एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 35: गांव की चुप्पी और एक लिंक का राज़

 अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 34: गुमनाम नेटवर्क, गूंजती आवाज़ पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 35: गांव की चुप्पी और एक लिंक का राज़

पुरानी गलियों की चुप्पियां 

विक्रम मौली की नोटबुक से मिले एक नोट से सोच में पड़ गया।
पन्ने पर लिखा हुआ था -
“भैया, मुझे डर लगता है… पड़ोस के वो अंकल कुछ अजीब करते हैं…”

साथ ही उसके दिमाग में राजीव की खोजी लोकेशन के बारे में भी बहुत कुछ चल रहा है। राजीव ने अनजान कॉल जो मौली के गायब होने के साल के बाद मौली लर्निंग हब के उद्घाटन वाले दिन सक्रीय हुई थी उसके बारे में जाँच कर कहा था  - “एक पुराना साइबर कैफे… राजस्थान के पास। वहाँ से अंतिम पिंग आया था।”

उसने राजीव की भेजी लोकेशन पर जाने से पहले गांव की गलियों में घूमकर कुछ मालूम करने की ठानी। यदि मौली को कुछ दिखा था तो गांव में किसी और को या बहुतों को कुछ तो पता होगा ही। 

उसने सुबह होते ही माँ बाबा से इस बाबत पूछा उन्हें मौली का लिखा नोट  दिखाया। माँ उसे  कुछ अधूरी बातें बताती हैं , "मौली कुछ दिनों से गुमसुम रहती थी।  कुछ पूछो तो बताती नहीं थी।  इधर उधर की बातें कर ध्यान भटका देती थी।  ज्यादा पूछा तो बोली कि खास बात नहीं है पढ़ाई में समझ में नहीं आ रहा है।  लेकिन अब या देखकर लग रहा है कि पक्का कोई बात तो थी जिससे वो इतनी परेशान रहती थी।  काश उसने मुझसे अपनी माँ से बताया होता तो शायद मौली हमारे साथ होती।  मैंने क्यों नहीं उससे ज़ोर देकर पूछा?" कहकर रमा पश्चाताप के आँसू बहाने लगी 

विक्रम और बाबा दोनों ने ही उसे समझाया कि इन सबमें उनकी कोई गलती नहीं है।  हाँ लेकिन मौली को क्या हुआ था? वो किस बात से परेशान या दरी रहती थी ? यह पता लगाना बहुत ज़रूरी है तभी हम मौली के गायब होने का रहस्य सुलझा पाएंगे। 

माँ, बाबा और प्रिया को आज सुबह ही पुणे निकलना है उनकी ट्रेन साढ़े सात बजे की है  उन्हें स्टेशन छोड़ने विक्रम खुद गया। ट्रेन  में अच्छे से बैठाकर वो वापिस आकर फ्रेश होकर तैयार हुआ। विश्राम गृह में नाश्ते के तुरंत बाद ही विक्रम आस्था के साथ निकल पड़ा। थोड़ी दूर जाने पर आस्था और विक्रम अलग-अलग हो गए।  उन्होंने सोचा कि वे दोनों गांव में जाकर अपने हिसाब से पूछताछ करेंगे। 

विक्रम निकल पड़ा पैदल ही अपने  गांव की गलियों में से मौली के गायब होने का कारण  ढूंढने.... गांव की गलियां वही हैं .... टेढ़ी-मेढ़ी, मिट्टी से सनी हुई, जिन पर कभी मौली चप्पलें घसीटती भागा करती थी लेकिन विक्रम के लिए मानो अब सब कुछ बदल गया है । हर घर के दरवाज़े बंद हैं , खिड़कियाँ अधखुली और हवा में एक अजीब-सी संकोच भरी सिहरन।

विक्रम धीरे-धीरे इन गलियों से गुज़र रहा है । हर एक मोड़ पर कुछ पुरानी यादें लहर की तरह उसे छू जातीं और फिर मिट्टी में समा जातीं।

