अवसाद का दंश:आशा अब नहीं बोलेगी!

अलोक  बिलख बिलख कर आशा  के निर्जीव शरीर से लिपट कर कह रहे थे, "तुम बिन मैं कुछ नहीं, आशा | ना जाओ मुझे छोड़कर| " अस्मि  और अर्नव भी फफक फफक कर रो रहे थे| अपने पिता को आशा  से अलग करते हुए अर्नवरोते रोते बोला, "पापा, मम्मी चली गई हैं हमेशा के लिए हमें छोड़कर| अब कभी वापस नहीं आएंगी|"

मोहल्ले, पड़ोसी, नाते-रिश्तेदारों ने सम्भाला| कैसे न कैसे कर के आशा  के सभी काम किये| तीसरे दिन हवन के बाद घर में ईन मीन गिनती के तीन प्राणी रह गए| सुबह कमला बाई आ कर बरतन झाड़ू पोछा कर जाती है| दोपहर में उसे घर पर कोई नहीं मिलता तो एक ही समय के बर्तन करने लगी|

खाना बनाने वाली अभी कोई नहीं मिल पाई है| अस्मि , अर्नव कॉलेज से आते फिर चाय पीकर थोड़ा कुछ करके रखते| शाम ढले अलोक  आ जाते| फिर वो तीनों मिल जुल कर कुछ खाना बनाते| कभी ठीक बन जाता कभी बिगड़ जाता| कपड़ों का भी यही हाल रहता| रविवार को ही धुल पाते और तभी प्रेस को दे पाते क्योंकि बाकी दिन प्रेस वाले को घर में कोई नहीं मिलता|

रविवार के दिन कपड़े धोने, बाजार से राशन पानी, खाने का सामान लाने में, खाना बनाने में निकल जाता| कभी कभार बाहर से भी खाना मँगा लेते|

आज रविवार का दिन है| दोपहर के खाने के बाद अलोक  अपने रूम में लेटे हुए हैं| अस्मि  और अर्नवभी आ जाते हैं|

अर्नवने कहा, "पापा, मम्मी के जाने के बाद हम लोग हमेशा घर के कामों में ही उलझे रहते हैं| समय ही नहीं मिलता कुछ और करने का| "

अस्मि  बोली, "हाँ, पापा| रविवार को हम कितना मजे करते थे| मम्मी कुछ बढ़िया बनाती थीं| हम सब दिन भर खाते पीते रहते थे| मम्मी भी फरमाइशें पूरी करती थीं| "

अलोक  बोले, " सही कह रहे हो बच्चों| आशा  के होते कभी महसूस ही नहीं हुआ कि घर में कोई काम भी है| वो हर काम पहले से ही करके रखती थी| कहने से पहले ही भांप लेती थी कि किसको कब क्या चाहिए| "

अस्मि  बोली, " पापा, अब हफ्ते भर घर कितना अस्त व्यस्त रहता है| मम्मी कितने अच्छे ढंग से घर को व्यवस्थित रखती थीं|

अर्नवबोला, " अब तो न कपड़ों का पता रहता है और न ही खाने का| "

अलोक  ने कहा, "तुम्हारी माँ के होते कभी घर की तरफ़ देखा ही नहीं| "

अस्मि  तपाक से बोली, "घर क्या पापा, हम लोगों ने मम्मी को भी नहीं पूछा| "

अलोक  बोले, "मैं भी यही सोच रहा हूँ कि अपने काम में मैं इतना व्यस्त हो गया कि कभी आशा  से जानने की कोशिश ही नहीं करी कि वो क्या चाहती है| उसने मुँह खोलकर कुछ कहा नहीं और मैंने पूछा नहीं| "

अर्नव हामी भरते हुए बोला, "पापा, अब याद आता है कैसे मम्मी हमारी हर चीज, जरूरत का ध्यान रखती थीं| कभी कभी जब वो कमरे में आकर बातें करना चाहती थीं तो मैं और अस्मि  अपने कॉलेज के काम या पढ़ाई कर रहे हैं, ऐसा कह देते थे| मम्मी चुपचाप चली जाती थीं| हमारे पास मोबाइल पर गेम खेलने या चैट करने के लिए वक्त रहता था पर उनके लिए नहीं| "

अस्मि  बोली, " सही कह रहे हो.भाई| जैसे जैसे हम बड़े होते गए, हम मम्मी से दूर होते गए| मम्मी ने बहुत प्रयास किए साथ बैठ कर बातें करने की पर हमने हमेशा उनका ऐसा करना अपनी आजादी और पर्सनल लाइफ में हस्तक्षेप माना| "

अलोक  बोले, "गलतियां तुम दोनों से ही नहीं मुझसे भी भीषण हुईं हैं| जब भी उसने मुझसे कुछ बात करना या बताना चाहा, मैंने गौर नहीं किया| सिर्फ पैसे देकर सोचता रहा कि सारे कर्तव्य निभा रहा हूँ|"

ठण्डी आह भरकर अलोक  बोले, "फिर धीरे धीरे आशा अपने अंदर सिमटती गई| ज्यादा बोलना छोड़ दिया और हमें पता ही नहीं चला कब वो गहन डिप्रेशन में चली गई| "

अस्मि  और अर्नव बोले, "पापा, हम तीनों ने मिलकर मम्मी को ऐसी अवसाद की अवस्था में पहुँचा दिया| जिससे वो बाहर नहीं निकल पाईं| "

अलोक  बोले, " हम तीनों तुम्हारी मम्मी के दोषी हैं| वो हमारे लिए सब कुछ न्योछावर करती गईं और हमने बदले में उसको ऐसी अवस्था में पहुँचा दिया कि इलाज़ करवाने पर भी लाभ नहीं हुआ| और हमने उसे खो दिया| "

अब उस कमरे में तीनों बैठे हैं, उदास, गमगीन और शर्मिंदा| आशा  को याद कर रहे हैं| तीनों को आशा  की अहमियत अच्छे से समझ में आ गई है| तीनों यही सोच रहे हैं कि काश एक बार आशा  लौटकर आ जाए....

पर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत|

जीते जी जिसे हमेशा नकारा या जिसकी उपेक्षा की, वो अब सभी बंधनों से उन तीनों को आजाद कर गई है|

दोस्तों ऐसा होता है अक्सर कि हमें लोगों की बखत यानि उनकी अहमियत उनके जाने के बाद मालूम चलती है| कोशिश करें कि ऐसा न हो| माँ या पिता, पति-पत्नी, सास-ससुर या बाबा-दादी या बुजुर्गों के लिए समय निकालें और कुछ उनकी सुनें और कुछ अपनी कहें| क्योंकि आपके उपेक्षित व्यवहार से कोई आपका अपना अवसाद में जा सकता है| इस बात को समझें और सम्भल जाएं| वैसे भी कौन कब साथ छोड़ जाए, क्या पता?

दोस्तों, ये कहानी दिल से लिखी है मैंने| यदि मेरी इस रचना ने  आपको सोचने पर विवश कर दिया है तो कमेंट सेक्शन में अपनी राय साझा कीजियेगा| पसंद आने पर कृपया लाइक और शेयर करें| ऐसी ही मन को छूने वाली रचना, कहानियां, लेखों एवम फूड ब्लॉग्स के लिए आप मुझे फॉलो भी कर सकते हैं|

धन्यवाद |

प्रियंका की कलम से 🖋


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