो!
हिंदी कविता
शहर जो जाना पहचाना हुआ करता था,
बरसों बाद अनजाना क्यों लगा आज?
ना तुम दिखाई दीं, ना खबर मिली तुम्हारी,
ना तुम्हारी झलक ही आहत दिल को मिली।
नज़रों से ओझल भले ही हो गई तुम,
तुम्हारी खुशबू तो बसी है शहर की सांसों में,
सांस लेते ही तुम मुझमें रच-बस गईं मानो!
लगा आज सालों बाद जिंदा हो उठा मैं।
यूं मुकम्मल ना होना था मिलन हमारा,
पर एहसासों पर जोर भला किसका चला है!
फिर से होंठ सिले, ऑ॑खें नम हों आईं हैं,
बिना कहे शहर अब एक बार पुनः विदा लेता हूॅ॑,
मेरी यादों के कारवां में बसी हों तुम,
हां! बस मंज़िल तुम्हारी कुछ और हो चुकी है...
-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
(मौलिक व स्वरचित)
२५ सितंबर, २०२५
लेखिका की कलम से
दोस्तों,
भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।
धन्यवाद 🙏 आभार
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प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

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