एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 2: इनाम और इम्तहान
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| नई राह… और विक्रम के सपनों का इम्तहान |
अगर आपने पहले भाग को नहीं पढ़ा है तो भाग 1: एक एकड़ की दुनिया पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 2: इनाम और इम्तहान
स्कूल में सम्मान समारोह का दिन...
परीक्षा परिणाम घोषित होने के एक हफ़्ते बाद आज सुबह से ही गांव के स्कूल में विशेष समारोह की तैयारियां चल रही हैं। बड़े दिनों बाद स्कूल के बड़े से मैदान में लाल, हरी, सफेद और नीले रंग की झंडियां जगह-जगह लगाई गई हैं जो समारोह के बाद स्कूल के स्टोररूम में संभालकर रख दी जाती हैं। रंग-बिरंगी कागज़ की झालरों से स्कूल के प्रवेशद्वार को सजाया गया है। छोटे बच्चों की टोली गुब्बारे फुला रही है। मैदान में ही एक छोटा सा मंच है जहाँ पर चार कुर्सियां और एक बड़ी मेज रखी है। मेज पर एक ताजे फूलों का गुलदस्ता रखा है जिसे चपरासी ननका ने अपने कुशल हाथों से बनाया है , स्कूल की बगिया में लगे रंग-बिरंगे फूलों से... मंच के सामने कुछ कुर्सियां और बाद में लाल रंग की फर्शी दरी बिछी है। कुर्सियों पर विद्यार्थियों के माता-पिता और दरी पर छात्र-छात्राओं के बैठने का इंतज़ाम किया गया है। स्कूल के अन्य अध्यापकों के लिए साइड में कुर्सियां लगी हैं।
आप सभी को सूचित करते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि हमारे स्कूल के मेधावी छात्र विक्रम ने कक्षा आठ की बोर्ड परीक्षा में जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। सरकार की तरफ से विक्रम को छात्रवृत्ति एवं मेरिट प्रमाणपत्र दिया जाता है।
मास्टरजी ने अपने घुंघराले बालों में थोड़ा तेल डालकर झक़ सफेद कुर्ता और पजामा पहना हुआ है जो उनके चेहरे पर ताज़गी और उत्साह की भावना को और उभार रहा है।
स्कूल में गांव के कई लोग जमा हैं जिनमे कुछ बच्चों के माता-पिता हैं तो कुछ सिर्फ़ तमाशा देखने वाले जिन्हें "स्कूल में क्या हो रहा है ?"... की उत्सुकता खींच ले आई है। साथ ही कुछ ऐसे भी लोग उनमें शामिल हुए जिनके मन में समारोह देखने से ज्यादा इस बात की जलन है कि आखिरकार विक्रम ने जिला टॉप कैसे कर लिया है। इन लोगों में अधिकांशत: वे लोग हैं जो गांव के साहूकार और बड़े किसान आते हैं जिनके बच्चे भी उस स्कूल में पढ़ते हैं और कुछेक के तो विक्रम की कक्षा में ही पढ़ते हैं।
समारोह प्रारम्भ करने का समय हो गया। मंच पर प्रधानाध्यापक रमेश गुरु जी, स्कूल की इकलौती महिला अध्यापिका ललिता मैडम जी और विक्रम के मास्टरजी यानि सोहन गुरु जी विराजमान हो गए।
प्रधानाध्यापक रमेश गुरु जी ने विक्रम को मेरिट प्रमाणपत्र और ट्रॉफी प्रदान किया। विक्रम ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया। साथ ही छात्रवृति की घोषणा करते हुए मास्टरजी ने गर्व से कहा, “विक्रम हमारे गांव का पहला बच्चा है जिसने आठवीं की बोर्ड परीक्षा में पूरे जिले में टॉप किया है। हम सभी को उस पर बहुत गर्व है और हमारी आशाएं उस पर टिकी हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि वह जीवन में उत्तरोत्तर प्रगति करते सफ़लता प्राप्त करेगा। साथ ही हमें बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि विक्रम को सरकार के द्वारा छात्रवृत्ति दी जा रही है जिससे वह सुगमता से आगे की पढ़ाई जारी रख सकेगा।”
मोहनलाल की छाती चौड़ी हो गई है, जैसे उसका अपना सपना उड़ान भरने के लिए तैयार हों... वास्तव में यह उसका सपना था जिसे वो विक्रम के माध्यम से जी रहा है। मंच पर विक्रम को माला पहनाई जाती है। वह हाथ जोड़कर सभी का अभिवादन करता है।
रमा की आँखों से आँसू बह निकले—गर्व के, राहत के और थोड़े डर के भी। मोहनलाल और राम आगे की कुर्सियों में बैठे हैं। उनके दिल में भावनाओं का ज्वार हिलोरें ले रहा है और उन दोनों की आँखों में नमी और पलकों में सपने पल रहे हैं....
