जाके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई
दिसम्बर का महीना चल रहा है। भयंकर जाड़े से उत्तर भारत घने कोहरे की चादर में ढका हुआ है। चंडीगढ़ की भयंकर सर्दी ने क्या आम, क्या खास हरेक को चने चबवा दिए हैं। उधर कश्मीर व हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ों पर पड़ी बर्फ की सिहरन शीत लहर के रूप में चंडीगढ़ वासियों की हड्डियां गलाने को आतुर है। रही सही कसर कल की ओलावृष्टि ने पूरी कर दी| एक ही दिन में तापमान आठ डिग्री नीचे चला गया, लगता है पारा संभल नहीं पा रहा है, गिरता ही जा रहा है।
ऐसी ही एक ठंडी सुबह चेतना अपने लैब्राडॉर जैकी को दैनिक नित्यक्रम हेतु टहलाने सड़क के किनारे-किनारे घुमा रही थी कि उसने एक चिड़िया को पतंग के मांझे के कारण घायल अवस्था में तड़पते देखा। फौरन ही उसने बर्ड केयर संस्था, 'परिंदा' को फोन लगाकर बुला लिया। वह घायल चिड़िया को सावधानी से ले गए। इस सब में अन्य दिनों की अपेक्षा पौन घंटे से ऊपर लग गया।
घर पहुंची तो देखा कि माँजी की चंपा से चिक-चिक चल रही है। वहीं रोज के जैसे एक ही बात के लिए चंपा माँजी से आग्रह करती , परंतु माँजी एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देतीं।
जैकी को उसके डाॅग हाउस, जो उन लोगों ने उसके लिए घर के एक कार्नर में बना रखा है, में छोड़कर चेतना माँजी के रूम में गई।
चंपा काफ़ी दिनों से कह रही है कि उसे घर में पहनने के लिए एक जोड़ी चप्पल दी जाए। माँजी इसके सख्त खिलाफ हैं। चंपा ने मन मार कर आज भी नंगे पांव ही काम किया।
चेतना ने चंपा के जाने के बाद माँजी को समझाया परंतु वे नहीं मानीं। उनके हिसाब से कामवाली के चप्पल पहनकर झाड़ू पोंछा करवाने से घर साफ नहीं होगा, कामवाली को नंगे पांव ही सफाई का कार्य करना चाहिए। बर्तन मांजने के लिए भी कामवाली को चप्पल देने से रसोई की पवित्रता भंग होती है। यह अलग बात है कि मांजी और अन्य सभी घरवाले बिना चप्पल जमीन पर कदम नहीं रखते हैं। जाड़ों में तो सभी घरवाले मोजे भी पहनते हैं।
अगले दिन सुबह ही माँजी की एक चप्पल टूट गई। हुआ यूं कि जब वह नहाने गई तो वहां बाथरूम के फ्लोर पर पड़े पानी से पैर रपट कर मुड़ गया और चप्पल टूट गई।
जब वह नंगे पैर फर्श पर चलीं तो उन्हें चंपा की परेशानी समझ में आई। चेतना ने उन्हें नंगे पांव चलते देखा तो झट से अपनी चप्पल पहनने को दी पर भीषण सर्दी में नंगे पांव ज़मीन पर रखकर कुछ कदम चलने से ही माँजी अंदर तक, पैर से सिर तक सिहर गईं थीं। ठंड इतनी ज्यादा थी कि उनकी हड्डियां कांपकर रह गईं।
एक झटके में उन्हें चंपा की तकलीफ़ का एहसास हो गया। वे तो दो-तीन मिनट ही नंगे पांव चली, चंपा तो बर्तन मांजना, झाड़ू-पोंछा करना आदि पानी के काम, घंटों तक ऐसे ही नंगे पांव करती है।
तुरंत चेतना को माॅऺजी ने बाज़ार भेजकर दो जोड़ी चप्पल बाज़ार से मंगवा ली, एक अपने लिए और दूसरी चंपा के लिए।
अगले दिन चंपा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब माँजी ने चंपा को अपने हाथ से चप्पल दी और उसे चप्पल पहनकर काम करने को कहा।
दोस्तों, चंपा के दुख को माँजी तभी महसूस कर पाईं जब उन पर भी वैसा ही कुछ गुजरा।
सच ही है, 'जाके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई'
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