बहू के बड़े भाई का टीका ! ना बाबा ना !!!
हर बार की बात हो गई है ये अब तो! कब तक चुप रहूं। इस बार भी ऐसा ही हुआ तो मुझे मम्मी जी से बात करनी होगी। पता नहीं मम्मी जी ऐसा क्यों करती हैं?मन ही मन सोच रही है सरला। सब्जी तेजी से काट रहे हैं उसके हाथ और उससे भी तेज गति से सरला का मन भाग रहा है।
सरला की शादी हुए दो साल हो गए हैं। अच्छा प्यारा सा ससुराल है। सास आशा जी, ससुर नरेश जी, पति सुनीत एवम् देवर अनिल हैं। सब बहुत अच्छे व समझदार हैं। सरला एक विधालय में शिक्षिका है। ससुर जी सरकार में उच्च पद पर थे ,वे अब टायर हो गए हैं। देवर पढ़ रहा है। सुनीत सरकारी विभाग में इंजीनियर है। कुल मिलाकर सब बढ़िया कह सकते हैं।
सरला भी इन दो वर्षों में घर में रच बस गई है। सरला स्वयं दो बहनें व एक भाई हैं। माता पिता दोनों ही सरकारी नौकरी में हैं। भाई मल्टीनेशनल में मैनेजर है। बहन छोटी है और पढ़ रही है। सरला का मायका दूसरे शहर में है।कभी कभी वो लोग सरला से मिलने आते हैं। छुट्टियों में सरला मायके जाती है। एक महीने पहले भैया के विवाह में सरला पहले चली गई थी और बाकी ससुराल वाले दो तीन दिन पहले पहुँचे थे। सरला का देवर भी उसके साथ कभी कभी उसके घर चला जाता है। खुशी खुशी सरला के माता पिता सबका आदर सत्कारकरते हैं।
लौट के वापस आने पर एक बात जो सरला को खास भाती नहीं है, वो आशा जी का ये पूछना कि "रुचना कितने से किया?" रुचना मतलब टीका या तिलक जो विदा करते समय करते हैं। सरला के मायके में मामा के बेटे एवम् मौसी और बुआ की बेटियों की शादी पिछले साल हुईं। हर बार लौटकर आने पर आशा जी "रुचना"के बारे में जरूर पूछती और फिर कुछ टिप्पणी भी कर ही देतीं कि बस इतना ही!
इसके विपरीत जब भी सरला के माता पिता, भैया व बहन आते हैं। तो आशा जी के नियम के हिसाब से उसके माता पिता का तो बनता ही नहीं और भाई बड़ा है उसका भी रुचना/टीका नहीं करना। बस उसकी छोटी बहन का रुचना करती हैं।
सरला का बहुत मन करता कि भैया का टीका / रुचना हों पर आशा जी ने कहा कि सरला से बड़ा है भैया तो नहीं होगा।
कल शादी के बाद भैया और भाभी सरला के यहाँ आने वाले हैं। सरला बहुत खुश है। आशा जी से बात कर खाने पीने का सब सामान बाजार से मँगा लिया है। घर पर भी सब बढ़िया पकवान बनने वाले हैं ।
सरला ने सोचा कि मम्मी जी से पूछ कर भाभी के लिए साड़ी खरीद लाऊं। कल तो भैया भाभी आ जाएंगे। सुनीत ने भी शाम को जल्दी आने को कह दिया है।उसके साथ जाकर या मम्मी जी के साथ जाकर साड़ी खरीद लाएगी।
सोच को विराम देकर सरला ने सब्जी छौंक कर रहे सहे काम निबटा लिए।
आशा जी के रूम में जाकर सरला बोली,"मम्मी जी सारी तैयारी हो गई है , बाकी कल सुबह उठकर कर लूंगी। मैं ये पूछने आई हूँ कि शाम को सुनीत के साथ जाकर भाभी के लिए साड़ी ले आऊं या आप चलेंगी?
आशा जी," सरला, तुम्हारे भैया तुम से बड़े हैं तो भाभी भी बड़ी हुईं। इस हिसाब से साड़ी का प्रश्न ही नहीं उठता।"
सरला ,"मम्मी जी, लेकिन भाभी शादी के बाद पहली बार आ रही हैं। उनकी रुचना तो करनी है?"
आशा जी थोड़ा क्रोधित होकर,"मैंने कहा ना कि रिश्ते में बड़ी हैं।"
सरला से अब रहा न गया, बोली, "मम्मी जी, भैया और भाभी मुझसे बड़े हैं, आपसे नहीं।जब सबका टीका या रुचना आप करती हैं तो मेरे भैया जो कि आपसे बहुत छोटे हैं उनका क्यों नहीं? वैसे भी मम्मी जी, भैया हम दोनों बहनों से बड़े हैं तो इसका मतलब ये है कि हमारे घर आने पर हम इनका व भाभी का रुचना नहीं करें। मुझे यह बात स्वीकार नहीं है। मेरे भैया व भाभी जब भी यहाँ आएंगे मैं उनका रुचना करुंगी।"
आशा जी, "तुम ये उल्टी गंगा बहा रही हो!"
"मम्मी, सरला ठीक कह रही है। जब हम जाते हैं तो सरला के मम्मी पापा हम लोगों की दिल से खातिरदारी करते हैं। अब भैया भाभी आ रहे हैं तो हमें उन्हें पूरा सम्मान देना होगा। वैसे भी भैया सरला से बड़े हैं, आपसे नहीं। आप बड़प्पन दिखाईये। "
उन दोनों को पता ही नहीं चला कब ऑफिस से आकर पीछे खड़ा सुनीत उनकी बातें सुन रहा है।
आशा जी, "लेकिन बेटा!"
बीच में ही सुनीत बोला,"मम्मी, समझो इस की बात को। सरला के भैया , इन दोनों बहनों से ही बड़े हैं। ऐसे सब करें तो कहीं भी उनकी रुचना नहीं होगी।"
आशा जी, "अब तुम लोगों ने सोच ही लिया है तो मैं कौन हूँ बोलने वाली।"
"मम्मी, मैं और सरला बाज़ार से भाभी के लिए साड़ी ले आएं या आप भी चल रही हों?" सुनीत ने पूछा।
"चली जाओ, आशा। बदलते वक्त के साथ बदल लो खुद को। सही सोच को अपनाने में कैसा संकोच? ये लड़की वाले-लड़का वाले की संकीर्ण मानसिकता छोड़ कर सही बात का साथ दो।" बाथरूम से निकलते हुए नरेश जी ने पत्नी को समझाया।
"भूल गईं, तुम जब तुम्हारे बड़े भैया के आने पर माताजी रुचना नहीं करती थीं तुम्हें कितना बुरा लगता था। उस समय मैं तुम्हारा साथ नहीं दे पाया पर तुम वैसा अपनी बहू के साथ न दोहराओ।"
"ठीक है, बाबा। सरला मैं भी चलूंगी तुम्हारे साथ बाज़ार साड़ी लेने। अनजाने में मैं तुमसे वैसा ही व्यवहार कर रही थी जैसा मेरे साथ हुआ।" आशा जी ने सरला का हाथ थामकर कहा।
सरला "जी मम्मी जी" कहकर उनके गले लग गई।
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