ज़माने को किसी की ख़ुशी सहन कहाँ होती है भला ? तालियों की गड़गड़ाहट थमते ही फुसफुसाहट उनके कानों में पड़ने लगी। कहीं से धीमी आवाज़ आई, “बेटा अफ़सर बनेगा तो खेत कौन जोतेगा?”
एक बुज़ुर्ग हँस पड़ा, “कागज पढ़ेगा या बैल चलाएगा? अफसर बनने से पहले हल उठाना नहीं भूलना चाहिए!”
कुछ लोग मुस्कराए, कुछ सिर झुकाकर निकल गए। कहीं हँसी छूटी तो कुछ लोगों के मुँह व्यंग्य से टेड़े हुए। गांव के कुछ लोग तंज कसने में माहिर हैं। कुछ मुँह पर मुस्कराते हैं, कुछ पीठ पीछे जलते हैं। मोहनलाल ने सब सुना पर कुछ नहीं कहा। वह जानता था—बोलने से ज़्यादा ज़रूरी है सहना और समझना और फिर कर दिखाना। मोहनलाल चुपचाप सुनता है। मुस्करा देता है, पर भीतर कुछ गहरा चुभ जाता है।
कुछ और विद्यार्थियों को भी विभिन्न श्रेणियों में पुरस्कार दिया गए। समारोह संपन्न हो गया , बच्चे तो दौड़ते भागते घर पहुँच गए। घर लौटते वक्त रमा ने मोहनलाल से कहा, “लोग कुछ भी कहें, पर हमें विक्रम को पढ़ने देना होगा। यही तो उसका सपना है। और जब वो आगे बढ़ेगा तो इस गाँव की मिट्टी भी उसके साथ होगी। देखना हमारा बेटा एक दिन हमारा नाम रोशन करेगा।”
मोहनलाल ने धीरे से सिर हिलाया, लेकिन उसके अंदर कुछ और ही चल रहा था। खेत, बैल, किसानी—इन सबका बोझ उसकी रगों में ऐसा बैठा था कि वह चाहकर भी खुद को उससे अलग नहीं कर पाता है... हाँ विक्रम के लिए वो हटकर सोचता है। लोगों की बातें, उसकी हँसी उड़ाना, उनका व्यंग्य से मुस्कुराना रहरहकर उसमे दिमाग में दस्तक दे रहा है और साथ ही विक्रम का मंच पर पुरस्कार लेते हुए ख़ुशी से दमकता चेहरा उसके मन की सभी शंकाओं को पीछे धकेल रहा है।
रात के समय ...
रमा थाली में रोटी रखते हुए मोहनलाल से फिर से कहती है, "सुनिए, लोग क्या कहते हैं, उस पर ध्यान मत दीजिए। बेटा पढ़ेगा, यही उसका सपना है। वही सपना जो कभी आपका था… याद तो है न आपको ।"
मोहनलाल धीमे स्वर में बोलता है, "रमा, बात लोगों की नहीं… बात उस ज़मीन की है जो मेरे हिस्से आई थी… और अब शायद मेरे बेटे के हिस्से से दूर जा रही है…"
रमा उसे देखती है, "ज़मीन को थामे रहोगे, तो उड़ान कैसे भर पाएंगे? खुले आसमान में उड़ने के लिए ज़मीन को पैरों से खिसकना पड़ता है।"
मोहनलाल सोचते हुए हाँ में सिर हिलाता है। इस तरह आज का दिन खुशियों के साथ आया और उम्मीद का दमन थमा गया।
अगले दिन...
दिन भर खेत में काम कर मोहनलाल घर की ओर जा रहा है कि रास्ते में पुलिया पर मोहनलाल के कुछ पुराने साथी मिल गए—दिनेश, प्रकाश और कैलाश । बचपन में इन चारों की यारी ऐसी थी कि गांव के मेले हों या बरसाती खेल, हमेशा साथ दिखते। लेकिन वक़्त के साथ खेत बंट गए, सपने सिकुड़ गए और ज़िंदगी कभी-कभार ताश के पत्तों और देसी शराब की बोतलों तक सिमटकर रह गई।
प्रकाश ने दूर से देखकर हाथ हिलाया और ठहाका लगाते हुए बोला, “अरे ओ मोहन! आज तो बड़ा दिन है रे! विक्रम ने गांव का नाम रोशन कर दिया। चल, आज तो एक जाम तेरे नाम का होना चाहिए!”
मोहनलाल मुस्कुराया और संकोच से बोला , “नहीं रे भाई लोगों, रमा इंतज़ार कर रही होगी... घर जाना है।”
लेकिन कैलाश ने उसकी बाँह पकड़ ली बिलकुल पुराने अंदाज़ में, “अबे बैठ ना ! दो घूँट में क्या बिगड़ जाएगा? और देख, तेरे नाम की बोतल लेकर आए हैं आज।” उसने आँख मारी।
मोहनलाल कुछ पल रुका… भीतर कुछ लड़खड़ाया पर फिर वही पुलिया उतरकर पुरानी बेंच , वो ताश की गड्डी और साथियों के हँसी-ठहाके — वह उनको मना नहीं कर पाया और बैठ गया। दूर कहीं कुछ चटक गया…
बोतल खुली। पहले एक, फिर दूसरा, फिर तीसरा जाम.... बातों में गाँव की राजनीति घुल गई, हँसी के बीच शिकायते तैरने लगीं — “तू तो अब बड़ा आदमी बन गया”, “हम तो यहीं के रह गए”, “विक्रम अफ़सर बनेगा तो खेत कौन जोतेगा?”
