एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 5: जड़ें और जद्दोजहद
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 4: दरकती ज़मीन पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 5: जड़ें और जद्दोजहद
भीतर की जंग
मोहनलाल की आँखों में नशे की धुंध के पीछे कोई और ही जद्दोजहद चल रही थी — वो भूख से जूझते बचपन के दिन याद आ रहे थे, जब बारिश में खेत डूब जाते थे और घर में चूल्हा ठंडा पड़ जाता था। अनाज की एक मुट्ठी के लिए हाथ फैलाने पड़ते थे।
इस वक़्त उसकी आँखें भले ही नशे में डूबी हों, पर भीतर एक तूफान चल रहा है — ऐसा तूफान जो शब्दों में नहीं, यादों में उठता है। वो यादें, जब वो खुद विक्रम की उम्र का था और पेट की आग बुझाने के लिए कभी कभी कुछ नसीब नहीं होता था। खेत तब भी थे, बारिश तब भी थी लेकिन पेट कभी भर नहीं पाया था।
उसे अभी भी याद है एक ऐसा दिन, जब उसकी माँ ने उसे आखिरी रोटी खिलाकर खुद पानी पीकर सोने का बहाना किया था। और जब पिता ने पड़ोसी के सामने सिर झुकाकर कुछ उधार माँगा था — उस दिन मोहनलाल को पहली बार लगा था कि भूख केवल शरीर को नहीं, आत्मा को भी खा जाती है।
और आज, जब बेटा पढ़ाई कर रहा है, वही डर फिर आँखों के सामने तैर रहा था — कहीं पेट की भूख सपनों को न निगल जाए। अब वही भूख फिर सामने खड़ी है—एक नए चेहरे के साथ। बेटे की किताबें, बेटी की दवाई, घर का राशन… और खेत जो अब धीरे-धीरे हाथ से फिसलता जा रहा है। खेत जिसने कभी रोटी दी थी, अब बोझ बनता जा रहा है।
वो समझता है रमा की बातों को। जानता है कि विक्रम में काबिलियत है। लेकिन हर बार जब वो बेटे की किताबों में आँखें गड़ाए चेहरा देखता, उसे डर लगता — कहीं ये पढ़ाई उसे उस रास्ते पर न ले जाए जहाँ जमीन छूट जाए और जड़ें खो जाएं। दूसरी तरफ उसे यह भी लगने लगा है कि अगर बेटा भी सपनों के पीछे भागेगा, तो पेट कौन भरेगा?
उसके भीतर का किसान और पिता, दोनों भिड़ रहे हैं।
एक कहता — "बेटे को उड़ने दो", दूसरा फुसफुसाता — "पहले घर की छत तो बचा ले।"
शराब उस रात बस एक बहाना थी। असल में वो उस अंतर्द्वंद से भाग रहा था..... और यही डर, धीरे-धीरे आदत में बदलने लगा।
वह शराब का आदि होने लगा और इन सब में यह भूल गया कि इस नौबत तक पहुँचने में उसकी इसी आदत का हाथ है वरना घर-परिवार के लिए खेत काफी है ... अब जब वह खेती के काम में हाथ बटाता ही नहीं है तब जितना रमा कर पा रही है वो परिवार के लिए पर्याप्त नहीं पड़ता। लेकिन जब आदमी शराब का आदि हो जाता है तब वह इसके खिलाफ कुछ सुनना नहीं चाहता है। उसे आसान उपाय लगने लगा कि खेत गिरवी रखकर कुछ पैसे उठाये जाये पर वो भूल गया कि उसके आगे क्या होगा जब लिया गए पैसा नहीं चुकाया जायेगा ? क्या खेत बचा रहेगा तब?
इसी उहापोह में आने वाले कुछ दिन सामान्य बीते।
अचानक एक दिन
सुबह की धूप अभी ज़मीन पर फैली भी नहीं थी कि रमा की आवाज़ घर के आँगन से सड़क किनारे तक गूँज गई—“मेरी बात सुनो … ज़रा रुक तो जाओ!”
मोहनलाल ने पलटकर देखा नहीं। वह अपने कंधे पर एक झोला लेकर कहीं जा रहा है। उस कपडे के झोले में जमीन की पुरानी फाइलें, बैंक के पुराने कागज़ और एक बंधा हुआ दस्तावेज़ का लिफाफा है। कंधे से लटकते उस झोले को मोहनलाल ने अपने एक हाथ से थाम भी रखा है।
“कहाँ जा रहे हो?” रमा अब पास आ गई थी। आवाज़ में उतावलेपन के साथ साथ एक डर है जिसे वह ढंकने की कोशिश कर रही है।
मोहनलाल रुका, साँस ली और धीरे से बोला, “बैंक जा रहा हूँ… खेत गिरवी रख दूँगा। वहाँ बात नहीं बनी तो साहूकार के यहाँ खेत गिरवी रख दूँगा।”
इतने दिनों से सभी कुछ ठीक-ठाक चल रहा था तो रमा निश्चिन्त हो गई कि अचानक से फिर से मानो वज्रपात हुआ...
