एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 11: वापसी की ओर
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 10: चमक से पहले ज़मीन पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 11: वापसी की ओर
अप्रत्याशित सूचना
अगले दिन, “एकांश” की टीम को एक आधिकारिक नोटिफिकेशन मिलता है:
“सीईओ विक्रम चौधरी ग्लोबल टेक कॉन्फ्रेंस के पहले राउंड में शामिल नहीं होंगे। वे भारत में एकांश रीजनल सेंटर के उद्घाटन कार्यक्रम में भाग लेंगे। वे कॉन्फ्रेंस के दूसरे राउंड में जाएंगे।”
जैसे ही “एकांश टेक्नोलॉजी” की इन्टरनल कम्युनिकेशन टीम द्वारा यह सूचना जारी होती है कि सीईओ विक्रम चौधरी न्यूयॉर्क ग्लोबल टेक कॉन्फ्रेंस में पहले राउंड के लिए नहीं जा रहे बल्कि उसकी बजाय अपने गांव के निकट “एकांश रीजनल सेंटर” का उद्घाटन करेंगे। पूरे कॉर्पोरेट हॉल में सरगर्मी सी फैल जाती है।
कॉर्पोरेट बोर्डरूम में खामोशियाँ भी बोल उठती हैं।
कुछ सहकर्मियों के चेहरे पर साफ़ खिन्नता दिखाई देती है तो कुछ आश्चर्यचकित। कई सवाल उठते हैं। मीडिया में यह निर्णय चर्चा का विषय बनता है.... लेकिन विक्रम को परवाह नहीं।
“यह इंडिया की सबसे बड़ी एडु टेक कंपनी के लिए वर्ल्ड स्टेज पर पहचान बनाने का मौका मिला… और सर ने उसे यूँ ही टाल दिया?”
“सर हमेशा इमोशन्स से चलने लगते हैं। पर इस बार वो एक बड़ी रणनीतिक गलती कर रहे हैं। मीडिया क्या कहेगी?”
प्रशासनिक टीम में हलचल है। न्यूयॉर्क के लिए बुक किए गए होटल्स, प्रेज़ेंटेशन स्लॉट्स, मीडिया इंटर्व्यूज—सब फँस गए हैं।
“सालों बाद हमें इंटरनेशनल ब्रांडिंग का गोल्डन चांस मिला था। अगर सर खुद लीड करते तो इंडिया के एजुकेशन इनोवेशन को सेंटर स्टेज मिलता...
मीडिया में तूफान
जैसे ही ये खबर बाहर लीक होती है कि एक शीर्ष भारतीय एडटेक सीईओ ने न्यूयॉर्क ग्लोबल टेक कॉन्फ्रेंस को टालकर गांव में एक रीजनल सेंटर का उद्घाटन करना चुना है, सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ जाती है:
#RuralMattersMore
#FromNewYorkToVillage
टेलीविज़न चैनलों पर डिबेट शुरू हो जाते हैं:
“क्या एक सीईओ का गांव लौटना ग्लोबल ब्रांडिंग को कमजोर करता है?”
कुछ पत्रकार इसे “लुभावनी मगर अव्यवसायिक सोच” कहकर कटाक्ष करते हैं तो कुछ कहते हैं, “देश को ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत है जो गांव से जुड़ा हो।”
लेकिन विक्रम को फर्क नहीं पड़ता।
"भैया, जब अफसर बन जाओ तो अपने जैसे बच्चों के लिए एक स्कूल खोलना।”
विक्रम ने आँखें मूँद लीं। फिर धीरे से एक गहरी साँस ली।
“न्यूयॉर्क का मंच हो या गांव की मिट्टी, मेरा उद्देश्य बदला नहीं है।” वह बुदबुदाता है
“सर, आप इन सब प्रतिक्रियाओं से परेशान नहीं हैं?”