"राम राम काकी," उसने एक बुज़ुर्ग महिला को नमस्ते करते हुए कहा
महिला झपककर उसकी ओर मुड़ी। चेहरा एक पल को पहचानने की कोशिश करता रहा, फिर अचानक उसकी आँखों में चमक आ गई, 
“अरे तू… तू मौली का भैया है ना? क्या नाम है तेरा भला ?
"काकी विक्रम हूँ मैं मौली का भाई। ”
कहते-कहते विक्रम का गला भर आया। उसने  आगे बढ़कर उनके पैर छू लिए ।
महिला के होंठ काँपे, “बिटिया बड़ी होशियार थी… भगवान उसकी आत्मा को शांति दे,” उसने धीरे से कहा और फिर विक्रम के कुछ पूछने से पहले ही अचानक उसका चेहरा सख्त हो गया। आँखों में भय और होठों पर चुप्पी उतर आई।
“काकी, प्लीज़… क्या हुआ था उस दिन?” विक्रम ने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में पूछा।
महिला ने इधर-उधर देखा जैसे हवा तक से डर रही हो, “हम कुछ नहीं जानते बेटा…” कहकर उसने झट से दरवाज़ा बंद कर लिया।

विक्रम सन्न खड़ा रह गया।
कुछ और घरों में भी उसने दस्तक दी - हर बार वही डर, वही टाल-मटोल। कुछ नज़रें खिड़की से उसे देखतीं और फिर पर्दा गिरा दिया जाता।
गाँव की ये खामोशी अब शांति नहीं, बल्कि एक गहरे रहस्य की परछाई लगने लगी है।

आस्था की कोशिशें

उधर आस्था गाँव की महिलाओं से लर्निंग हब के लिए सर्वे कर रही है । उसके हाथ में टैबलेट है , मुस्कान चेहरे पर, और ढेर सारा धैर्य दिल में।
“आपकी बेटियाँ अगर डिजिटल स्किल्स सीखेंगी तो स्कूल की पढ़ाई भी बेहतर होगी,” उसने एक महिला को समझाने की कोशिश की।
“हमें इन चक्करों में नहीं पड़ना,” पास खड़ा एक अधेड़ पुरुष गरजा।
“हमारी बहू-बेटियाँ अब क्या इंटरनेट सीखेंगी? पहले रोटियाँ सीधी बनाना सीख लें।” पीछे से लड़कियों की दादी अम्मा चिल्लाई 
आस्था मुस्कुराई नहीं, इस बार सीधा बोली, “रोटियाँ सीधी बनाना ज़रूरी है पर दुनिया सीधी समझना उससे भी ज़रूरी है।”
कुछ लड़कियाँ जो पास खड़ी है , वे अपनी हँसी छुपा कर मुस्कराईं। शायद उन्हें आशा नहीं थी की दादी अम्मा को भी कोई ज़वाब दे सकता है। 
लेकिन वही पास में एक सत्रह अठारह साल की लड़की जो चुपचाप खड़ी थी, उसने अचानक धीरे से कहा -
“मौली दीदी ने भी कुछ कहा था…”
आस्था चौंकी, “क्या?”
लड़की सहम गई। “नहीं… कुछ नहीं,” कहकर पीछे मुड़ गई
पर आस्था ने उसकी आँखों में झांककर उस ख़ौफ़ को महसूस कर लिया था - एक अनकहा सच जो होठों तक आते-आते कहीं गुम हो गया।

इसी तरह कुछ घरों में आस्था को सकारात्मक वहीं अघिकतर घरों में लड़कयों के कंप्यूटर सीखने पर नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली।  लड़कों को अच्छी शिक्षा दिलाने और उन्हें डिजिटल शिक्षा के लिए अधिकतर घरों से हाँ में उत्तर मिले एकाध घरों ने तो लड़कों के लिए भी कहा कि खेती ही तो करनी है स्कूल में पढ़ाई कर तो रहे हैं इससे ज्यादा पढ़कर कौन सा कलेक्टर बनना है ?

