एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 12: वापसी की पटरी

अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 11: वापसी की ओर पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 12: वापसी की पटरी

"हर सफर की सबसे ख़ास बात यही होती है कि वो हमें वहीं लौटाता है जहाँ से हम चले थे  लेकिन हर बार हम पहले जैसे नहीं होते हैं।"

नयागांव स्टेशन 

ट्रेन धीरे-धीरे नयागांव  के छोटे से स्टेशन पर रुकती है। सुबह की पहली किरणें अब तक गहरे  बादलों से आँखमिचौली खेल रही हैं। गाड़ी की सीटी की गूंज के साथ ही प्लेटफॉर्म पर हल्की धूल उड़ती है—खिड़की से झाँक रहे विक्रम को चलती हवा के साथ उड़ती धूल ने जैसे वर्षों बाद विक्रम की पहचान की ख़ुशबू से मिला दिया हो।

यह वही स्टेशन है जहाँ से वह वर्षों पहले गया था, एक पुरानी ट्रंक, एक सस्ता सा बैग, माँ की आँखों में आँसू और पसीने में भीगे पिता की चुप्पी के साथ, चहकती मौली भी उस दिन कुछ शांत खड़ी  थी भाई का जाना से वो भी कुछ रुआंसी थी । तब प्लेटफॉर्म की दीवारों पर चूना झड़ रहा था, छत से पंखे आधे टूटे लटकते थे, और स्टेशन मास्टर का केबिन खड़खड़ाता सा लगता था। आज की तारीख़ में स्टेशन में कुछ-कुछ  नया है, चमकदार पीले बोर्ड पर गाँव का नाम साफ़-सुथरा दिखता है, दो डिजिटल क्लॉक लगे हैं और नई टाइल्स प्लेटफॉर्म को सजा रही हैं। लेकिन कुछ पुरानी चीज़ें अब भी वहीं हैं। वो पुरानी बेंच, जिस पर बैठकर माँ ने उसके साथ ट्रेन आने का इंतज़ार किया था ... और वो चाय की दुकान, जहाँ पहली बार उन सभी ने उस दिन चाय पी थी....  

विक्रम धीरे से ट्रेन से उतरता है। हाथ में वही पुराना बैग पर आज उसमें ज़िम्मेदारियाँ हैं, कभी के सपनों का साकार करने का वक़्त आ पहुंचा है... 

उसके पैर जैसे ज़मीन छूते हैं, एक क्षण को वह ठिठकता है। अतीत की परछाइयाँ जैसे आँखों के सामने तैरने लगती हैं, माँ की आँचल में छुपी घबराहट, मौली की वो प्यारी मुस्कान और पिता का गुस्से से भरा मौन। वहीं खड़ा होकर वह आँखें मूँद लेता है।

नौ साल पहले 

विक्रम उस समय 17 साल का था। 12वीं की परीक्षा खत्म हो चुकी थी। वह मैथ्स और साइंस लेकर पढ़ा था और पूरा गाँव जानता था कि इस लड़के में कुछ तो ख़ास बात  है। आठवीं की तरह वह 10वीं में भी ज़िले में टॉपर रहा था, उसके नाम की चर्चा आस-पास के गाँवों तक हो चुकी थी। बारहवीं का परिणाम आना अभी बाकी था। 

लेकिन असल संघर्ष तो अब शुरू हुआ था, 12वीं के बाद क्या?

उसके सामने कई विकल्प थे, बी.एससी., पॉलीटेक्निक या अगर हिम्मत जुटी तो इंजीनियरिंग। घर की  आर्थिक स्थिति अब भी वैसी ही थी। पिता अब खेत पर कम जाते थे, मौली स्कूल जाती थी और माँ अकेले ही घर चलाती थी। थोड़ी बहुत मदद विक्रम की ट्यूशन से हो जाती थी। 

मगर विक्रम के इरादे ठोस थे। उसने कहा था,

“माँ, मुझे इंजीनियरिंग का फॉर्म भरना है तो सिर्फ़ इसलिए नहीं कि मैं एक डिग्री पाना चाहता हूँ, बल्कि इसलिए कि एक दिन मेरे गाँव के हर बच्चे को ऑनलाइन पढ़ाई मिल सके, उसके लिए सिस्टम बनाना चाहता हूँ मैं।”

विक्रम ने बहुत मेहनत की। सुबह स्कूल जाता फिर दिन में माँ के साथ खेत मे काम करता ,शाम को ट्यूशन और रात में स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ाई। उसने इंजीनियरिंग एंट्रेंस की तैयारी बिना कोचिंग के की, मोबाइल के पुराने मॉडल पर वीडियो लेक्चर देखे और स्कूल के पुराने नोट्स से खुद को तैयार किया। 

इंजीनियरिंग एंट्रेंस परीक्षा का दिन आया। विक्रम बस से ज़िला मुख्यालय पहुँचा। 

“तू परीक्षा देकर आ जा बेटा,” माँ ने विदा करते वक़्त कहा था, “बाक़ी भगवान पर छोड़ दे।”

ट्रेन ने सीटी दी  

जैसे ही स्टेशन की घड़ी सवा छह बजने को हुई, एक झटके के साथ ट्रेन ने सीटी दी। ट्रेन की सीटी की आवाज़ के साथ ही एक धक्के से विक्रम वर्तमान में वापस  लौट आता है। वही सीटी.... जो किसी आगंतुक को विदा करती है और किसी राही को उसके अतीत से वापस खींच ले आती है। यह वही ट्रेन थी जिससे कुछ मिनट पहले विक्रम उतरा था, अब वापस रवाना हो रही थी, अपने साथ कितनी ही कहानियाँ, यात्राएँ और इंतज़ारों की गठरी समेटे।

विक्रम को एक क्षण के लिए ऐसा लगा मानो वह कई साल पीछे चला गया था। उसी जगह, उसी प्लेटफ़ॉर्म पर... जहाँ उसने एक बार माँ से वादा किया था, "मैं लौटूंगा, कुछ बनकर।"

स्टेशन की वही पुरानी लोहे की बेंच अब भी वहीं है। थोड़ी ज़ंग लगी, थोड़ी धूप-बरसात से टूटी हुई, लेकिन अडिग। जैसे समय ने उसे भी अपने पन्नों में जगह दे दी हो। विक्रम वहीं बैठता है.... उसी जगह जहाँ से उसका सफ़र शुरू हुआ था। उस समय उसका साथ देने वाली चीज़ें थीं... माँ की भीगी आँखें, मौली की मुस्कान और एक बैग जिसमें दो जोड़ी कपड़े, कुछ किताबें और बहुत सारे सपने भरे थे।

अब वही बैग फिर से उसके पास है मगर अब वो हल्का नहीं रहा। इस बार उसमें एक लैपटॉप है, कुछ फाइलें हैं, कुछ काग़ज़ जिन पर “एकांश रीजनल सेंटर ” की ब्लूप्रिंट छपी है और एक पुराना लिफ़ाफा जिसे उसने अब तक संभाल कर रखा है। उसमें मौली का बनाया हुआ एक छोटा सा “शुभ यात्रा” कार्ड है.... अब थोड़ा फटा हुआ, किनारों से मुड़ा हुआ, मगर अक्षर जस के तस।

 “जैसे आप पढ़ते हो, वैसे ही मुझे भी पढ़ाना।” 

ये लाइन अब भी पढ़ी जा सकती है जैसे वो शब्द आज भी साँस ले रहे हों।

विक्रम बैग खोलकर वो कार्ड निकालता है। उसे हाथों में थामे हुए आकाश की ओर देखता है। गहराता हुआ नीला आसमान अब उसके आँसुओं को ढकने का प्रयास करता है, लेकिन उसकी आँखों में नमी साफ़ झलक रही है.... कोई पछतावा नहीं, बस एक गहरा जुड़ाव।

स्टेशन पर हल्की हलचल है। कहीं कुली सामान लाद रहे हैं, कहीं चायवाले की पुकार है, कहीं कोई माँ अपने बच्चे को सँभाल रही है। भीड़ के उस शोर में भी, विक्रम का मन शांत है लेकिन उसके भीतर जैसे कोई तूफ़ान उठ रहा है।

तभी एक छोटा बच्चा उसके पास आता है। उसकी उम्र यही कोई आठ-नौ साल होगी। धूल भरे चेहरे पर मासूमियत की चमक है। वह विक्रम की ओर देखते हुए पूछता है,
“भैया, आप शहर से आए हो?”

विक्रम उसकी आँखों में झाँकते हुए मुस्कराता है, “हाँ… शहर से आया हूँ … पर गाँव वाला हूँ।”

बच्चा फिर पूछता है, “यहाँ एक बड़ा स्कूल बनने वाला है, जिसमें कंप्यूटर से पढ़ाई होगी… आप वहाँ पढ़ाओगे क्या?”

विक्रम एक पल के लिए चौंकता है फिर उसकी आँखों की कोरें भीग जाती हैं।
“नहीं…” वह धीमे स्वर में कहता है, “पर तुम ज़रूर पढ़ना… मैं बस रास्ता बना रहा हूँ।”

वो बच्चा थोड़ा हैरान होता है लेकिन फिर खुश होकर उछलता-कूदता चला जाता है। उसके पीछे विक्रम की आँखें उसे दूर तक देखती हैं जैसे वो उस बच्चे में अपने बचपन को ढूँढ रहा हो। वही भूरे कपड़े, वही टूटी चप्पलें, वही सपनों से भरी आँखें... जो किसी दिन किताबों के ज़रिए दुनिया देखना चाहती हैं।

विक्रम की उँगलियाँ अब भी उस कार्ड को थामे हैं। अब वो उसे अपने बटुए में रखता है  न जाने कितनी बार पढ़ा है, लेकिन हर बार नए अर्थ उभरते हैं।

वो स्टेशन के चायवाले से एक कुल्हड़ चाय मंगवाता है.... वही मिट्टी की खुशबू, वही सौंधापन। वो एक घूँट लेता है और खुद से कहता है,

“जिन्हें चाय की मिठास इस मिट्टी से मिली हो वो कॉर्पोरेट कॉफी में नहीं खो सकते।”

उसके सामने ‘एकांश रीजनल सेंटर’ के प्लान्स हैं।  डिजिटल लाइब्रेरी, स्मार्ट क्लासरूम, बच्चों के लिए लैपटॉप और सबसे बढ़कर एक वादा कि अब किसी मौली या विक्रम  की पढ़ाई पैसे नहीं होने पर नहीं रुकेगी !

स्टेशन में अनाउंसमेंट होता है, दूसरी ट्रेन आने वाली है लेकिन विक्रम के लिए आज कोई गंतव्य नहीं है। आज उसका स्टेशन यही है.... यही मिट्टी, यही धूप, यही बेंच और यही वादा।

क्रमशः 

✍️ लेखिका की कलम से 

प्रिय पाठकों,

“एक एकड़ से शिखर तक” के बारहवां  भाग “वापसी की पटरी”  में विक्रम गांव पहुँच चुका है। 

विक्रम अब केवल गांव का मात्र एक मेधावी लड़का नहीं रहा, वह एक संस्था का नेतृत्व करता है, सपनों को साकार करने वाले सिस्टम की रीढ़ बन चुका है। पर फिर भी, जब वह सालों बाद उसी पुराने स्टेशन पर उतरता है, तो हम पाते हैं कि उसके भीतर का "वो ही लड़का" अब भी ज़िंदा है... माँ की आँखों में चमक देखने वाला, मौली के कार्ड को सहेजने वाला और पिता की चुप्पी में ज़िम्मेदारी ढूंढ़ने वाला।

“वापसी की पटरी” में मैंने केवल एक वापसी नहीं, बल्कि एक वादे का पुनर्जन्म दिखाने की कोशिश की है। स्टेशन का नया रंगबचपन की यादें और विक्रम की नज़र से दिखती ज़मीन, ये सब उस मानसिकता की झलक हैं जहाँ इंसान सफलता की ऊँचाई से झुककर अपने बीते संघर्षों को देखता है, उन्हें सम्मान देता है।

क्योंकि रास्ता चाहे जितना भी लंबा क्यों न हो "वापसी की पटरी" हमेशा दिल से शुरू होती है।

आने वाले भाग "अंधेरा और आस" में विक्रम से पूरी तरह जुड़े रहते हुए उसके संघर्ष के कुछ पल देखते हैं जानते हैं कि बारहवीं कक्षा का सफर विक्रम ने कैसे तय किया? किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा उसे और परिवार को ... 

तो आगे के कुछ भागों में देखिएगा विक्रम का संघर्ष,  उसका लक्ष्य और कक्षा बारह तक का सफर....  
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग - भाग 13: अंधेरा और आस 
जो जल्द ही आपके सामने होगा, विक्रम के जीवन के एक और भावनात्मक मोड़ के साथ।
आपकी प्रतिक्रिया ही इस यात्रा की सबसे खूबसूरत ताक़त है। जुड़े रहिए…

💬 आपको यह कहानी कैसी लगी? आपकी प्रतिक्रिया/ समीक्षा का मुझे इंतज़ार रहेगा। 

👉 इस उपन्यास के सभी भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - एक एकड़ से शिखर तक

धन्यवाद 🙏

आपकी अपनी 

प्रियंका सक्सेना 'जयपुरी'  

प्रियंका की कलम से 🖋

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