भीड़ में अक्स अक्सर फ़ना हो जाता है | भावपूर्ण हिंदी ग़ज़ल
भीड़ में अक्स अक्सर फ़ना हो जाता है
भीड़ केवल लोगों का जमाव नहीं होती, कभी-कभी वह आत्मा की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाती है। “भीड़ में अक्स अक्सर फ़ना हो जाता है” उस क्षण की ग़ज़ल है जहाँ इंसान स्वयं को खोते-खोते स्वयं में लौटने की तड़प महसूस करता है। यह रचना पहचान, फ़ना और आत्मबोध की सूफ़ियाना अनुभूति के साथ पारंपरिक उर्दू-हिंदी ग़ज़ल शिल्प में रची गई एक मौलिक साधना है।
ग़ज़ल
भीड़ में अक्स अक्सर फ़ना हो जाता है,
दिल हुज़ूम तले भी तन्हा हो जाता है। 1
हर जीत के बाद भी देखो,
वो कभी खुश पूरा ना हो जाता है।2
यूँ ही कोई दिल से नहीं उतरता,
यूँ ही कोई मौन ना हो जाता है।3
भीड़ में अक्स अक्सर फ़ना हो जाता है,
दिल हुज़ूम तले भी तन्हा हो जाता है।
कभी खुद से बात नहीं करता,
इसलिए दिल ग़मज़दा हो जाता है।4
कभी-कभी चाहतों के बाद भी,
सब कुछ अधूरा हो जाता है।5
भरी महफ़िल में रहकर भी अक्सर,
इंसान बेहद अकेला हो जाता है।6
भीड़ में अक्स अक्सर फ़ना हो जाता है,
दिल हुज़ूम तले भी तन्हा हो जाता है।
जो सच को पहचान लेता है, ‘जयपुरी’,
वो अक्सर ख़ुद से भी जुदा हो जाता है।7
📌ग़ज़ल की बुनियाद
रदीफ़: 'हो जाता है'
क़ाफ़िया: 'आ' ध्वनि वाले शब्द)

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