एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 1: एक एकड़ की दुनिया

 एक एकड़ से शिखर तक

प्रस्तावना

हर सपना एक छोटे से बीज की तरह होता है जो सही समय और अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर एक विशाल वृक्ष बन सकता है।
“एक एकड़ से शिखर तक” एक ऐसे ही सफर की कहानी है जहाँ एक साधारण गाँव का लड़का अपने सपनों को सच करने की राह पर निकलता है।
यह धारावाहिक उपन्यास सिर्फ़ एक कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, उम्मीद, रिश्तों और आत्मविश्वास की एक भावनात्मक यात्रा है।
आइए, शुरू करते हैं उस सफर को… जहाँ एक एकड़ ज़मीन से शिखर तक पहुँचने का सपना जन्म लेता है।
👉 इस उपन्यास के सभी भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 
👉 एक एकड़ से शिखर तक

एक एकड़ से शिखर तक भाग 1: एक एकड़ की दुनिया
एक एकड़ ज़मीन… और उससे कहीं बड़े सपनों की शुरुआत…

भाग 1: एक एकड़ की दुनिया

“कुछ कहानियाँ ज़मीन में दबी होती हैं... कुछ बहती हैं बारिश की धार में… और कुछ—एक एकड़ में समा जाती हैं... बिलकुल उस बीज की तरह, जो वर्षों बाद भी फूट सकता है, कभी एक बूँद बारिश से… कभी एक याद के झोंके से। ये कहानी भी ऐसी ही एक एकड़ ज़मीन से उठी है जहाँ सपनों का आकार खेत की मेंड़ों से बड़ा था…जहाँ सपना सिर्फ़ अनाज नहीं उगाना था… कुछ और भी पनप रहा था।” 

नयागांव की एक सुबह

घड़ी सुबह के 5:12 बजा रही है। 
अंधेरे की चादर धीरे-धीरे नीले आसमान से उतर रही है।
एक हल्की धुंध खेतों के ऊपर तैर रही है।
दूर से एक हल चलाने की आवाज़ आती है,
“खटक… खटक… खटक…”

मोहक अंदाज़ में गांव की सुबह धीमे-धीमे आँखें खोल रही है । दूर अमरूद के पेड़ पर बैठा कौवा कांव-कांव करता उड़ गया। कुछ दूर नीम के पेड़ पर कोयल कुहुक रही है।  पेड़ों पर चिड़िया चहक रही हैं।  फूलों पर भंवरे गुनगुना रहे है जैसे किसी दबे हुए पुराने रहस्य की कुंजी उसके पास हो। और वहीं, कच्चे रास्ते के उस पार, मोहनलाल, एक पैंतीस साल के आसपास का किसान, अपनी पुरानी धोती के छोर से मुँह पोंछ अपने बैलों को हल में जोड़ते हुए हल्के स्वर में कुछ बुदबुदा रहा है। उसका चेहरा सख्त है, पर आँखें बेहद नम्र।

"बचपन से यही कर रहा हूँ... और बेटा भी करेगा... पर मन नहीं मानता अब..."

मोहनलाल की आँखें उसकी सोच को बयां कर रही है। एक एकड़ ज़मीन, दो बैल, मुट्ठी भर सपने और अपना  परिवार...यही है उसकी दुनिया लेकिन इस दुनिया में सबसे अनमोल हैं, उसका बेटा विक्रम और बेटी मौली

उधर, घर के चूल्हे से धुएं की पतली-पतली लकीरें ऊपर उठ रही हैं। रमा, विक्रम की माँ, चूल्हे में लकड़ी लगाकर आँच तेज कर रही है। उसके सिर पर आँचल है और आँखें नम… शायद धुएं से या किसी पुरानी बात से जो सुबह की हवा अपने साथ ले आई है। रमा आटे की लोइयां बेल रही थी।

पास ही मौली, उसकी नन्ही सी चंचल लड़की, स्कूल की पोशाक में इधर-उधर दौड़ रही है। 

रमा मौली को नंगे पांव देखकर प्यार से कहती है, "बिटिया, चप्पल धोकर सुखाकर रखी है... पहनकर आ जाओ।"

थोड़ी देर में मौली तैयार होकर, स्कूल बैग पीठ पर टांगे, चिल्लाती है, "अम्मा, जल्दी दो ना रोटी! मास्टरजी गुस्सा करेंगे!" 

