फिर कभी: सामान्य वर्ग की संघर्षपूर्ण हिंदी कविता
फिर कभी
हिंदी कविता
ना हम किसी सूची की प्राथमिकता हैं,
ना किसी घोषणा-पत्र की पंक्ति,
हम वही लोग हैं जिन्हें हर बार
“फिर कभी” कहकर किनारे किया,
नजरअंदाज किया,
और वक़्त की पंक्ति से बाहर कर दिया गया।
राजनीति ने तौला
केवल वोटों का वज़न,
हमारा दुख, हमारा दर्द
हमारी तकलीफ़,
हर चर्चा से पहले ही
दहलीज़ पर छूटता चला गया।
ढीले मानकों, रियायतों की चाबी से
महलों के ताले खुलते देखे हैं हमने,
और अपनी मेहनत की कसौटी
अपनी काबिलियत को
दरवाज़े के बाहर
जूते की तरह हमने पड़ा पाया है।
अर्ज़ियों में उम्र तमाम होती रही,
डिग्रियाँ हाथ में थीं,
पर मंज़िल को पा ना सके,
कि अंकों की सीमा ने उम्मीदों का गला घोंटा,
और बेरोज़गारी ने
दामन कभी छोड़ा नहीं।
ना झुग्गियों की छत ने हमें तोड़ा,
ना राहत मिली, पर कदम हमारे रुके नहीं।
संघर्ष से जो पहचान बनी,
व्यवस्था की अदालत में
वही सबसे बड़ा अपराध बना,
और हमारी कोशिशें हवा में बिखर गईं।
ना कोई जाति कवच बनी,
ना आरक्षण ने उँगली थामी,
“सामान्य” लिखे अदना शब्द ने
हर मोड़ पर
सबसे ज़्यादा कीमत वसूली।
और हमारे अस्तित्व को ही सवाल बना दिया।
ना हम दबे-कुचले पीड़ित की परिभाषा में आए,
ना रियायतों की ज़मात में गिने गए,
ना सुविधा के किसी दायरे में उतरे,
बीच की इस सूनी ज़मीन पर
हम रोज़
थोड़ा-थोड़ा ग़ायब होते रहे।
अब किस दफ़्तर में गुहार लगाएँ?
किस लहजे में बात रखें?
जहाँ अरमान
अर्ज़ियों में ढलते हैं
और अर्ज़ियाँ
कूड़ेदान में इतिहास बन जाती हैं।
यदि यही व्यवस्था न्याय कहलाती है,
तो मन में कोई कोना
अधूरा-सा क्यों रह जाता है?
और यदि यही लोकतंत्र है,
तो हमारी आवाज़
इतनी धीमी क्यों पड़ जाती है?
शायद कहीं,
किसी मोड़ पर,
हमारी बारी
ठहर गई है…
या हो सकता है,
हमारी आवाज़
अब भी कहीं बची है।
संभवत:
हमारी बारी
अभी आई नहीं है
पर
ख़त्म भी नहीं हुई है।

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