एक अनजान मेल

इन्ही मिले-जुले जवाबों को लेकर विक्रम और आस्था शाम को विश्राम गृह लौटे।  आपस में दोनों ने अपना अपना अनुभव शेयर किये और इस नतीजे पर पहुंचे कि गांव में मौली से सम्बंधित कुछ सुगबुगाहट तो निश्चित है।  कुछ लोग या मौली की सहेलियां या उसके आस पास की लड़कियां लड़के कुछ जानते होंगे शायद.... लेकिन ये सब उनसे निकलवाना इतना आसान नहीं है। 

यह सोचा गया कि जब गांव के लोगों का भरोसा मौली लर्निंग हब पर हो जायेगा , बच्चे आने लगेंगे तब शायद वे कुछ मालूम कर सके।   

शाम हो चली है । हवाओं में हल्की ठंडक और विक्रम के मन में गहराता संदेह।
वो अपने कमरे में बैठा फिर से उस सिस्टम के लॉग्स खंगाल रहा था - VoIP ट्रेसिंग, VPN ट्रैफिक, DNS लीक्स - प्रिया ने जो-जो भेजा था, सब उसकी स्क्रीन पर है।

“Untraceable VoIP Attempt Blocked”- उस रात की आखिरी पंक्ति अभी भी चमक रही थी। मतलब कॉल करने वाला Tor नेटवर्क जैसे किसी गुमनाम प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल कर रहा था जो खुद को लगातार बदलता है।
विक्रम बुदबुदाया, “Tor - The Onion Router… कई लेयर्स, हर परत के पीछे एक और परत… जैसे इस गांव की कहानी।”

अचानक एक मेल का नोटिफिकेशन आया।
Subject: “I know what happened to your sister.”
Sender: [unknown@securemail.zone]
विक्रम की साँस अटक गई।
उसने कांपते हाथों से मेल खोला। बॉडी में बस एक लाइन थी—
"Meet me on the  border - Rajasthan border Jaisalmer."
(मेल का विषय- मैं जानता हूॅं तुम्हारी बहन को साथ क्या हुआ था
भेजने वाला एड्रेस - अज्ञात सुरक्षित ईमेल से भेजा गया 
मेल मे बह एक लाइन लिखी गई थी
"मुझे बार्डर पर मिलो- राजस्थान बार्डर जैसलमेर ")
कोई जगह नहीं, कोई टाइम नहीं, सिर्फ़ एक लिंक जो एक एन्क्रिप्टेड चैट सर्वर की ओर ले जा रहा है।

विक्रम ने तुरंत लैपटॉप बंद किया और बालकनी में आकर बैठ गया। दूर लहराते खेतों में मौली की हँसी की गूँज महसूस होने लगी।
“भैया…” जैसे वो आवाज़ फिर से कानों में पड़ रही है।

विक्रम ने आस्था को फ़ोन कर बुलाया। 
आस्था कमरे में आई। उसकी आँखों में चिंता है।
“क्या हुआ मेल में?”
विक्रम ने स्क्रीन दिखाया। “कोई मुझे मिलने बुला रहा है… सीमा पर।”
“ये बहुत बड़ा रिस्क है,” आस्था ने धीमे से कहा
विक्रम की आवाज़ कठोर हो गई, “अब रिस्क लेने का समय आ गया है। मौली की सच्चाई अब और छिपी नहीं रहनी चाहिए। राजीव की खोजी गई लोकेशन भी यही है वहीं चलना होगा।”

रात  गहराती जा रही है। लाइट चली गई थी। मोमबत्ती की लौ में विक्रम की आँखें चमक रही हैं  और उनमें झलक रही है सिर्फ़ एक छवि - मौली की।
उसका खिलखिलाता चेहरा, टूटी चप्पलें और वो कागज़ का गुलाब जो उसने विदाई वाले दिन दिया था।
“भैया… सच्चाई कभी छुपती नहीं…”
उसकी आवाज़ जैसे फिर से हवा में तैर गई।

क्रमशः 
आगे क्या होता है जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 36 : रिश्तों की दीवारों में गूँजता जीवन
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