वर्षा की विभीषिका: एक बारिश, दो दुनिया और गरीब का दर्द | कविता

वर्षा की विभीषिका में मूसलाधार बारिश के बीच टीन की झोपड़ी और सुरक्षित पक्के घर के बीच सामाजिक असमानता का दृश्य
एक ही बारिश लेकिन किसी के लिए रिमझिम और किसी के लिए विभीषिका।

वर्षा की विभीषिका

वर्षा की विभीषिका, केवल मूसलाधार बारिश, बाढ़ या जलभराव का चित्रण नहीं है। यह कविता उस सामाजिक असमानता पर सवाल उठाती है जहाँ एक ही बारिश किसी के लिए रिमझिम फुहार और सुखद संगीत बन जाती है, तो किसी गरीब परिवार के लिए उजड़ते घर, भूख, बेबसी और जीवन-मृत्यु के संघर्ष का कारण।
इस कविता का उद्देश्य वर्षा से होने वाली तबाही के पीछे छिपी उस कड़वी सच्चाई को सामने लाना है कि प्राकृतिक आपदा का सबसे गहरा असर अक्सर उन लोगों पर पड़ता है, जिनके पास सुरक्षित घर, संसाधन और संकट से बच निकलने के साधन नहीं होते। 
वर्षा की विभीषिका, इसी सवाल को पाठक के सामने रखती है - क्या आपदा केवल प्रकृति की देन है या सामाजिक और आर्थिक असमानता भी उसकी विभीषिका को बढ़ाती है?
यह कविता बारिश के बहाने गरीबी, सामाजिक असमानता और व्यवस्था की संवेदनहीनता पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

हिंदी कविता 

मुक्तक

काले बादल गरजे, बिजली कड़की
और आसमान से उतर आई
एक ऐसी रात, 
जिसमें पानी कम, आफ़त ज़्यादा थी।

आसमान फटा, 
और धरती पर उतर आई कयामत,  
बादल नहीं थे वो, 
किसी गरीब की चीखें थीं जो घिर आई थीं।  

टीन की छत पर
बूंदें हथौड़ों-सी बरसती रहीं,
और हर टपकन के साथ
एक और सपना टूटता रहा।

घर  की छत पर बरसती बूंदें
बूंदें नहीं थीं, तीव्र प्रहार था 
जो हर चोट के साथ छत में ही नहीं,
घर के सपनों में भी छेद करती जाती थीं।

छत के बीचों-बीच
एक बड़ा-सा घाव था,
उसी घाव से रिस-रिसकर
घर में उतर रही थी बेबसी।

टप... टप... टप... टप...
एक बूँद थाली में, कुछ बाल्टी में, कुछ भगोने में,
और एक उस बच्चे की आँख में गिरी
जो भीगी कॉपी में डूबते हुए सपनों को बचा रहा था।

टूटी छत के नीचे
थाली, बाल्टी, भगोने रखे थे
जहाँ कभी चूल्हा जलता था,
वहीं अब पानी भर रहा था।

माँ ने साड़ी का पल्लू तानकर
दीवार और छत के बीच बाँध दिया,
बच्चे को सीने से चिपकाकर
बारिश से नहीं, भविष्य से लड़ती रही।

बारिश तेजी से बढ़ती रही ।
घर में पानी का सैलाब उफनता रहा। 
माँ की बाँहें छोटी पड़ती रहीं
पर उसने बच्चे को नहीं छोड़ा।

चूल्हा बुझा था, लकड़ियाँ भीगी थीं,
आटा गीला था, चावल में फफूंद उतर आई थी।
घर में सब कुछ था, थाली थी,
भगोना था, बचा-खुचा अनाज भीगा पड़ा था।

बस रोटी नहीं थी।
और भूख
वह रोज़ की तरह
आज भी समय पर आई थी।

फटे कपड़ों में सिकुड़ता बचपन,
ठिठुरती उँगलियाँ, काँपते होंठ
सिर्फ ठंड से नहीं काँप रहे थे 
गरीबी भीगकर और भारी हो गई थी।

बारिश बाहर थी और सर्दी घर के भीतर।
एक कोने में फटी हुई बोरी,
दो स्टील की थालियाँ, कुछ भीगे कपड़े
और एक कॉपी जिस पर लिखा था “कक्षा पाँच।”

बच्चे ने कॉपी खोली,
अक्षर पानी में बह रहे थे।
उसने पूछा
“माँ, मेरी किताब क्यों रो रही है?”

माँ ने उसे देखा, कुछ कहना चाहा
पर शब्दों से पहले आँखें भर आईं।
बच्चा फिर बोला
“माँ, स्कूल कब खुलेंगे?”