रमा मुस्कुरा दी, "रोटी खाकर दिमाग बना लो तो एक दिन अख़बारों में नाम छपेगा बिटिया तुम्हारा।"

रमा विक्रम को आवाज़ देकर बुलाती है और उसके हाथों में दोनों के खाने का डिब्बा थमाते हुए कहती है, "बेटा, हाथ पकड़कर ले जाना मौली को, आजकल बहुत नटखट हो गई है। तुम्हारी टूटी चप्पल बनाने को दे दी है शाम को मिल जाएगी। "

विक्रम माँ के पांव छूता है मौली को बुलाता है। दोनों भाई-बहन नयागांव के एकमात्र सरकारी विद्यालय में पढ़ते हैं।  फीस माफ़ है और स्कूल की ड्रेस साल में स्कूल खुलते ही मिल जाती है। बस कपड़े ही मिलते हैं पैरों में पहनने के लिए जूता-चप्पल खुद से खरीदना होता है। 

इधर विक्रम मौली का हाथ पकडे खेत की मेंड़ पर चलता चला जा रहा है। उसके पांव में चप्पल नहीं, सिर्फ़ मिट्टी चिपकी है, गांव की वही मिट्टी जिसमें उसकी सोच उग रही है। विक्रम अपने नंगे पांवों से मिट्टी की खुशबू समेटता स्कूल की ओर चला जा रहा था। उसके मन में हलचल थी पर चाल में संयम जैसे कोई साधक तपस्या के लिए निकल रहा हो।

रास्ते में मास्टरजी मिले।
"विक्रम बेटा !"
वो रुका। मौली का हाथ पल भर को छोड़ा।  
"तू तो इस गांव की उम्मीद है रे! गांव का सबसे तेज़ लड़का है। तू ही तो नाम रोशन करेगा हमारा। बड़ी दूर जाएगा तू!"
विक्रम मुस्कुराता है...  बिना झिझके मास्टरजी के चरणों में झुकता है, देखादेखी मौली ने भी मास्साब के पैर छुए। 
विक्रम प्रणाम कर दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार कर कहता है, "गांव से दूर नहीं गुरुजी, गांव को साथ लेकर जाना है।"
फिर मिट्टी की ओर देखकर चल देता है जैसे उस मिट्टी से कुछ कहना हो…
और वे दोनों स्कूल की ओर चल पड़े। 

दोपहर में, खेत में पेड़ों की छाँव में

दोपहर को मोहनलाल का पूरा परिवार खेत के बीचोंबीच आम के पेड़ तले बैठा खाना खा रहा है । पेड़ की पत्तियों के बीच छन-छन कर आती धूप, जैसे कुछ छिपा रही हो और कुछ दिखा रही हो। हर कौर में मिठास है, न सिर्फ़ गुड़ की, बल्कि एक-दूसरे की मौजूदगी की। मौली और विक्रम स्कूल के बाद सीधे खेत पर आ जाते हैं।  रमा रोजाना घर से सबका खाना लेकर पहुँचती है और खेत में पेड़ों की छाँव में हँसते-बतियाते खाना खाते हैं। 

"भैया, जब अफसर बन जाओगे ना," मौली चिढ़ाती हुई बोली, "तो अपने खेतों को , हमें भूल तो ना जाओगे?"

विक्रम जवाब नहीं देता बस रोटी के टुकड़े को देखता रहता है।

मोहनलाल उसकी ओर देखता है,
"बड़ा आदमी भी मेहनत की रोटी से बड़ा नहीं होता बेटा…"

विक्रम कुछ नहीं बोला। उसकी निगाहें सामने फैले खेत पर टिकी थीं, मानो उस ज़मीन से आगे की दुनिया उसे पुकार रही हो।

लेकिन किसी को नहीं पता विक्रम के अंदर एक भूख है, जो सिर्फ़ रोटी की नहीं…

शाम ढले...

चूल्हे की राख में बची-खुची गर्मी के साथ-साथ दिन भी मानो कहीं लुप्त हो चुका है। रात आई और घर में सन्नाटा पसर गया। चूल्हा बुझ चुका है। रमा बालों में तेल डालते हुए दरवाज़े की ओर पीठ किए बैठी थी। विक्रम धीरे से माँ के पास आया।

चाँद की रोशनी खिड़की से छनकर आती है। आसमान साफ़ है बिलकुल ... तारें टिमटिमा रहे हैं .. 

