वो डाइनिंग टेबल – कविता

Vo Dining table kavita pic

वो डाइनिंग टेबल

हिंदी कविता

याद है अब भी वो बारह कुर्सी वाली विशाल डाइनिंग टेबल,
जहाँ सजे थे हँसी के मोती, प्यार का मधुर अनमोल मेल।

माँ, दादी, बुआ की रसोई महक उठती थी,
भांति-भांति के व्यंजन से थाली चमक उठती थी।

भर भर के डोंगों में आती स्वाद की अनुपम सौगात,
मनुहार करती, थाली में रखती मिष्ठान्न करती वो  बात।

सब बैठे मिलजुल कर खाते, छाई रहती थी उमंग,
माँ-दादी की थाली सजती, ममत्व का था वो  रंग।

वो डाइनिंग टेबल थी साक्षी, एकता के उस भाव की,
जहाँ हर थाली बोलती थी, स्नेह और लगाव की।

हम बच्चे तो खाने से पहले, करते थे खूब मस्ती और  धमाल,
टेबल के चारों ओर लगती थी, हँसी की रेलम-पेल बेमिसाल।

भरा-पूरा था परिवार हमारा, उजली थी हर भोर,
टेबल के इर्द-गिर्द बिखरा, अपनापन था हर ओर।

वो डाइनिंग टेबल अब भी दिल की गहराई में बसती है,
हर याद उसी पर बैठी, आज भी मुस्कुराती सी हँसती है।

जब भी स्मृतियों का कारवाँ आँखों में ठहर जाता है,
दिल की दीवार पे बचपन फिर से घर बनाता है।

अब भी मन के आँगन में, यादों की डोर बंधी है,
हर मुस्कान के संग कोई मीठी गूँज छिपी है।

सालों बीत गए, पर दिल में वही उमंग तरंग,
जहाँ सजी थी खुशियों की थाली हर अपने संग।

पलकों में उमड़ता है सावन, मन हो जाता नम,
वो डाइनिंग टेबल आज भी, बुलाती मुझे हर दम।

✍️ लेखिका के बारे में

प्रियंका सक्सेना ‘जयपुरी’ समकालीन हिंदी साहित्य में सक्रिय लेखिका हैं। वे कविता, ग़ज़ल, कहानी और विचारात्मक लेखन में रुचि रखती हैं। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, मौन के अर्थ, प्रेम की नाज़ुकता, जीवन की क्षणभंगुरता और रिश्तों की जटिल भावनाएँ सूक्ष्मता से उभरती हैं। पारंपरिक शिल्प को आधुनिक दृष्टि से जोड़ते हुए, वे शब्दों में सादगी और भावों में गहराई रचती हैं। उनकी रचनाओं में आत्मसंवाद, विरह और अस्तित्व के प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरते हैं, जो पाठक को भीतर तक छू जाते हैं।

“प्रियंका की कलम से” उनके साहित्यिक लेखन और भाव-अभिव्यक्ति का सजीव मंच है।

टिप्पणियाँ

  1. बहुत खूब। सुंदर कविता

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  2. बेनामी6/11/25, 12:10 pm

    बहुत सुंदर चरितार्थ किया हैं, रिश्ते कब दूर होते गए कब खालीपन पसर गया ...

    जवाब देंहटाएं

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