रमा सन्न रह गई। उसकी आँखें फैल गईं और शब्द जैसे जुबान पर आकर ठिठक गए।
“क्या कहा!”
मोहनलाल की नज़रें झुकी हुई थीं, जैसे खुद से भी मुँह चुराना चाहता हो।
“राशन वाले ने मना कर दिया उधार देने से। मौली की दवा भी खत्म हो रही है। सब देख रहा हूँ, रमा… कुछ करना ही होगा।”
रमा का चेहरा पत्थर हो गया। उसके होंठ काँपे, लेकिन वह कुछ नहीं कह सकी।
“लेकिन खेत… ये तो हमारी जड़ है।हम कुछ कर लेंगे, मिल कर एक साथ मेहनत करेंगे तो सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा … ”
मोहनलाल ने अब पहली बार उसकी आँखों में झाँका।
“क्या होगा पढ़ा-लिखा के? पेट भरने को अनाज चाहिए।” मोहनलाल ने थके स्वर में कहा जैसे अपनेआप को समझा रहा हो और रमा को भी
रमा जानती है कि खेत गिरवी रखने की बात सिर्फ ज़मीन के दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं थी, ये उनके सपनों को सौंपना है किसी और की मर्जी के हाथों।
“अगर आज हमने हार मानकर अपने खेतों को गिरवी रख दिया तो आगे छुड़ा कैसे पाएंगे? सूद ही नहीं चका पाएंगे तो मूल का तो सवाल ही नहीं उठता है, ज़रा सोचकर देखो ज़मीन छिनते देर नहीं लगेगी। बच्चों को पढ़ाना है उनको कौन संभालेगा? अभी भी समय गया नहीं है हम दोनों मिलकर अपने खेतों में काम करेंगे तो हमारा गुजारा अच्छे से चल जायेगा बस तुम अपनी पीने की आदत को छोड़ दो, सब कुछ ठीक हो जायेगा।” रमा की आवाज़ काँप रही है, आँखों में एक अनकही याचना है
रमा ने उसका हाथ थामने की कोशिश की पर मोहनलाल ने धीरे से झटका देकर अपना हाथ छुड़ा लिया और चलता चला गया।
रमा ने पुन: कुछ कहना चाहा, लेकिन उसे पता ही —ये वो मोहन नहीं है.... ये एक थका हुआ, हारा हुआ आदमी है जो अब सिर्फ बोझ महसूस करता है… सपने नहीं।
इधर विक्रम और मौली स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे हैं.... आँगन के कोने से विक्रम ने माँ-बाबा की बातों की सुनी। वो कुछ पल रुका, फिर चुपचाप अपनी किताबें अंदर रख बस्ता तैयार किया।
रमा समझ गई है कि अब उसे इस घर की नाव अकेले खेनी होगी। उसने आंसू पोछते हुए बच्चों का खाने का डिब्बा बनाया।
रात को रमा खाना परोस रही है। मौली बिस्तर पर लेटी है, माथे पर गीला कपड़ा रखा हुआ। बुखार ने उसके चेहरे की चमक छीन ली है।
“माँ, मौली की तबीयत कैसी है?” विक्रम ने किताबें मेज पर रखते हुए पूछा
“बुखार है… डॉक्टर ने दवा दी है, पर पेट में कुछ गया ही नहीं बच्ची के…” रमा ने धीरे से कहा जैसे बात कहने से ज़्यादा आँसू रोकने में लगी हो
विक्रम चुपचाप मौली के पास बैठ गया। बहन के माथे पर हाथ रखा, फिर रमा के पास जाकर बोला, “माँ,आप चिंता मत करो। किताबें मैं पुरानी वाली से पढ़ लूँगा। और…” वह रुका बहुत धीमे स्वर में बुदबुदाया, “…मैं कुछ करने की सोच रहा हूँ।”
रमा ने उसकी तरफ देखा, कुछ कहना चाहा, लेकिन चुप रह गई।
विक्रम अब बचपन की दहलीज़ से आगे बढ़कर कुछ ठान रहा है।
रमा की आँखों में आँसू हैं, लेकिन उनके पीछे एक मौन विश्वास भी है।
और मोहनलाल... वो शायद अभी भी भीतर की लड़ाई हारने और जीतने के बीच कहीं अटका है।
क्रमश:
hardship reflected in the story.nice part.
जवाब देंहटाएंso true. thank you so much for reading my blog🙏🙏
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