नववर्ष कविता | नववर्ष : जब समय हमारे साथ बैठता था
नववर्ष : जब समय हमारे साथ बैठता था
हिंदी कविता
सर्द हवा…
ओस की चुपचाप गिरती बूँदें…
और लिहाफ़ में दुबका हुआ
बचपन।
इकत्तीस की वो रात
जहाँ घड़ी नहीं,
दिल गिनती गिना करता था।
शाम से ही
दिल में एक मीठा सा इंतज़ार रहता था,
नया साल आने से पहले,
हर पल कुछ खास बन जाता था।
दूरदर्शन की स्क्रीन के सामने
आँखें नहीं,
उम्मीदें टिका करती थीं
आज की रात
खुशियों का
पूरा कार्यक्रम हुआ करती थी।
ना रिमोट बदलने की जल्दी,
ना चैनल खोजने की हड़बड़ी,
गीत…
नृत्य…
कॉमेडी…
और नाटक
एक ही परदे पर
पूरा देश
साथ बैठा हुआ करता था।
माँ रसोई में
शाम को गाजर घिसती थीं ,
घी की खुशबू
सर्द हवा से लड़ती थी,
और हलवे की भाप
नए साल की
पहली मिठास बन जाती थी।
माँ-पापा के साथ
नया साल सबसे सुरक्षित लगता था,
भाई-बहन की शरारतों में
हर आने वाला कल
हँसकर जागता था।
कोट की जेब में
मूँगफलियाँ खनकती थी,
पिस्ते , चिलगोज़े
और काग़ज़ में लिपटी
रेवड़ियाँ
ठंड में अलग सा
अपनापन देती थीं।
और फिर…
वो चाय!
बाबा-दादी के साथ बैठकर
घूँट-घूँट भर
चुस्की लगाना...
जैसे हर घूँट में
एक कहानी हो,
हर भाप में
कोई पुराना किस्सा।
बाबा कहते,
“हमारे ज़माने में…”
और दादी
मुस्कुराकर
उस अधूरी बात को
पूरा कर दिया करती थीं ।
ओस की बूँदें
पेड़ों की पलकों पर ठहरी रहती थीं,
और सुबह की धूप आने तक
रात की कहानी कहती थीं।
नया साल सिर्फ़ तारीख़ नहीं था,
वो रिश्तों की डाक भी हुआ करता था।
आर्चीज़ की दुकान पर
खड़े होकर
कार्ड चुनना,
कौन सा कार्ड किसके लिए?
ये भी एक उत्सव था।
कोई चमकदार,
कोई भावुक,
कोई शरारती,
हर कार्ड में दिल चिपका हुआ करता था।
लिफ़ाफ़े पर पता लिखते समय,
हाथ नहीं, दिल चला करता था।
डाक के डिब्बे में कार्ड डालते हुए,
हम खुद को किसी से
और ज़्यादा जुड़ा पाया करते थे।
दोस्तों, रिश्तेदारों तक
शुभकामनाएँ पैदल भी जाती थीं।
सशरीर पहुँचती थीं,
खुशियां तब ढेरों मुस्काती थीं।
सुबह होती थी,
ठंडी धूप के बीच
मंदिर का घंटा बजता था।
ईश्वर को
पहला प्रसाद,
और बड़ों के चरणों में
नए साल पर शीश
सबसे पहले झुका करता था।
आशीर्वाद,
हमारा उत्सव था।
संतोष,
सबसे बड़ी पार्टी थी।
आज नया साल रोशनी में नहाया होता है,
होटलों, क्लबों, भीड़ और शोर में खोया होता है।
घड़ी बारह बजते ही
खुशियाँ तस्वीरों में कैद हो जाती हैं।
उँगलियों से
फ़ोन पर संदेश लिखे जाते हैं,
शब्द तो पहुँच जाते हैं
पर आवाज़ें कहीं
रास्ते में छूट जाती हैं।
लिहाफ़ की गर्माहट अब याद बन गई है,
और माँ के हाथ का स्वाद,
रेस्टोरेंट के मेन्यू में कहीं नहीं मिलता।
चाय अब भी है,
पर वो बाबा-दादी वाली
धीमी धीमी चुस्की नहीं।
जश्न आज भी है,
पर ठहराव कम है,
और अपनापन,
शायद कहीं पीछे छूट गया है।
साल दर साल
बस कैलेंडर बदलते हैं,
पर कुछ बीते पल
कुछ आवाज़ें
वो सर्दियाँ-
लिहाफ़, चाय
और बाबा-दादी की पुकार,
भाई बहन का शोर,
माँ पापा का लाड़,
दिल में
हमेशा के लिए ठहरी हैं।
फिर भी साल नया आ ही आता है,
हर बार कुछ सिखा जाता है,
पर वो पुराने साल की गर्मी,
दिल आज भी ढूँढता जाता है।
आज नया साल रोशनी में डूबा है,
भीड़ में खुद को ढूँढता है।
कार्ड अब स्क्रीन पर चमकते हैं,
डिजिटल हो गए हैं,
और डाक…
बस याद बनकर रह गई है।
कोट की जेबें अब भी हैं,
पर उनमें ठहराव नहीं।
उनमें अब वक्त नहीं ठहरता है।
फिर भी…
जब सर्द सुबह
चाय का पहला घूँट
होंठों से टकराता है,
दिल चुपचाप कहता है-
नया साल
तब भी अपना था,
नया साल
अब भी अपना है।
बस फर्क़ इतना है-
तब समय हमारे साथ बैठता था…
और अब
हम समय के पीछे भागते हैं।
समय को पकड़ने की नाकाम कोशिश
में लगे रहते हैं।
नया साल तब भी अपना था,
नया साल अब भी अपना है,
बस फर्क़ इतना है कि तब
जश्न दिल में था,
और अब दिल…
जश्न में कहीं खो सा गया है।

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