काली!

 "सीमा,ये क्या!तुम फिर किताब लेकर बैठ गई।आज तो तुम्हें ब्यूटी पार्लर जाना है।जाओ तैयार हो जाओ, भाभी के साथ चले‌ जाना।"माॅ॑ ने हाथ से किताब लेने का उपक्रम किया

सीमा बोली,"माॅ॑,परसों मेरा बहुत जरुरी व्याख्यान है। तैयारी नहीं करूंगी तो कांफ्रेंस में हड़बड़ा जाऊंगी।"

"हर समय काॅलेज दिमाग में चढ़ा रहता है,पता नहीं इस लड़की को कब समझ में आएगा कि पढ़ाई लिखाई सब कुछ नहीं होती है,शक्ल-सूरत सुधार लेगी तो शायद इस बार बात बन जाए।चार जगह से तो इसके स्याही जैसे रंग की वजह से मना हो चुकी है।ऐसा करना आज फेशियल करवा लेना और कल ब्यूटी पार्लर से ही तैयार होना।शायद लड़के वाले पसंद कर लें।"माॅ॑ गुस्से में बड़बड़ाने लगी

"माॅ॑,मैं कोई मेकअप नहीं करवाऊंगी।"

"तब तो हो ली ननद रानी तुम्हारी शादी!"गोरी चिट्टी भाभी ने मौका मिलते ही ताना मारा

माॅ॑ ने भी हां में हां मिलाते हुए सीमा पर दबाव डालने की कोशिश की।

सीमा को चार बार लड़केवाले मना कर चुके थे।सीमा स्नातकोत्तर महाविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रवक्ता है,स्वभाव की भली है।बस रंग गहरा स्याह है और इसी वजह से माॅ॑ ने हर बार चेहरे को भाभी से मेकअप की परतें लगाकर लड़केवालों के  सामने दिखाया पर सफल न हो सकी।कहीं गले की काली लकीरें बोल पड़ी तो कभी कोहनी दिख गई।कभी तो पैरों ने कालेपन का राज खोल दिया।

इन सब बातों से सीमा आज़िज आ चुकी है।

आज उसके सब्र का बांध टूट गया।

वह बोली,"माॅ॑, बस अब और नहीं! मैं जैसी हूॅ॑,वैसी ही सामने जाऊंगी।

भाभी,आप भी कुछ नहीं कहेंगी।वाह्य छद्म रूप-रंग का आवरण दो दिन में उतर जाएगा।यदि मेरा काला स्याह रंग नहीं पसंद तो यही सही! विवाह ही एकमात्र विकल्प नहीं है...और हां माॅ॑!पसंद या नापसंद मैं भी लड़के को करूंगी।यदि मुझे पसंद नहीं आया तो मैं मना कर दूंगी।"

"कैसी उल्टी गंगा बहा रही है,सीमा!"माॅ॑ और भाभी के मुंह से एकसाथ निकला

पापा जो चुपचाप सब सुन‌ रहे थे,बोल ही पड़े," आज तक सबकी मनमानी देख ली,सीमा सही कह रही है। मेरी बेटी है,सामान नहीं कि कोई पसंद या नापसंद करें।सीमा ऐसे ही लड़केवालों से मिलेगी।मेरी बेटी भी ठोक बजाकर लड़के को परखेगी।यदि उसे ठीक लगा तभी बात आगे बढ़ाई जाएगी।"

सीमा पापा के गले लग गई।

दोस्तों, क्या सीमा ने उचित किया ? सीमा को जब परत दर परत मेकअप की चढ़ाकर लड़केवालों के सामने सजा कर दिखाया जाता था और फिर उन लोगों का इंकार कर देना! क्या वाह्य रंग रूप ही सब कुछ है? सूरत ही किसी को परखने का पैमाना होना चाहिए? सीरत नहीं ?मेरी समझ में सीमा का निर्णय बिल्कुल उचित है, आपका क्या कहना है?आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा। आप कमेंट सेक्शन में अपनी राय जरूर साझा करें।

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