उसका जहान - कविता
उसका जहान
हिंदी कविता
कहीं एक अधखिली कली,
खिलकर मुस्कुराई है।
अलसाई सुबह ने आज,
फिर ली अंगड़ाई है।
कुछ असर जगह का है,
मौसम भी शरबती है।
उदास रहने वाली,
वो खिलखिला उठी है।
ज़िंदगी को जीने लगी,
अपने लिए भी सोचा उसने।
कहीं से रोशनी की किरण,
आके झिलमिलाई है।
सहन न हुआ ज़माने को,
बनाने लगे वो बातें अब।
चलाने लगे तीर बरछी तानों के,
कि चाल बदली-बदली सी लगती है।
सुना है लोग कहने लगे,
हवा लग गई उसे ज़माने की।
पर सच तो ये है कि—
उसने बस भीतर की खिड़की खोल दी है।
अब जो भी झोंका आता है,
खुशबू सा बह जाता है।
उसे अपनी रूह की सरग़म,
सुनाई स्पष्ट देने लगी है।
अब कोई डर नहीं,
कोई संकोच नहीं।
वो अपनी धुन पर,
कदम बढ़ाने लगी है।
आज वही बदली-बदली चाल,
उसकी असली पहचान है।
जो कल तक चुप थी—
अब उसकी आवाज़ में ख़ुद उसका जहान है।
-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
(मौलिक व स्वरचित)
२९ सितंबर, २०२५
लेखिका की कलम से
दोस्तों,
भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।
धन्यवाद 🙏 आभार
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प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

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