जब रेडियो घर की धड़कन था – 80 के दशक की मधुर यादें | कविता
📻 जब रेडियो घर की धड़कन था
हिंदी कविता
भूली-बिसरी यादें आज फिर दस्तक दे गईं,
मन की अलमारी में रखी पुरानी सी धुनें जाग गईं।
कोने में रखा वह सादा-सा रेडियो,
जैसे बरसों बाद फिर मुझसे बात करने लगा।
कभी वह घर की पहली आहट था,
नींद से जगाती मधुर सी सरगम था,
सुबह की चाय के संग बजती उसकी तान,
और लगता - बस यही तो है घर की पहचान।
अचानक गूँजती थी वह परिचित-सी आवाज़-
“आकाशवाणी का ये रामपुर केंद्र है…”
और दिल गर्व से भर जाता था,
मानो उस आवाज़ में मेरे शहर की सांसें गूंज उठती हों।
अस्सी के दशक की वह प्यारी बात,
‘बाल सभा’ और ‘बाल जगत’ की सौगात।
राजीव सक्सेना ‘भैया’ की आवाज़ मन को भाई,
बचपन ने रेडियो में ही अपनी दुनिया बसाई।
घर बैठे सुनती थी दूर-दूर का संसार,
मन उड़ जाता था तरंगों के उस पार।
कुछ बढ़े हुए-
दोपहर ढले नरमी से ऐलान होता,
“ये ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस है…”
और फिज़ा में घुल जाती ग़ज़लों की खुशबू,
रफ़ी साहब की आवाज़ में डूबता हर दिल भरपूर।
शायरी, नज़्में, उर्दू नाटक की शाम,
हर लफ़्ज़ में बसता था एहसास तमाम।
शाम होते ही एक और सुकून उतर आता,
“अब आप सुन रहे हैं विविध भारती…”
और घर-आँगन में सज जाता था गीतों का संसार,
फिल्मी धुनों से भर जाता हर द्वार।
छायागीत की मधुर परछाइयाँ,
मन में उठतीं मीठी लहरियाँ।
भूलें बिसरे गीत जब गूँजते थे हवा में,
पुराने सदाबहार गीत बस जाते थे दुआ में।
रात गहराती तो हवामहल सजता,
आवाज़ों में पूरा एक संसार बसता।
बिन देखे ही नाटक के दृश्य उभर आते थे,
किरदार दिल के करीब उतर आते थे।
बजता था जब बिनाका गीतमाला का नाम,
तो दिल की धड़कन हो जाती थी और जवान।
अमीन सयानी की जादुई पुकार,
“बहनों और भाइयों…” से सजता था हर बुधवार।
दोपहर में आती थी जयमाला की बारी,
सीमाओं तक पहुँचती थी सुरों की सवारी।
फौजी भाइयों के लिए बजते फरमाइशी गीत,
हर धड़कन में भर देते थे घर की प्रीत।
कभी एंटीना धीरे-धीरे ऊपर खींचना,
हल्की-सी खरखराहट में भी स्टेशन को सुनना।
थोड़ा दाएँ, थोड़ा बाएँ घुमाना,
सही तरंग मिलते ही मुस्कुराना।
उँगलियों में थामा वह पतला-सा डंडा,
मानो उसी में बसता था सारा फंडा।
कोई स्क्रीन नहीं, कोई चकाचौंध नहीं,
फिर भी दिल से दिल की दूरी कहीं नहीं।
सिर्फ आवाज़ों में बसी एक दुनिया थी,
जहाँ कल्पनाओं का अपना खुला आसमान था।
आज जब मोबाइल की भीड़ में खोए हैं हम,
तो याद आता है वह सादा-सा संगम।
जहाँ परिवार एक साथ बैठा करता था,
और हर सुर में अपनापन झलकता था।
बच्चे उत्सुक बैठ कार्यक्रम सुनते जाते,
हर किरदार संग सपनों के मेले सजाते।
जवान दिल थामे कमेंटरी में डूबे रहते,
हर चौके-छक्के पर जोश से झूम उठते।
बुज़ुर्ग समाचार सुन गंभीर चर्चा करते,
देश-दुनिया के हालातों पर विचार प्रकट करते।
और महिलाएँ काम करते-करते मुस्कुरातीं,
गीतों की मधुर धुनों में चुपके-चुपके खो जातीं।
ना था कोई दृश्य, ना चमक का सामान,
फिर भी वही रच देता था सपनों का जहान।
वह शब्दों से मन में तस्वीरें उकेर देता था,
सूनी दोपहरों में भी जीवन भर देता था।
सिर्फ आवाज़ के सहारे रिश्तों को जोड़ जाता था,
और हर घर के आँगन में अपनापन बो जाता था।
रुको ज़रा…
कि इन लम्हों को फिर से जी लेने दो,
कुछ भूले गीतों को गुनगुना लेने दो।
क्योंकि रेडियो सिर्फ एक यंत्र नहीं था,
वक्त की धड़कनों में बसा अमर अफ़साना था।
वह आवाज़ों में छुपा अपनापन था,
वह दूरियों को मिटा देने वाला बहाना था।
वह यादों का खजाना, दिल का कोना था।
जो हर दिल में अपना ख़ास घर बनाता था।
हाँ…
रेडियो हमारी जान ही नहीं था,
वह समय की साँसों में बसा एक युग था।
वह घर-आँगन में गूँजता संगीत था,
रिश्तों की अनकही सी प्रीत था।
वह सिर्फ बजता नहीं था,
वह जीता था…
उस दौर में,
जब रेडियो घर की धड़कन था। 💛📻

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