स्वाद - लघु कथा


स्वाद

हिंदी लघु कथा

"कामिनी जी आजकल ना जाने क्यों किसी भी फल सब्जी में स्वाद नहीं आता। " 

"सही कह रहे हैं आप सब्जी-फल  में वो ताज़गी नहीं, बस आकार बढ़ा हो गया है। कोई मौसमी सब्जी नहीं! सभी ऋतुओं में सारी  सब्जी-फल आने लगे हैं।"

घर में कारखाने का मैनेजर हिसाब-किताब का रहा था।  मन में सोचा ," सेठजी, सब आप जैसों का ही कमाल है , खाद में रसायन मिलाकर पैदावार जल्दी तैयार की जाती है। फल-सब्जी हर मौसम में उगाए जाते हैं, तरह-तरह की दवाइयों-इंजेक्शनों से साइज बढ़ाया जाता है और ये रासायनिक खाद, दवाई-इंजेक्शन आप जैसे सेठों की फैक्टरियों में बनाया जाता है।  तब याद नहीं आती कि कृत्रिमता से उगाई फल-सब्जी-अनाज में स्वाद नहीं आएगा तब तो मुनाफे की पड़ी रहती है। 

-प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

(मौलिक व स्वरचित)

२ सितम्बर २०२१ 

✍️ लेखिका के बारे में

प्रियंका सक्सेना ‘जयपुरी’ समकालीन हिंदी साहित्य में सक्रिय लेखिका हैं। वे कविता, ग़ज़ल, उपन्यास, कहानी तथा हिंदी साहित्य, संस्कृति, इतिहास और हिंदी व्याकरण से जुड़े विचारात्मक लेखन में रुचि रखती हैं। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, मौन के अर्थ, प्रेम की नाज़ुकता, जीवन की क्षणभंगुरता और रिश्तों की जटिल भावनाएँ सूक्ष्मता से उभरती हैं।

पारंपरिक शिल्प को आधुनिक दृष्टि से जोड़ते हुए, वे शब्दों में सादगी और भावों में गहराई रचती हैं। उनकी रचनाओं में आत्मसंवाद, विरह और अस्तित्व के प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरते हैं, जो पाठक को भीतर तक छू जाते हैं।

प्रियंका की कलम से उनके साहित्यिक लेखन, ज्ञानवर्धक लेखों और भाव-अभिव्यक्ति का सजीव मंच है। वे अपने ब्लॉग के माध्यम से हिंदी साहित्य, संस्कृति, इतिहास और हिंदी व्याकरण से जुड़े विषयों को सरल और सारगर्भित रूप में पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास करती हैं।

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