शोर - लघु कथा
![]() |
| शोर - एक भावपूर्ण हिंदी लघु कथा |
शोर
हिंदी लघु कथा
"दादी, बॉल आ गयी है,दे दीजिए।" डरते-डरते कॉलोनी के बच्चों ने रमादेवी से कहा
"जब देखो तब शोर मचाते रहते हो, चैन से रहने भी नहीं देते। बिना आवाज किये खेला करो। घंटी दबाकर बॉल मांगने चले आए, लो अपनी बॉल !" गुस्से में रमादेवी ने आव देखा न ताव बॉल उठाकर बाहर रखे डस्टबिन में फेंक दी।
बच्चे अपना सा मुँह लेकर चले गए।
कुछ दिनों बाद ..
रमादेवी अस्पताल के मैटरनिटी वार्ड के बाहर खड़ी बहु की डिलीवरी की प्रतीक्षा कर रही थीं।
डॉक्टर बोली,"बच्ची रो नहीं रही है!'
रमादेवी सन्न रह गयीं। बच्चों को कोसना याद आगया, पल में ही ईश्वर से प्रार्थना करने लगीं,
"हे ईश्वर! बच्चों को शोर करने पर नहीं डाटूंगी बस मेरी पोती की आवाज़ सुना दो। "
तभी अंदर से नवजात के रोने की आवाज़ आई....
-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'
(मौलिक व स्वरचित)
३० सितम्बर २०२१
"बच्चों की आवाज़ में ही घर की असली रौनक बसती है।
कभी-कभी जो शोर लगता है, वही जीवन की सबसे प्यारी धुन होता है।"
✍️ लेखिका के बारे में
पारंपरिक शिल्प को आधुनिक दृष्टि से जोड़ते हुए, वे शब्दों में सादगी और भावों में गहराई रचती हैं। उनकी रचनाओं में आत्मसंवाद, विरह और अस्तित्व के प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरते हैं, जो पाठक को भीतर तक छू जाते हैं।
“प्रियंका की कलम से” उनके साहित्यिक लेखन, ज्ञानवर्धक लेखों और भाव-अभिव्यक्ति का सजीव मंच है। वे अपने ब्लॉग के माध्यम से हिंदी साहित्य, संस्कृति, इतिहास और हिंदी व्याकरण से जुड़े विषयों को सरल और सारगर्भित रूप में पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास करती हैं।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें