मतलबी दोस्ती!
सीमा का ध्यान आज ना जाने कहाँ है कि दूध उबलते उबलते बचा। गैस बंद कर हाथ में चाय का कप लेकर तुलसी जी के पौधे की मिट्टी को देखकर वह रुक गई। अपने आप से बोली मिट्टी ऊपर नीचे कर दूँ तभी नहाने जाऊँगी।
चाय का कप रख कर मिट्टी को ऊपर नीचे कर पीले पड़े पत्तों को हटाकर क्षण भर बैठी।बैठे बैठे मन की उड़ान जा पहुँची कि रिश्तों को भी ऐसे ही उलट-पुलट कर देखभाल की जरुरत है। एक तरफ पड़े पड़े तो रोटी भी जल जाती है। समय समय पर रिश्तों को सार संभाल की आवश्यकता होती है। रिश्तें उलटना और पलटने से यहाँ मतलब है कि अपने रिश्ते एवं सम्बन्धों को समय देना एवं उनकी परवाह करना और उन पर नज़र रखना।तुलसी जी की पीली पड़ी पत्तियों को आज जैसे पौधे से हटाया है।वैसे ही कुछ दिल को नासूर व जख्म देने वाले रिश्तों को पूरी तरह छाँट कर अपने से दूर करना ।
कुछ आठ महीने पहले सीमा के पड़ोस में हमउम्र परिवार रहने आया था। उन से शीघ्र ही दोस्ती हो गयी और अब तो खाने पीने का आदान प्रदान , साथ -साथ शॉपिंग करना भी होने लगा। नीता और सीमा काफी अच्छे दोस्त बन गए. सीमा के दो बेटियाँ और नीता के एक बेटा और एक बेटी है। सीमा की बेटियाँ , मधुर और सुधा क्रमश: ७ वीं और ४ कक्षा में पड़ती हैं और नीता का बेटा सनी ४ में और बेटी परी तीसरी कक्षा में। जब दोनों सहेलियां बाजार शॉपिंग करने जाती हैं तो दोनों में से किसी एक के घर में बच्चों को छोड़ जाती हैं और एक को कहीं जाना हो तो वो दूसरी के यहाँ छोड़ कर निश्चिन्त होकर जाती हैं।
लेकिन मधुर और सुधा ने कुछ दिनों बाद कहना शुरू कर दिया कि हमें भी ले जाओ मम्मी। आंटी के यहां नहीं रुकना है। दो एक बार तो वो छोड़ गयी फिर जब बच्चे जिद पर ही आ गए तो बेटियों को बैठकर पूछा कि आखिर बात क्या है? क्यों नहीं रुकना आंटी के यहां। नीता तो इतना ख्याल रखती है। बहुत बार पूछने पर बच्चियों ने कहा की पहले प्रॉमिस करो कि नीता आंटी से नहीं कहोगी। उसके बाद उन दोनों ने जो बताया वो काफ़ी चौंकाने वाला था।
मधुर बोली, " मम्मी, आंटी पीछे से कहती हैं की तुम दोनों सनी और परी का ध्यान रखो और दोनों में से किसी के भी शरारत करने पर या गलती से गिर जाने या चोट लग जाने पर हमें डाँटती हैं। "
सीमा बात की तह तक जाने के प्रयास में पूछती है," बेटा सुधा तो सनी के बराबर की है और मधुर ,तुम कोई बड़ी नहीं हो फिर क्यों ऐसा बोला आंटी ने?"
मधुर और सुधा एक साथ ही कहने लगी ," मम्मी हम लड़कियाँ हैं और हमको बचपन से काम करना आना चाहिए ऐसा कहती हैं आंटी। सनी लड़का है उसको काम करने की ज़रूरत नहीं है, ऐसा बोलती हैं। "
सीमा ने अपने गुस्से पर काबू रख कर कहा ," परी भी फिर काम करती होगी तुम्हारे साथ?"