मोहनलाल ने बाहर से हँसकर सबका साथ दिया, पर भीतर एक हलचल मच रही है ... बातों में मस्ती पर मोहनलाल के मन में उथल-पुथल सर । उसे अपने बेटे की आँखों का सपना याद आ रहा था… रमा की उम्मीदें, मौली की चिढ़ाती बातें और खुद की वो खामोश प्रार्थना — कि मेरा बेटा मुझसे अलग, मुझसे आगे जाए। पर अब बोतल की गर्माहट उस सोच पर भारी पड़ रही है। मिट्टी की दीवारें उसकी पीठ से सटकर जैसे कोई पुरानी गलती दोहरा रही हैं।
उधर, घर में विक्रम चुपचाप पढ़ाई कर रहा है । रमा ने रोटियां सेंक ली हैं पर मोहनलाल का कोई अता-पता नहीं है। बच्चों को खाना खिलाकर वह इंतज़ार करने लगी।
रात के करीब साढ़े नौ बजे दरवाज़ा चरमराया। विक्रम की किताबों से नज़र हटी। रमा की आँखें दरवाज़े पर ही स्थिर हो गई।
मोहनलाल दरवाज़े पर था—लड़खड़ाता हुआ, आँखें लाल, हाथों में थरथराहट — रमा चौंकती है।
एक पल को जैसे समय ठहर गया। घर की मिट्टी की दीवारें भी उस सन्नाटे में सांस रोककर खड़ी थीं। रमा आगे बढ़ी, उसकी नज़रों में चिंता, क्षोभ और एक माँ की मजबूरी का मिला-जुला अक्स था।
“इतनी देर हो गई… और ये हाल?” रमा ने धीरे लेकिन गहराई से पूछा। उसकी आवाज़ में कोई तेजी नहीं थी, पर असर कहीं ज़्यादा गहरा था।
मोहनलाल की जुबान उलझी हुई थी, “बस… कैलाश मिला था… खुशी में… थोड़ा सा…”
“खुशी में या बहकावे में?” रमा ने बिना शोर किए सवाल छोड़ा जो मोहनलाल की आत्मा तक चुभ गया।
विक्रम दूर बैठा ये सब देख रहा था। किताबें अब खुली थीं, पर अक्षर धुंधले हो चले थे। उसे समझ नहीं आ रहा था — किसे पढ़े, पिता के चेहरे को या भविष्य की उलझनों को?
रमा का दिल टूट गया..... इसके आगे वह कुछ नहीं बोली, बस चूल्हे से बचा खाना निकालकर थाली में रख दिया। मोहनलाल चुपचाप खाने खाने के लिए आसन पर बैठा परन्तु बैठते ही जैसे ढह गया। शरीर थका नहीं था, आत्मा थकी थी ग्लानि से.... हाथ में पकड़ी रोटी का टुकड़ा गिर गया।
रमा ने धीरे से खिड़की के पास जाकर चुपचाप आसमान की ओर देखा। वहाँ चाँद था — पूरा, उजला… लेकिन घर के अंदर कोई कोना ऐसा न था जो पूरी तरह रोशन हो।
विक्रम ने माँ की ओर देखा — कुछ कहने की कोशिश की, पर शब्द नहीं मिले। सिर्फ़ उसकी आँखों में एक कसक थी — और एक सवाल - क्या ये वही रास्ता है जिस पर चलकर मुझे आगे जाना है?
इस तरह विक्रम की जीत का पहला इनाम ही इम्तहान में बदल गया था।
देखते हैं कि भविष्य के गर्भ में क्या-क्या छिपा है... क्या विक्रम अपने पिता की कमज़ोरी को समझ पाएगा या दोनों में मनमुटाव की शुरुआत का ये इशारा है ?
क्या मोहनलाल फिर से खुद को समेट पाएगा या यही उसकी गिरावट की शुरुआत है?
"जहाँ इनाम मिलते हैं, वहीं नए इम्तहान भी सिर उठाने लगते हैं। कभी बाहर के, कभी भीतर के..."
क्या विक्रम और उसके पिता के मध्य भीतर ही भीतर कोई अभेद दीवार खड़ी हो जाएगी?
क्या मोहनलाल फिर से खुद को संजो पाएगा या यही से उसके टूटने की शुरुआत है?
अगले भाग में फिर मिलेंगे—एक नई सुबह, एक नई चुनौती और एक नए मोड़ के साथ → भाग 3: नई आदत पढ़ें

behatreen lekhan.
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया 🙏🙏
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