तेरी आँखों की भुलभुलैया में - कविता
तेरी आँखों की भुलभुलैया में
हिंदी कविता
तेरी आँखों में गलियारे हैं, मैं राह में अनायास ठहर जाता हूँ,
तू झोंका बनके गुजरती है, मैं पत्थर होकर भी दरक जाता हूँ।
अनजानी सी तू, अनकहे जज्बातों का जमा खाता है,
सामने तेरी नज़रों के, बेबस मैं बरबस हो जाता हूँ।
पेड़ों तले, शाम ढले, मैं खुद को यहीं पाता हूँ,
तेरे प्यार की खुशबू में खिंचा रोज चला आता हूँ।
सूरज डूब जाता है, रात का सन्नाटा छिटक जाता है,
मैं अकिंचन अनायास ही आगोश में तेरे चला आता हूँ।
उदास, निराश मन जब ठौर कहीं नहीं पाता है,
सुकून तेरी आँखों के घने जंगल में ही मैं पाता हूँ।
कांपते,लरजते होंठों को देख होश कहां रह जाता है,
सुध बुध भूल मैं उन में ही गहरे डूब डूब जाता हूँ ।
आँखों में तेरी संसार मेरा यूं ही बस जाता है,
तेरी आँखों की भुलभुलैया में गहरे मैं उतर जाता हूॅं।
मुस्कान से, तेरी हँसी से बगिया वन महक जाता है,
कह नहीं पाया तुझे पर मैं खुद में सिमट जाता हूँ।
खिली हुई धूप तू, जग तुझसे ही जगमगाता है,
अरुणिमा की लालिमा तू, जीवन तुझसे ही मैं पाता हूँ।
-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
(मौलिक व स्वरचित)
३० सितंबर, २०२५
लेखिका की कलम से
दोस्तों,
भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।
धन्यवाद 🙏 आभार
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प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

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