धीरे-धीरे, मद्धम स्वर में विक्रम कहता है,"माँ… मुझे बड़ा अफसर बनना है। खेत से बड़ी दुनिया देखनी है…"

रमा ने उसकी बात सुनी। फिर धीरे से उसका माथा चूमा।
"हाँ  बेटा… लेकिन जहाँ भी तू जाये  वहाँ ये मिट्टी अपनी मुट्ठी में रख लेना। यही मिटटी तुझे संभालेगी, तेरी पहचान इसी से है , इसी से तुझे हिम्मत मिलेगी । अभी अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगा तभी आगे पढ़ने शहर जा पाएगा। अभी तो आठवीं की परीक्षा दी है।  ईश्वर सब भला करेंगे।"

वह उसके सिर पर हाथ फेरती है विक्रम को माँ के स्पर्श से मानो नई ताकत मिल गई... जैसे समय भी उस स्पर्श में ठहर गया हो।

दूर आसमान में एक तारा उसी क्षण टूट गया ...

रात के साढ़े नौ बजे जब सब सोने की तैयारी कर रहे हैं, दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी - खट खट....आने वाले को शायद सब्र नहीं था कुण्डी खड़काते हुए तेज आवाज़ में किसी ने कहा, "दरवाज़ा खोलो मोहनलाल।"

मोहनलाल ने चौंककर किवाड़ खोला। देखा बाहर मास्टरजी खड़े हैं, चेहरे पर रोशनी सी चमक रही है।

"मोहनलाल! बधाई हो! विक्रम ने आठवीं बोर्ड में जिले में  टॉप किया है। उसे छात्रवृत्ति मिली है!"

अगले पल… मौली खुशी से उछल पड़ी। रमा के आँसू झरते रहे, पर उनमें दुःख की नहीं, आशा की नदी बह रही थी। मोहनलाल ने भावावेश में मास्टरजी के पैर छूने चाहें तो उन्होंने लपककर मोहनलाल को गले लगा लिया। मोहनलाल ने हाथ जोड़कर रुंधे स्वर में कहा , "सब आपकी कृपा से संभव हुआ है मास्साब…"

विक्रम ने मास्साब  के चरणों की धूलि अपने सर पर स्पर्श की और उनको प्रणाम किया।  हाथ जोड़े विक्रम को मास्साब ने बाँहों में भर लिया और कहा कि अब तुम्हारे सपनों को हकीकत में बदलने का वक़्त आ गया है विक्रम!

"उस रात सिर्फ़ एक बच्चा नहीं बदला… एक भविष्य करवट ले रहा था… जो किसी को दिखाई नहीं दिया परंतु जिसकी आहट आने वाले समय को सुनाई देने लगी।"

और विक्रम, वो एकटक बाहर आँगन के उस पीपल के पेड़ को देख रहा है। उसका सपना अब सिर्फ़ सपना नहीं रहा है, अब वो एक संकल्प है । एक बीज जो फूट चुका था और कोंपल बस आने को हैं आतुर ... 

"पर किसी को नहीं पता है … कि सपने उगते हैं, तो साथ में कई परछाइयाँ भी चल पड़ती हैं। और कभी-कभी… एक एकड़ की ज़मीन से इतिहास बदलता है।"

क्रमशः 

✍️ लेखिका की कलम से

नमस्कार प्रिय पाठकों,

आशा है कि "एक एकड़ से शिखर तक" का पहला अध्याय- "एक एकड़ की दुनिया", आपके मन को छू पाया होगा। यह सिर्फ़ शुरुआत है, विक्रम की ज़िंदगी में अब एक नया मोड़ आने वाला है। सपनों की राह आसान नहीं होती, और यही संघर्ष आगे इस कहानी को और भी गहराई देगा।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो कृपया जुड़ें रहें। आपकी प्रतिक्रिया, आपका साथ, मेरी सबसे बड़ी ताक़त है।

अगला भाग  लेकर आएगा एक नया मोड़ ,  भाग 2: इनाम और इम्तहान

💬 आपको यह कहानी कैसी लगी? आपकी प्रतिक्रिया/ समीक्षा का मुझे इंतज़ार रहेगा।

धन्यवाद 🙏

आपकी अपनी 

प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें