हिंदी दिवस विशेष: हिंदी मेरी पहचान | हिंदी दिवस पर कविता

हिन्दी दिवस पर हिन्दी भाषा की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती खुली पुस्तक
हिन्दी केवल भाषा नहीं, हमारी संस्कृति, संस्कार और भावनाओं की पहचान है।

हिंदी मेरी पहचान

हिंदी केवल हमारी भाषा नहीं, हमारी संस्कृति, संस्कार, भावनाओं और साहित्यिक विरासत की जीवंत अभिव्यक्ति है। हिंदी दिवस के अवसर पर लिखी यह कविता हिंदी के उसी आत्मीय और समृद्ध स्वरूप को समर्पित है। माँ की पहली बोली से लेकर लोकगीतों, साहित्य, रिश्तों और आधुनिक तकनीकी युग तक हिंदी की निरंतर यात्रा को इसमें शब्द दिए गए हैं। यह कविता हिंदी के प्रति प्रेम, सम्मान और गौरव की भावना को समर्पित एक विनम्र प्रयास है।

हिंदी दिवस पर विशेष कविता

माथे की बिंदी-सी सजे,
हृदय में बनकर प्यार,
शब्द-शब्द में महके जिसकी
माटी की सौंधी बहार।

माँ की पहली बोली हिंदी,
मन की पहली आस,
इसमें ही तो घुली हुई है
अपनेपन की मिठास।

दादी की मीठी लोरी में,
नानी के किस्सों में,
गाँव की पगडंडी में बसती,
शहरों की गलियों में।

मंदिर की घंटी-सी पावन,
बाँसुरी-सी मधुर,
कभी कबीर की साखी बनती,
कभी रहीम का सुर।

कभी लोकगीतों में झूमे,
कभी भक्ति की धार,
कभी प्रेम के रंग में भीगे,
कभी बने हुंकार।

कभी कहानी बनकर बोले,
कभी कविता का रूप,
कभी किसी की चिट्ठी बनकर
मन को दे जाए सुकून।

प्रेमचंद की कलम से निकली
जन-जीवन की पीर,
महादेवी की वेदना बनकर
बहती भावों की नीर।

दिनकर की ओजस्वी वाणी
बन जाती जयगान,
बच्चन की मधुशाला बनकर
छू ले मन के प्राण।

कितने युग आए, कितने गए,
बदले जीवन के व्यवहार,
हर परिवर्तन के संग हिंदी
बढ़ती गई लगातार।

ब्रज की मिठास, अवध की गरिमा,
राजस्थानी रंग,
भोजपुरी की सहज रवानी,
हर बोली का संग।

लोकभाषाओं की खुशबू पाकर
होती और विशाल,
जन-जन की बोली बनकर
रचती नया कमाल।

खेतों की मेड़ों पर हिंदी,
चौपालों की शान,
शहरों की आपाधापी में
बनती मन की मुस्कान।

कहीं हँसी की खिलखिलाहट,
कहीं विरह की पीर,
कहीं प्रेम की मधुर कहानी,
कहीं क्रांति की तस्वीर।

हिंदी केवल भाषा नहीं है,
यह अपना संस्कार,
इसमें धड़कता स्वर्णिम अतीत,
अपना आज, कल और विचार।

इसमें माँ का आँचल बसता,
मिट्टी की सौंधी गंध,
रिश्तों की गरमाहट बसती,
मन का कोमल स्पंदन।

अब अक्षर काग़ज़ तक सीमित
रहना कहाँ करें स्वीकार,
मोबाइल की स्क्रीन से लेकर
छाए दुनिया के उस पार।

नए समय की नई ज़ुबाँ में
नए रूप धरती,
तकनीकी युग की तेज़ हवा में
अपनी राह बनाती।

शब्द वही हैं, भाव वही हैं,
बदला केवल रूप,
आज भी मन तक पहुँचाती
अपनापन और प्रेम भरपूर।

दूसरी भाषाएँ सीखें हम,
करें उनका भी सम्मान,
मातृभाषा हिंदी संग,
बढ़ता रहे अपना जहान।

हिंदी को केवल दिवसों में
याद करें, यह बात नहीं,
जीवन के हर शब्द में बसाएँ,
इससे बढ़कर सौगात नहीं।

बोले हिंदी, लिखे हिंदी,
हिंदी में मुस्काएँ,
अपने शब्दों की इस धरती पर
नव-अक्षर खिलाएं।

हिंदी मेरी आवाज़ भी है,
हिंदी मेरा मान,
मेरे शब्दों में जीवित हिंदी,
मेरी अपनी पहचान।

हिंदी दिवस का पर्व यही हो,
मन में दीप जलाएं,
हिंदी को केवल बोले नहीं,
जिये, लिखे, अपनाएं।

✍️ लेखिका के बारे में

प्रियंका सक्सेना ‘जयपुरी’ समकालीन हिंदी साहित्य में सक्रिय लेखिका हैं। वे कविता, ग़ज़ल, कहानी, उपन्यास, हिंदी साहित्य और विचारात्मक लेखन में रुचि रखती हैं। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, मौन के अर्थ, प्रेम की नाज़ुकता, जीवन की क्षणभंगुरता और रिश्तों की जटिल भावनाएँ सूक्ष्मता से उभरती हैं। पारंपरिक शिल्प को आधुनिक दृष्टि से जोड़ते हुए, वे शब्दों में सादगी और भावों में गहराई रचती हैं। उनकी रचनाओं में आत्मसंवाद, विरह और अस्तित्व के प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरते हैं, जो पाठक को भीतर तक छू जाते हैं।

“प्रियंका की कलम से” उनके साहित्यिक लेखन और भाव-अभिव्यक्ति का सजीव मंच है।

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