वो पलछिन क्षणांत का | इश्क़, वफ़ा और फ़ना पर आधारित हिंदी ग़ज़ल

वो पलछिन क्षणांत का – इश्क़, वफ़ा और फ़ना पर आधारित हिंदी ग़ज़ल

वो पलछिन क्षणांत का - एक भावपूर्ण हिंदी ग़ज़ल

यह ग़ज़ल क्षणिक जीवन, इश्क़ की नाज़ुकता और फ़ना की स्वीकृति को शब्द देती है। “वो पलछिन क्षणांत का” मौन, विरह और आत्मविलय की संवेदना से उपजी एक भावपूर्ण रचना है।

यह ग़ज़ल पारंपरिक उर्दू-हिंदी शिल्प में रची गई एक मौलिक रचना है। 

वो पलछिन क्षणांत का, था इश्क़ भी और अंजाम फ़ना का,
ओस की बूंद में छुपा था, कोई सजदा भी वफ़ा का।

सर्द  सन्नाटे में उतरा जो रात की पेशानी से, 
उस मौन में छुपा था ख़ामोश इबादत दुआ का।2

वो पलछिन क्षणांत का, था इश्क़ भी और अंजाम फ़ना का,
ओस की बूंद में छुपा था, कोई सजदा भी वफ़ा का।

क्षणिक बुलबुला-सा जीवन, साँस भर का ही ठिकाना,
जो ठहरा तो टूट जाएगा, यही दस्तूर है वफ़ा का।3

नैनों का ताकना ही काफ़ी था, शब्दों की क्या दरकार,
दिल की लुकाछिपी में घुला सब, नाम रह गया सदा का।4

वो पलछिन क्षणांत का, था इश्क़ भी और अंजाम फ़ना का,
ओस की बूंद में छुपा था, कोई सजदा भी वफ़ा का।

यादें कच्ची धूप बनीं, आँगन में उतर आईं,
छू लिया तो जल भी उठीं, हासिल यही था सज़ा का।5

सर्द रातों ने यह सिखाया, हर मिलन में जुदाई है,
रिश्ते श्वेत हो चले जब, अर्थ बदला हर अदा का।6

वो पलछिन क्षणांत का, था इश्क़ भी और अंजाम फ़ना का,
ओस की बूंद में छुपा था, कोई सजदा भी वफ़ा का।

ओस परवान चढ़ी तो जाना, टूटना भी है इबादत-सा,  
जो बिखर कर खुद में समाया, वही मतलब है असल वादा का।7

ये ओस की झिलमिल बूंदें बिखरी हैं या यादें तेरी,
कोई छान गया है रात की खामोशी में फ़साना का।8

वो पलछिन क्षणांत का, था इश्क़ भी और अंजाम फ़ना का,
ओस की बूंद में छुपा था, कोई सजदा भी वफ़ा का।

अब ना “मैं” हूँ, ना “तू” बाक़ी, मिट गई हर एक सरहद,
इश्क़ समझ बैठी 'जयपुरी', बस नाम था वो फ़ासला का।9

📌ग़ज़ल की बुनियाद 

रदीफ़: 'का'
क़ाफ़िया: फ़ना / वफ़ा / दुआ / सदा / सज़ा / अदा / वादा / फ़ासला / फ़साना

✍️ लेखिका के बारे में

प्रियंका सक्सेना ‘जयपुरी’ समकालीन हिंदी साहित्य में सक्रिय लेखिका हैं। वे कविता, ग़ज़ल, कहानी और विचारात्मक लेखन में रुचि रखती हैं। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, मौन के अर्थ, प्रेम की नाज़ुकता, जीवन की क्षणभंगुरता और रिश्तों की जटिल भावनाएँ सूक्ष्मता से उभरती हैं। पारंपरिक शिल्प को आधुनिक दृष्टि से जोड़ते हुए, वे शब्दों में सादगी और भावों में गहराई रचती हैं। उनकी रचनाओं में आत्मसंवाद, विरह और अस्तित्व के प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरते हैं, जो पाठक को भीतर तक छू जाते हैं।

“प्रियंका की कलम से” उनके साहित्यिक लेखन और भाव-अभिव्यक्ति का सजीव मंच है।

टिप्पणियाँ

  1. बेनामी4/2/26, 4:33 pm

    bahut khoob gazal kahi hai aapne

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    उत्तर
    1. प्रियंका की कलम से 🖋8/2/26, 1:28 pm

      बहुत शुक्रिया आपका 🙏🙏

      हटाएं

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