कुछ तो बात रही होगी - ग़ज़ल

 कुछ तो बात रही होगी हिंदी ग़ज़ल - मौन और तन्हाई पर कविता

कुछ तो बात रही होगी 

यह ग़ज़ल उस मौन की पड़ताल है जो शब्दों से ज़्यादा बोलता है। जब इंसान चुप होता है, तो अक्सर वह भीतर से सबसे अधिक संवाद में होता है। यह रचना तन्हाई, आत्मसंघर्ष और उस अनकहे सत्य को स्वर देती है, जहाँ मौन भी एक स्वीकार बन जाता है।
पारंपरिक उर्दू-हिंदी ग़ज़ल शिल्प में रची गई यह मौलिक ग़ज़ल पाठक को स्वयं से साक्षात्कार की ओर ले जाती है।

ग़ज़ल

बात से मसला यूँ ही सही हो जाता है,
बेवज़ह गुम कोई यूँ ही कहीं हो जाता है।
1
कुछ तो बात रही होगी,
यूँ ही कोई चुप नहीं हो जाता है।

दिल में टीस अगर न रही होती,
ज़ख़्म यूँ गहरा नहीं हो जाता है।3
हर धड़कन कुछ कहती होगी,
दिल बेबस यूँ ही तो नहीं हो जाता है।4

कुछ तो बात रही होगी,
यूँ ही कोई चुप नहीं हो जाता है। 

हर मुस्कान के पीछे कुछ है,
चेहरा यूँ फीका नहीं हो जाता है।5
रातें अब क्यों सिसक रही हैं,
मन पंछी यूँ तन्हा कहीं हो जाता है।6

कुछ तो बात रही होगी,
यूँ ही कोई चुप नहीं हो जाता है। 

हर बार ठोकरें खाकर भी,
इंसान यूँ समझदार नहीं हो जाता है।7
जो बिछड़ते वक्त कुछ न बोले,
उनसे नाता यूँ नहीं हो जाता है।8

कुछ तो बात रही होगी,
यूँ ही कोई चुप नहीं हो जाता है। 

हर ख़ामोशी कुछ कहती है,
सन्नाटा यूँ खाली नहीं हो जाता है।9
कुछ यादें अब भी सांसों में हैं,
वक़्त यूँ बेवफ़ा वहीं हो जाता है।10

कुछ तो बात रही होगी,
यूँ ही कोई चुप नहीं हो जाता है। 

वक़्त गुजरते ही सब बदलता है,
हर रिश्ता अजनबी यूँ सही हो जाता है।11
कभी कभी कुछ रिश्ते खोखले से,
दिल से कोई यूँ ही परे नहीं हो जाता है।12

कुछ तो बात रही होगी, ऐ ‘जयपुरी’,
यूँ ही कोई ख़ुद से जुदा नहीं हो जाता है।13

(रदीफ़: “हो जाता है”, क़ाफ़िया: “रही / नहीं / सही / वही / कहीं /वहीं”)

१ नवंबर, २०२५ 
-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
(मौलिक व स्वरचित)
यह ग़ज़ल प्रियंका सक्सेना ‘जयपुरी’ की एक मौलिक साहित्यिक रचना है।

✍️ लेखिका के बारे में

प्रियंका सक्सेना ‘जयपुरी’ समकालीन हिंदी साहित्य में सक्रिय लेखिका हैं। वे कविता, ग़ज़ल, कहानी और विचारात्मक लेखन में रुचि रखती हैं। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, मौन के अर्थ, प्रेम की नाज़ुकता, जीवन की क्षणभंगुरता और रिश्तों की जटिल भावनाएँ सूक्ष्मता से उभरती हैं। पारंपरिक शिल्प को आधुनिक दृष्टि से जोड़ते हुए, वे शब्दों में सादगी और भावों में गहराई रचती हैं। उनकी रचनाओं में आत्मसंवाद, विरह और अस्तित्व के प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरते हैं, जो पाठक को भीतर तक छू जाते हैं।

“प्रियंका की कलम से” उनके साहित्यिक लेखन और भाव-अभिव्यक्ति का सजीव मंच है।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट

हिंदी साहित्य का महत्व: इतिहास, काल विभाजन और आधुनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता