व्यर्थ टीका-टिप्पणी कर आहत न करें !

हमारी कॉलोनी में बरसों से एक धोबिन आती है। सभी पुराने लोग यानि जो स्थायी निवासी हैं वो उसी धोबिन से कपड़े प्रेस करवाते हैं।हमारे घर में भी बचपन से उन्हें ही आते देख रही हूँ। शुरू से ही मौसी कहती आई हूँ। मौसी दिन भर प्रेस करती हैं। इसके लिए सुबह घर घर जाकर कपड़ें इकठ्ठे करती हैं और शाम को प्रेस करे कपड़े घरों में पहुँचा आती हैं। एक बेटा है दीपक,जिसे पढ़ा रही हैं। दीपक बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा है।

पापा का स्थानांतरण बाहर  हो गया और हम लोग अपने मकान को किराये पर चढ़ा कर नए शहर में आ गये।  करीब दस साल बाद दोबारा पापा का  स्थानांतरण हमारे शहर में हो गया। हम वापिस अपने शहर आ गए।  इतने सालों में शहर काफ़ी बदल गया है।

पंद्रह बीस दिन लगे फिर से घर को पुन: व्यवस्थित करने में और हम भाई-बहन अब कॉलेज जाने लगे।

एक दिन मैंने धोबिन मौसी को देखा।  वो उसी जगह पर प्रेस करती मिली।  कुछ समय लगा पहचानने में उन्हें।

फिर बोली," बिटिया कब आए तुम लोग?"

"मौसी हम लोग हमेशा के लिए आ गए हैं।  पापा का स्थानांतरण हो गया है। " मैंने कहा।

"ये तो बहुत अच्छी खबर सुनाई बिटिया।   ", मौसी खुश होकर बोली।

"मिलने आना मौसी।  " मैं बोली।

"हाँ बिटिया आती हूँ हाथ का काम निबटाकर। " मौसी बोली।

शाम को प्रेस के कपड़े कॉलोनी में देकर मौसी हमारे यहां आई।

मैं बाहर  ही खड़ी पड़ोस में रहने वाली आंटी से बातें कर रही थी।  मौसी को देखकर मुँह बनाते हुए चली गयी।  मुझे कुछ अटपटा लगा।

मम्मी ने कहा , " आओ दीपक की माँ , कैसी हो?"

"ठीक हूँ दीदी। "

"अब कल से कपड़े ले जाना। "

"जी दीदी। "

कहकर मौसी पलटी थी कि मम्मी ने रुकने को बोला और रूम में चली गयीं।

मैंने मौसी से पूछा , " मौसी , ये पड़ोस वाली आंटी आपको देखकर क्यों  चली गयी और मुझे ऐसा लगा कि उन्हें आपका आना पसंद नहीं आया। क्या बात है? "

मौसी का चेहरा उतर गया, बोली, " बिटिया बहुत से लोगों ने कपड़े देना छोड़  दिया है।  वो चाहते हैं कि मैं अभी घर में ही रहूँ "

मैंने और मम्मी जो रूम से बाहर आ गयी थीं , दोनों ने एक साथ पूछा , " क्यों? ऐसा क्यों ?"

मौसी ने जो कहा , उसे सुनकर हम दोनों सन्न रह गए।

वो बोली, " अभी पंद्रह दिन पहले दीपक की आकस्मिक मृत्यु हो गयी है। कार से एक्सीडेंट हो गया था बचाया नहीं जा सका। "कहते कहते मौसी के आँसू  बहने लगे और आवाज़ भर्रा गयी।

मैं जल्दी से पानी ले आई और उन्हें पिलाया।

"हम दीपक के बारे में पूछने ही वाले थे। उसके अचानक चले जाने से बहुत ही दुःख हुआ।  हम नहीं जानते थे। इससे बड़ा दुःख कुछ हो ही नहीं सकता।"  हम बोले

मौसी बोली, " लोग चाहते हैं कि  मैं घर बैठकर अपने बेटे का शोक मनाऊँ।  मेरा दिल भी फटता है जब मैं काम पर आती हूँ।  बेटा खोया है मैंने। "

फिर क्षणिक सांस लेकर बोली, " लेकिन मैं क्या करूँ, मेरी गर्भवती बहू को भूखा तो नहीं रख सकती। उसे तो पोषण देना होगा।  मेरा दीपक तो चला गया।  पर सातमासी बहू को नहीं भूखा मार सकती इसलिए दिल पर पत्थर रखकर मेहनत  करती हूँ ताकि बहू और  होने वाले बच्चे को कुछ न हो।  दुनिया वाले चाहे मुझे निर्मोही माँ कहे पर मैं अपना कर्तव्य निभा रही हूँ। "

कहते कहते  मौसी का कई दिनों से रुका बाँध टूट गया और आँसुओ के रास्ते बह निकला।

माँ बोली, " तुम बिलकुल सही कर रही हो।  हम सब तुम्हारे साथ हैं।  कोई बात ,ज़रूरत हो तो बोलना। "

मैंने कहा, " मौसी तुम बहुत हिम्मती हो।  ऐसे वक़्त में अच्छे अच्छे लोग टूट जाते हैं और तुम घर व बहू सबका सोच कर उन्हें हिम्मत दे रही हो।  मेहनत कर रही हो ताकि बहू- होने वाला बच्चा भूख न रहे। कभी भी लोगों की बातों से डर कर  हार ना मानना। हम सब आपके साथ हैं। "

मौसी को हमारी बातों से ढाँढस  मिला और हिम्मत भी। मैं मौसी की हिम्मत और ज़िन्दगी जीने के उनके जुझारूपन को  देखकर नतमस्तक हूँ।

कभी-कभी हमारे आस पास के लोग जो हमारे सहायक होते हैं वो  भी ज़िन्दगी की सीख दे जाते हैं।  कौन किस परिस्थितियों में है, इसका पता न होने पर भी हम कई बार उन्हें गलत समझ लेते हैं और क्या मालूम उन ही जैसे लोग हमें ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाइयों से रुबरु करा जाएँ। बिना सोचे या जाने किसी पर भी टीका टिप्पणी  नहीं करनी चाहिए।

दोस्तों, ये कहानी दिल से लिखी है मैंने और यदि इस रचना ने मेरी ,आपके दिल के तारों को झंकृत किया है तो कमेंट सेक्शन में अपनी राय साझा कीजियेगा।  पसंद आने पर कृपया लाइक और शेयर करें।  

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प्रियंका की कलम से 🖋

धन्यवाद।


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