सुधा बोली, "मम्मी ,आंटी कहती हैं वो छोटी है इसीलिए नहीं करेगी काम। "
सीमा का पारा अब तक चढ़ चुकाथा। बोली," बच्चों यहीं रुको, मैं आती हूँ।"
सामने नीता के घर में डोरबेल बजाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। दरवाजा खुला था और सीमा की ओर पीठ करे नीता दीवानपर अधलेटी मुद्रा में किसी से कह रही थी , " हाँ यार अब इस घर में मुझे काफ़ी आराम हो गया है। सामने सीमा के घर बच्चों को छोड़ कर जाती हूँ वो ध्यान रखती है और खाना भी खिला देती है। "
सीमा अपनी तारीफ सुनकर ठिठक गयी। वो शर्मिंदा हुई कि बच्चों की बातों को शायद बड़ा करके सोच लिया। नीता ने किसी दिन ख्याल रखने को बोल दिया होगा।
वो वापिस जाने के लिए पलटी ही थी कि इतने में दूसरी तरफ़ से कुछ पूछने पर नीता हँसते हुए बोली , " हाँ , उसकी दो बेटियां हैं ,वो भी छोड़कर जाती है मेरे पास। अब मैं तो दोनों को सनी, परी की देखभाल पर लगा देती हूँ। और खाने का डिब्बा सीमा दे जाती है वही खिला देती हूँ। कोई झंझट ही नहीं मैं ठाठ से सोती हूँ या टीवी देखती हूँ और उसकी बेटियाँ बेबीसिटिंग करती हैं। और वो दोनों अपनी माँ से कुछ नहीं बताती हैं , मैंने डरा कर रखा है। "
ऐसा बोलते बोलते नीता घूमी तो सीमा को देखकर उसका चेहरा फ़क पड़ गया।
सीमा से बोली," कब आई, मैं तुम्हारी ही तारीफ़ कर रही थी। "
सीमा गुस्से में तमतमाकर बोली, " मैंने सब सुन लिया है। नीता तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटियों से बेबीसिटिंग करवाने की अपने बच्चों की जो मेरे बच्चों के हमउम्र हैं। मैं विश्वास से तुम्हारे पास कभी कभार छोड़ कर गयी और तुमने मेरी बेटियों को अपने बच्चों का नौकर समझ लिया । उनके कोमल से मन में लड़का-लड़की में भेदभाव की नीति के विषैले बीज बोने की कोशिश की। "
नीता, "तुम कुछ ज्यादा बोल रही हो, लड़कियाँ हैं कभी न कभी तो करेंगी ये सब। "
"बस नीता बस , अपनी ये गन्दी सोच तुम अपने पास ही रखो। एक तो बच्चों को डराती हो और अपनी गलत बातों को सही कह रही हो। भगवन से डरो बेटी तुम्हारी भी है या दूसरों की ही बेटियों के लिए ये सोच है। अपनी सोच सुधारो। सामान व्यवहार करो लड़का-लड़की में और दोस्ती जैसे पवित्र रिश्ते को अपनी मतलबपरस्ती के लिए इस्तेमाल न करो। इसी के साथ मैं तुमसे अपना दोस्ती का ये रिश्ता तोड़ती हूँ। " कहकर सीमा अपने घर वापिस आ गयी।
कुछ दिन बाद उसने सुना कि सामने वाला घर छोड़ कर नीता इसी शहर में किसी और जगह रहने चली गई।
सीमा भी अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हो गयी। मधुर और सुधा के साथ समय बिताकर उनको यकीन दिलाया। और उनका मनोबल बढ़ाया ताकि उसकी बेटियां पहले जैसे हंसती खेलती रहें और इस मतलबी दोस्ती के चलते आठ महीनों में जो जो रिश्ते उसके हाथ से फिसलने लगे थे या जिन लोगों को और जिन रिश्तों को उसने कमतर समझा था या कि जिन रिश्तों को उसने परे रख दिया था, उन सभी लोगों और रिश्तों पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने लगी, उन्हें संवारने लगी।
दोस्तों , कई बार हम काम काज में इतना व्यस्त हो जाते है कि रिश्ते पीछे छूट जाते है, कुछ जानबूझकर और कुछ अनजाने में ही। रिश्ते भी मनुष्य अपने व्यवहार से बनाता है। यथासंभव सम्भाल कर रखें।
हाँ, जो सम्बंध या रिश्ते गल गए, सड़ कर बदबू मारे, उनको समूल समूचा ही नष्ट करें।ताकि सच्चे रिश्ते पहचानकर हम अपने जीवन को नए उत्साह से जिए नाकि मतलबी , बनावटी रिश्तें ढोते चले जाएँ। इस तरह करने से नकारात्मक दृष्टिकोण वाले लोगों से हटकर ज़िन्दगी रूपी पौधे को नए आयाम तक ले जाएं।
कई बार हम सभी रिश्तों को एक ही तराजू से तौल देते हैं। समय दें और समझे, पहचाने अपने रिश्तों को कि भूलकर भी भूल ना हो जाए। देखा गया है कि कई बार मनुष्य क्षणिक छलावे से रिश्तों पर अपने सच्चे रिश्तों की बलि चढ़ा देता था। ऐसा न करें अपने विवेक का सहारा लें और स्वार्थ के लिए बने रिश्ते के लिए अपने स्थायी रिश्तों को दाव पर ना लगायें।
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