ज़िंदगी बनाम साइकिल की चेन - कविता
ज़िंदगी बनाम साइकिल की चेन
हिंदी कविता
गतिमान रहे अपनी ये ज़िंदगी,
आशा-विश्वास का थामे धागा,
हर मोड़ पे मंज़िल देती संकेत,
हर राह पे चलता जीवन प्यारा।
साइकिल की चेन-सी है ज़िंदगी,
अपनी जगह हो, तो दौड़े निरंतर,
चेन जुड़ी तो पहिए गुनगुनाएँ,
फर्राटे से कटे हर राह और मंज़र।
चेन उतरते ही गति थम जाए,
लड़खड़ाहट मन को सताए,
सपनों का रथ ज्यों रुक जाए,
जीवन आधा अधूरा रह जाए।
कभी धूल-मिट्टी में खो जाए,
कभी बारिश में फिसल-सा जाए,
पर हर हाल में चलता जीवन,
नई रोशनी फिर भी ले आए।
नव स्पंदन की सरगम जैसी,
रग-रग में नई ऊर्जा लाए,
वैसे ही थोड़ी सी उम्मीदें,
हिम्मत के दीपक फिर जलाएँ।
जब निराशा का घना अंधेरा,
रोक बनाए हर इक डेरा,
तब सपनों की ज्योत जलाकर,
जीवन पाए फिर सवेरा।
चेन चढ़ते ही साइकिल सरपट दौड़े,
मन में आशा की किरण जब जागे,
हौसले की डोर तब मजबूती से थामे,
ज़िंदगी भी रफ्तार पकड़ आगे बढ़े।
-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
(मौलिक व स्वरचित)
२६ सितंबर, २०२५
लेखिका की कलम से
दोस्तों,
भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।
धन्यवाद 🙏 आभार
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प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

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