“परेशान? बिल्कुल नहीं। जब इरादा साफ़ होता है तो रास्ते खुद रह बनाते हैं… और नज़रों से अवरोध हट जाते हैं।”
“एकांश” अब केवल एक एडु टेक ब्रांड नहीं, एक दृष्टिकोण है....और विक्रम उसका वाहक।
जहां दुनिया "सफलता" को मंचों और सम्मानों में ढूँढती है वहां विक्रम उसे “बचपन के सपनों में”, “माँ के हाथ की थाली में” और “रीजनल सेंटर की उद्घाटन पट्टिका” पर लिखे गांव के नाम में ढूँढता है। विक्रम के एक निर्णय से ऐसा लगा मानो कॉर्पोरेट जगत की दीवारें हिल गई हैं। विक्रम का निर्णय भावुकता से परिपूर्ण लग सकता है परन्तु उसे लेने के बाद उसे कोई भी मलाल नहीं है। विक्रम गांव की ओर कदम उठा चुका है। कॉन्फ्रेंस के सेकंड राउंड में वह अब भी जाएगा। लेकिन तब, एक नई कहानी लेकर जो कहेगी कि
वापसी की राह
इधर आस्था विक्रम के रीजनल सेंटर के उद्घाटन कार्यक्रम में जाने की तैयारी करती है। वह विक्रम से कहती है सबसे पास के एयरपोर्ट तक की टिकट निकाल दी है उसके बाद आपके लिए टैक्सी बुक कर दी है। माता जी और पिता जी को तीन दिन पहले पहुँचाने का इंतज़ाम कर दिया है। उनके साथ आस्था स्वयं जाएगी।
विक्रम कहता है, “आस्था फ्लाइट के बाद अगली ट्रेन से मेरा रिजर्वेशन करवा दो, मैं टैक्सी से नहीं ट्रेन से जाऊँगा।”
“पर सर, उसमें आपको आराम नहीं मिलेगा। दिन की यात्रा है लेटने को नहीं मिलेगा।”
“पर-वर कुछ नहीं मैं अपने गांव ट्रेन से ही जाऊँगा।”
“ठीक है सर। ”
ऑफिस में सब हैरान हैं कि सीईओ खुद जा रहा है और वो भी ट्रेन से! आस्था विनम्रता से सब संभालती है और सभी की उत्सुकता को शांत करने का प्रयास करती है।
फ्लाइट और ट्रेन की टिकट बुक हो जाती है।
यह वही बैग है जिसमें किताबें रखकर विक्रम कभी शहर आया था। वह उसे बैग दिखाती है।
“ये बैग अब भी वैसा ही है, सर।”
“और मैं भी वैसा ही हूँ, आस्था… सिर्फ अब लौट रहा हूँ, देने के लिए।”
विक्रम बैग को देखकर एक गहरी साँस लेता है और आभार व्यक्त करती नज़रों से आस्था का शुक्रिया अदा करता हुए बैग थाम लेता है।
“आज मैं गांव में सीईओ के तौर पर नहीं बल्कि उस लड़के की राह पर लौट रहा हूँ जो एक एकड़ ज़मीन से बड़ा सपना लेकर निकला था।”
फ्लाइट में बैठकर विक्रम निश्चिन्तता की साँस लेता है। समय पर फ्लाइट लैंड करती है। कैब से विक्रम रेलवे स्टेशन पहुँचता है उसकी ट्रेन स्टेशन पर आने वाली है...एक अनाउंसमेंट और ....ट्रेन पटरी पर आती दिखाई पड़ती है। विक्रम अपने डिब्बे में चढ़ता है कुल पांच मिनट में ट्रेन के जाने का वक्त हो गया।
ट्रेन चल पड़ती है......ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए विक्रम की आँखों में न नमी है ना पछतावा सिर्फ एक सुकून है, जो हर सफल इंसान के अंदर की जड़ों से जुड़ा होता है।
कुछ घंटे बाद.... नयागांव आने पर ट्रेन की रफ्तार धीमी होती है, प्लेटफॉर्म नज़दीक आता है। वहीं प्लेटफॉर्म जहाँ से वह बरसों पहले निकला था, खाली जेब, भरी आँखें और एक उम्मीद के साथ।
ट्रेन की खिड़की से देखते हुए विक्रम की आँखें भर आती हैं और सामने वही प्लेटफॉर्म जहाँ माँ आख़िरी बार विदा देने आई थी।
विक्रम अपने बैग को सीने से लगाता है उसमें मौली की भेजी हुई राखी और मौली का बनाया एक छोटा सा "शुभ यात्रा" कार्ड है जो उसने विक्रम को शहर जाते वक़्त दिया था।
क्रमशः
जानने के लिए पढ़ते रहिए अगला भाग - भाग 12: वापसी की पटरी
very nice part!
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