माँ चुप रही।
फिर “माँ, रोटी कब मिलेगी?”
माँ ने उसे कसकर सीने से लगा लिया।
कुछ प्रश्नों के उत्तर माँ के पास भी नहीं होते।

बाहर सड़कें दरिया बन चुकी थीं,
सड़कें नदी बन चुकी थीं,
नालियाँ घरों में उतर आई थीं,
कीचड़ ने आँगन निगल लिया था।

पानी के साथ आए कीड़े ,
आई बदबू , आई बीमारी
और आई एक ऐसी लाचारी
जिसका कोई नाम नहीं।

बच्चे का माथा तप रहा था, 
बुखार का ताप बारिश की ठंड से लड़ता था,
दवा के पैसे नहीं थे, 
डॉक्टर तक जाने को रास्ता नहीं था।

बाहर पानी बरसता था, 
भीतर बीमारी पलती थी। 
गरीब की बीमारी को बारिश से बड़ी 
और क्या आफ़त चाहिए?

उधर पड़ोसी की छत गिरी,
एक चीख उठी, फिर दूसरी,
दीवारें काँपीं, बच्चे सहमे,
माएँ रातभर जागती रहीं।

एक पिता रात भर टूटी छत थामे रहा,
जैसे छत नहीं, घर का भार हो,
उसके कंधों पर टिका हो जैसे
पूरा परिवार, पूरा संसार हो।

हथेलियाँ छिल गईं, कंधे जवाब दे गए,
फिर भी उसने हाथ नहीं हटाया,
गरीब आदमी अपना घर नहीं छोड़ता
वह अपने घर के साथ खुद भी टूटता जाता है।

सुबह हुई, बारिश कुछ थमी,
पर घर कहाँ था, कीचड़ ही कीचड़ था,
टूटी चारपाई, गीली किताबें,
और पानी में बहा हुआ सारा अनाज था।

उस बच्चे का बचपन भीगा था,
बाप ने जेब टटोली, खाली थी,
मजदूरी का दिन पानी बहा ले गया,
ठेकेदार का फोन भी खामोश था।

काम नहीं था, रोटी नहीं थी,
आँखों में बस भूख का साया था,
उम्मीद भी भीगकर काँप रही थी,
घर के किसी कोने में पड़ी थी।

तभी सरकारी गाड़ी आई, कुछ लोग उतर आए,
कुछ तस्वीरें खिंचीं, कुछ कागज़ खुल गए,
कुछ शब्द हवा में तैरते रहे,
“सर्वे होगा… राहत आएगी… मदद मिलेगी…”

फिर गाड़ी चली गई,
कीचड़ उछालती हुई आगे बढ़ गई,
पीछे रह गई टूटे घर की दीवारें,
और वादों की धुंधली-सी परछाइयाँ।

एक झोपड़ी,
एक परिवार,
और उम्मीद से लंबा
एक अंतहीन इंतज़ार।

टीवी पर एंकर चीख रहा था
“सौ साल की सबसे भारी बारिश!”
स्क्रीन के नीचे एक पट्टी चमक रही थी
“सरकार राहत देगी।”

और उसी समय एक बूढ़ी औरत,
टूटी चारपाई पर बैठी,
धूप खोज रही थी अपने गीले आधार कार्ड के लिए
क्योंकि भूख से पहले कागज़ सूखना ज़रूरी था।

बिना कागज़ राशन नहीं,
बिना नाम राहत नहीं,
बिना प्रमाण मदद नहीं
फिर कैसे मिटेगी पेट की जलती आग?

और बिना मदद,
गरीब फिर अपने हिस्से की विभीषिका उठाता है,
पानी उतर जाता है, पर बेबसी रह जाती है,
और इंतज़ार फिर अगली बारिश तक चलता है।

बारिश थम जाएगी, पानी उतर जाएगा,
नदियाँ अपनी सीमा में लौट जाएँगी,
सड़कें फिर बनेंगी, बाज़ार फिर सजेंगे,
शहर भी अपनी रफ़्तार पकड़ लेगा।

लेकिन सूखे रास्तों पर निशान रहेंगे,
एक टूटी छत, एक बुझा चूल्हा,
एक भीगी किताब, एक अधूरा बचपन,
और माँ की आँखों में ठहरा पानी।

जिस घर का चूल्हा तीन दिन बुझा रहा,
वहाँ पतीली से धुआँ फिर कब उठेगा?
जिस बच्चे की किताब पानी में गल गई,
पढ़ाई का सिलसिला फिर कौन जोड़ेगा?

माँ खुद भीगती रही, बच्चे को आँचल में छिपाती रही,
उसके आँचल की नमी का हिसाब कौन रखेगा?
पिता रातभर टूटी छत थामे खड़ा रहा,
उसकी हथेलियों के छालों का दर्द कौन समझेगा?

हे बादल! बरस,
धरती की प्यास बुझाने को, नदियों को जीवन देने को,
बीजों में हरियाली भरने को,
सूखे खेतों में नई उम्मीद बोने को।

बरस, पर इतना नहीं
कि खेत डूब जाएँ, फसलें गल जाएँ,
बरस, पर इतना नहीं
कि घर की देहरी तक सैलाब आ जाए।

बरस, पर मत बन 
उस गरीब की छत का दुश्मन,
जिसने मुश्किल से चार बाँसों पर 
अभी-अभी अपना आसमान टाँगा है। 

जिसके पास महल है, उसके लिए बारिश
खिड़की पर बजता एक मधुर मल्हार है।
जिसके पास पक्की छत है,
उसके लिए बारिश चाय की प्याली है।

शीशे चढ़ाकर कार के, बारिश से बेख़बर जो निकले,
बारिश उसके लिए एक खुशनुमा मौसम है।
हाँ, जिसके सिर पर टीन की छत है
हर तेज बौछार एक अग्रिम चेतावनी है।

हर मूसलाधार बारिश उसके लिए इम्तिहान,
हर गरज उसके भीतर का डर है,
हर बाढ़ एक बढ़ता हुआ कर्ज़,
भूख की एक और गहरी परत है।

हर डूबी हुई झोपड़ी के साथ
एक घर नहीं, उम्मीद भी डूबती है,
पानी उतर जाता है पर गरीबी
और, थोड़ी और, गहरी हो जाती है।

बारिश रुकती है, पर विभीषिका नहीं।
पानी उतरता है, पर निशान नहीं।
कीचड़ सूखता है पर घाव नहीं।
किताबें सूखती हैं, पर बचपन नहीं।

दीवारें फिर उठ जाती हैं,
पर जो भरोसा एक बार गिर जाए,
वह दीवारों के साथ फिर नहीं उठता,
उसकी दरारें भीतर तक रह जाती हैं।

बारिश चुप है, बादल चुप हैं।
सरकार के कागज़ चुप हैं।
टीवी की पट्टी बदल गई।
शहर की खबर बदल गई।

पर वह प्रश्न अब भी उसी टूटी झोपड़ी की दीवार पर लिखा है,
हर बरसात उसे फिर पढ़ जाती है, फिर वही सवाल उठाती है,
आख़िर क्यों हर आपदा का सबसे बड़ा भार,
हर बार गरीब के हिस्से में ही आता है?

प्रकृति की मार सभी पर पड़ती है
पर सहने की ताक़त सभी के पास नहीं होती।
बाढ़ सभी के दरवाज़े तक पहुँच सकती है
पर हर किसी के पास दरवाज़ा नहीं होता।

बारिश सभी के आँगन में उतरती है
पर हर किसी के पास छत नहीं होती।
और आँधी सभी के सपनों को हिला सकती है
पर हर किसी के पास सपनों को बचाने के साधन नहीं होते।

अगली बार जब बादल गरजें, तो समझना बारिश सिर्फ़ पानी नहीं
कभी घर, कभी चूल्हा, कभी रोटी, कभी रोज़गार बहा ले जाती है।
कभी किताब, कभी बचपन, कभी आँखों की आख़िरी उम्मीद छीन लेती है,
और कभी किसी गरीब का पूरा का पूरा भविष्य बहा ले जाती है।

टपकती टीन की छत वाली झोपड़ी के अंदर बारिश से बच्चे को बचाती माँ
गरीब की झोपड़ी में बारिश की हर बूंद एक नई चिंता लेकर आती है।

सबसे बड़ी विभीषिका, वर्षा नहीं, वो दुनिया है,
जहाँ किसी के लिए बारिश रिमझिम सुखद संगीत है,
और किसी के लिए ज़िंदगी और मौत के बीच
टपकती हुई एक-एक बूंद।

तब सवाल यह नहीं होगा कि बारिश कितनी तेज़ थी
सवाल यह होगा कि क्यों हर बार
आपदा सबसे पहले
गरीब के घर का दरवाज़ा खटखटाती है?

और उससे भी बड़ा सवाल, क्या बारिश की विभीषिका
सिर्फ आसमान की देन है, या उस व्यवस्था की भी,
जहाँ किसी के पास बचाने को सब कुछ है
और किसी के पास खोने के लिए सिर्फ एक झोपड़ी?

शायद
गरीब होना ही
इस दुनिया की
सबसे बड़ी विभीषिका है।

✍️ लेखिका के बारे में

प्रियंका सक्सेना ‘जयपुरी’ समकालीन हिंदी साहित्य में सक्रिय लेखिका हैं। वे कविता, ग़ज़ल, कहानी, उपन्यास, हिंदी साहित्य और विचारात्मक लेखन में रुचि रखती हैं। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, मौन के अर्थ, प्रेम की नाज़ुकता, जीवन की क्षणभंगुरता और रिश्तों की जटिल भावनाएँ सूक्ष्मता से उभरती हैं। पारंपरिक शिल्प को आधुनिक दृष्टि से जोड़ते हुए, वे शब्दों में सादगी और भावों में गहराई रचती हैं। उनकी रचनाओं में आत्मसंवाद, विरह और अस्तित्व के प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरते हैं, जो पाठक को भीतर तक छू जाते हैं।

“प्रियंका की कलम से” उनके साहित्यिक लेखन और भाव-अभिव्यक्ति का सजीव मंच है।


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