रेडियो मेरी जान - कहानी
रेडियो मेरी जान!
हिंदी कहानी
"आप सुन रहे हैं ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस, पेश है गायक मुकेश की आवाज़ में राजकपूर साहब पर फिल्माया गया सदाबहार गाना,' जीना यहां मरना यहां'"
मीनू, काॅलेज के लिए देर हो रही है, जल्दी बाथरूम से बाहर आओ।"
"बस आ गई, माँ ।
मीनू ने बाथरूम से निकल कर बाल सुखाते सुखाते विविध भारती लगा दिया।
"ये है विविध भारती और पेश है साजन फिल्म का 'देखा है पहली बार साजन की आंखों में प्यार' "
गाना गुनगुनाते हुए मीनू तैयार हो कर डायनिंग टेबल पर रखा नाश्ता देखकर खुश हो कर माॅ॑ से वहीं से बोली," आलू के परांठे, मज़ा आ गया माँ ।"
तैयार होते होते रीना भी आ गई और दोनों सहेलियां काॅलेज चली गईं।
माँ अपने कामों में लग गईं, मीनू के बाबा-दादी की हर पुकार पर माँ हमेशा भाग भाग कर काम करती रहती है। दोपहर का खाना निबटा कर दो घड़ी आराम करती हैं फिर मीनू के आने का समय हो जाता। उसे खाना देकर सास-ससुर के लिए चाय देती हैं फिर बेटा मुकेश जो प्राइवेट नौकरी करता है , अपने पिता जीवनलाल जो एक सरकारी कार्यालय में एकाउंट ऑफिसर हैं, के साथ आ जाता है। दोनों के नौकरी से लौटने का समय एक है , सुबह भी आधे घंटे के अंतर पर घर से निकलते हैं। मुकेश और पतिदेव के साथ सुमन भी चाय ले लेती हैं।
मीनू काॅलेज से घर आकर खाना खाकर करीब एक घंटे नींद लेती है वह रात को जगकर पढ़ाई करती है, एम.ए. फाइनल अर्थशास्त्र की छात्रा है तो सांख्यिकी में उसका जवाब नहीं है। टाइम मैनेजमेंट भी उसे सलीके से करना आता है। एक बात जो मीनू हर शाम को अवश्य सुना करती है ,वो है शाम सात बजे विविध भारती पर प्रसारित 'जयमाला' सुनना। 'जयमाला' कार्यक्रम में फ़ौजी भाइयों की पसंद के फिल्मी गीतों को बजाया जाता है। फ़ौजी भाइयों की पसंद के गाने मीनू को भी बहुत भाते हैं, देशभक्ति के, घर से संदेश लाते गाने, प्रेम के , विरह के सभी तरह के गाने इस प्रोग्राम में बजाए जाते हैं। शनिवार को 'जयमाला' कार्यक्रम और भी रोचक हो जाता है जब कोई मशहूर फिल्मी अभिनेता या अभिनेत्री इस कार्यक्रम को प्रस्तुत करते हैं, उन कलाकारों के पेश करने के अंदाज़ की मीनू फैन है।
सिपाही, हवलदार, सूबेदार, लांसनायक सेना सभी रैंक के फ़ौजी भाइयों की तरफ़ से लिखे ख़त को जब एंकर पढ़ते हैं तब मीनू का दिल भी मानो सरहद पर पहुंच जाता।
कभी काॅलेज का काम कम रहता तो मीनू रात को 'हवामहल' की नाट्य प्रस्तुति का भी लुत्फ़ उठा लेती।
बुधवार रात आठ बजे नौ बजे 'बिनाका गीतमाला' में मीनू की पसंद के गाने कभी ऊपर तो कभी नीचे हो जाते हैं। अमीन सायानी किस पायदान पर कौन सा गीत है, मजे से बताया करते हैं, आखिर में चोटी के गीत के एनाउंस होने के पल का मीनू को हफ़्ते भर इंतजार रहता है।
'छायागीत' के गाने भी मीनू को अच्छे लगते हैं, पर 'छायागीत' कम ही सुन पाती है। यह सब काम वह पढ़ाई के साथ ही करती है, पढ़ाई में भी अव्वल है अपनी मीनू...
माँ पापा की लाड़ली है मीनू, बाबा-दादी की दुलारी और मुकेश भाई की चहेती बहन मीनू घर भर में छोटी है। उसको अपनी अठारहवीं सालगिरह पर जीवनलाल जी ने मर्फी का यह रेडियो दिया था। तीन सालों से यह नायाब तोहफ़ा मीनू के कमरे की शान बढ़ा रहा है, मीनू की सुबह रेडियो के कान उमेठ कर होती है और सोते वक्त भी रेडियो बेचारा अपने लाल कान सहला रहा होता है।
दोस्तों, कैसी लगी आपको मीनू के रेडियो से लगाव की कहानी, पहुंच गए ना आप भी रेडियो के पुराने सफर में मीनू के साथ... आप भी अपने पसंदीदा रेडियो के कार्यक्रम बतायेगा, कमेंट सेक्शन में और यदि कहानी पसंद आई तो लाइक अवश्य कीजिएगा। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया कमेंट सेक्शन में साझा कीजिए। पसंद आने पर ब्लाग को लाइक और शेयर करें। भावनाओं से ओत प्रोत मेरी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप मुझे फाॅलो करना न भूलें।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें