एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 13: अंधेरा और आस
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 12: वापसी की पटरी पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 13: अंधेरा और आस
अंधेरे की गिरफ्त
खेत, जहाँ कभी मोहनलाल की मेहनत की खुशबू बसी रहती थी अब ख़ामोशी और क़र्ज़ की आहटों से भरा पड़ा है। खेत में अब जगह जगह घास उग आई है हरियाली फसल से आती है और फसल इस बार बिना वर्षा सूखने के कगार पर है। खेत देखकर लगता है जैसे जीवन वहाँ थम सा गया हो।
कभी जिन हाथों ने खेत को सींचा था, वही हाथ अब शराब के गिलास थामे हुए हैं। मोहनलाल अब गाँव का सबसे मेहनती इंसान नहीं बल्कि सबसे बेबस आदमी माना जाता है, शराब के गहरे दलदल में डूबे हुए, अपने ही खेतों से कटा हुआ।
अब उस सूखी धरती पर पसीना सिर्फ़ रमा का गिरता है। सूरज जब ऊपर चढ़ने की तैयारी कर रहा होता तब से रमा कुदाल - फावड़ा उठाकर मेड़ पर दिखती। कभी घास उखाड़ती, कभी टूटी क्यारियों की मरम्मत करती। कभी कुँए से पानी निकालती और सूखी फसल को भिगोने का यत्न करती है। उसके सधे हुए हाथ, धूप में झुलसे हुए चेहरे और फटे पल्लू में बँधी प्लास्टिक की एक बोतल, ये अब खेत की नई पहचान बन चुके हैं। गाँव की औरतें जब छाया में बैठकर बातें करतीं, रमा तब भी खेत में झुकी होती जैसे उस ज़मीन को छोड़ने का हक़ उसने खुद को दिया ही नहीं है।
उसका पसीना बहता रहता पर कहीं कोई आवाज़ नहीं आती है । हर सुबह वो चुपचाप खेत पहुँचती और हर शाम बिना शिकायत लौटती क्योंकि अब ये सिर्फ़ ज़मीन नहीं रही है ये उसका आत्मसम्मान बन चुकी है जितनी ज्यादा मेहनत उतनी ही उम्मीद का दायरा बढ़ जाता।
बीज बुवाई के समय बैलों की जोड़ी को भी रमा ही हाँकती। अब बैल भी उसे देखकर चलने की तैयारी करते हैं मानो सभी अपना-अपना कर्तव्य निभाने के लिए प्रतिबद्ध हो गए हैं बस एक व्यक्ति को छोड़कर.... जो कभी खेत की आत्मा हुआ करता था अभी उसकी अंतरात्मा उसको कभी धिक्कारती नहीं है।
गिरती परछाइयाँ
एक साँझ की ढलती रोशनी में जब गाँव की गलियाँ खाली होने लगी हैं और खेतों की पगडंडियां घर लौटते कदमों से भर जाती हैं उसी वक्त एक अजीब से दृश्य ने पूरे गाँव की साँझ को थाम लिया। पीपल के पुराने पेड़ के पास मोहनलाल शराब के नशे में लड़खड़ाते हुए गिरा पड़ा हुआ है।
धूप का आख़िरी टुकड़ा उसकी झुकी हुई देह पर पड़ रहा है । मैले-कुचैले कपड़ों पर मिट्टी की परत चढ़ी हुई है.... आँखें सुर्ख लाल हैं और मुँह से धीमे शब्द निकल रहे हैं जो अस्पष्ट होने के कारण बुदबुदाहट ही लग रहे हैं। कुछ ही साल पहले इन्हीं कंधों ने विक्रम को खेल-खेल में उठा लिया था और गांव की गलियों में पूरे गांव को गर्व से दिखाया था, "मेरा बेटा पढ़ाई में सबसे तेज़ है!" यह बात विक्रम के आठवीं कक्षा में जिला टॉप करने के वक़्त की थी।
लेकिन आज वही कंधे, ज़मीन से चिपके हुए थे....कमज़ोर, थके और टूटी उम्मीदों से लदे.... शराब के नशे में चूर एक बेबस आदमी.....
रमा, जो उस समय खेत से काम करके लौट रही है। उसे कुछ तो आभास हुआ और वो दौड़ पड़ी। मौली भी उसके पीछे-पीछे पहुँची। रमा ने बिना कुछ बोले, मोहनलाल के सर को अपनी गोद में टिका लिया। उसने अपनी प्लास्टिक की बोतल से उसके मुँह पर पानी छिड़का। मोहनलाल कुनमुनाया पर कोई हलचल नहीं हुई।
मौली ने पास पड़े शराब के गिलास को उठाया। एक पल उसे देखा जैसे उसमें सारी शर्म, सारा गुस्सा और सारा दर्द सिमटा हो और फिर चुपचाप जाकर उसे खेत की मिट्टी में गाड़ दिया। उसका चेहरा कठोर था पर आँखें भीग चुकी थीं। उसने जैसे उस गिलास के साथ उस रात के डर, समाज के तानों और अपने पिता की असफलता को भी वहीं दफना देना चाहा। दस साल की मौली अब पिता को ऐसे देखने की आदी हो चुकी है।
कोई धीमे स्वर में हँसा, "कभी बड़ा किसान था, आज देखो ज़मीन पर पड़ा है।"
दूसरा कहता है, "बेटा शहर पढ़ने जाएगा? पहले बाप को तो उठाओ ज़रा!"
तीसरा फुसफुसाता है, "शरम भी नहीं आती औरत घर चला रही है और ये शाम होते ही नशे में धुत्त हो गया!"
रमा सब सुन रही है पर भावविहीन चेहरा जैसे कुछ भी सुन नहीं रही है । उसके चेहरे पर कोई झटका, कोई लज्जा नहीं है बस एक सन्नाटा पसरा पड़ा है उसके अस्तित्व ने शांति से जैसे इसे ओढ़ रखा हो। वह अपनी धोती के पल्लू से मोहनलाल को हवा देती हुई निरंतर उठाने की कोशिश कर रही है।
धीरे-धीरे लोग अपने अपने रास्ते चले गए.... भीड़ छंटती चली गई.... मोहनलाल को कंधे का सहारा देकर रमा घर ले आई और खटिया पर लिटा दिया।
वो शाम कुछ अलग सी है। गाँव में सूरज रोज़ की तरह ही ढल रहा है लेकिन रमा के आँगन में आज कुछ और ही डूब रहा है, उसका भरोसा। पीपल के पेड़ तले गिरे पति को गोद में उठाकर घर लाई रमा अब अंदर से उतनी ही टूटी हुई थी जितना बाहर से थकी।
उसी समय विक्रम घर में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर निबटाकर कमरे से बाहर निकला। आहट सुनकर आँखों में वो जिज्ञासा उभरी जो हर दिन की तरह माँ के चेहरे से दिन का हाल पढ़ने के लिए तैयार रहती है लेकिन आज दरवाज़ा खोलते ही माँ की आँखें कुछ और कह रही है....लाल नहीं थीं, मगर भरी हुई ज़रूर हैं । कुछ कहना चाह रही हैं मगर शब्द जैसे काँटों में उलझे हों।
मौली कमरे के कोने में बैठी है। उसने धीरे से सिर उठाया, बस एक शब्द निकला—"बाबा.." और फिर जैसे उसकी आवाज़ खुद को ही डरा गई हो.... वो चुप हो गई।
विक्रम ने कुछ नहीं पूछा। वह जानता है कि इस घर में अब आँसू और चुप्पियाँ ही संवाद का हिस्सा बन चुके हैं। रात को जब रसोई में खाना बना, तब बस खिचड़ी बनी, ना स्वाद था, ना किसी का मन था । माँ ने बिना कुछ कहे परोसा, और तीनों ने बिना कुछ बोले खाया। मोहनलाल नशे में बिना खाये सो गया।
मगर उस रात से ज़्यादा भारी और ज़्यादा चुभने वाला रहा मौन.... खाना खत्म होते ही विक्रम बाहर निकला। उसकी नज़र सीधे खेत की ओर गई । चाँदनी रात में सूखे खेत ऐसे लग रहे हैं जैसे वो भी किसी का इंतज़ार कर रहे हों, किसी भरोसे का, किसी उम्मीद के।
विक्रम जान चुका है अब सिर्फ माँ को बातों से सहारा देने से बात नहीं बनेगी। ज़िम्मेदारी उठानी होगी। अगले दिन से उसने फैसला कर लिया।
उम्मीद की हल्की किरण
अगले दिन से स्कूल के बाद वह खेत में खुद हल चलाने लगा। हाथों में छाले पड़ने लगे लेकिन वो रुका नहीं था। इसके बीच में शाम आती है जब वो घर में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता है। इसके बाद रात को देर रात तक जागकर अपनी पढ़ाई करता है।
सुबह वह स्कूल जाता, स्कूल में जैसे ही छुट्टी होती, बस्ता लेकर खेत की तरफ चल देता। माँ के साथ खेत में काम करता। हल पकड़ना आसान नहीं था। उसके हाथ जो अब तक पेन और किताब से परिचित हैं अब मिट्टी से जूझने लगे। पहली ही दोपहर में हथेलियों में छाले पड़ गए, पैरों में मिट्टी जम गई और पीठ पर धूप की परछाइयाँ उभर आईं लेकिन विक्रम रुका नहीं। एक तरफ स्कूल की पढ़ाई और दूसरी तरफ खेत की मिट्टी, इन दोनों से वो एक नई ज़मीन बुन रहा है। शाम को जब वो घर लौटता, हाथ धोकर आता तब तक माँ रोटी चाय देती , वो पास-पड़ोस के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता। गणित के सवाल हल करता, विज्ञान के डायग्राम समझाता....बिना थके, बिना शिकायत किए। फिर रात में जब सब सो जाते, वो चुपचाप स्ट्रीट लाइट के नीचे या लालटेन जलाकर अपनी किताबों में डूब जाता। रात को देर रात तक जागकर अपनी पढ़ाई करता है।
उसकी दुनिया चार हिस्सों में बँट चुकी है, सुबह स्कूल, दोपहर खेत, शाम को ट्यूशन पढ़ाना और रात को स्वयं पढ़ाई करना ।
रमा कई बार उसे देखती। उसके चेहरे पर थकान पढ़ती लेकिन कुछ कह नहीं पाती। एक दिन जब वह खेत से लौटा, उसकी हथेली पर एक गहरा छाला था। रमा ने उसका हाथ पकड़ लिया और पहली बार आँसू नहीं रोके।
"बेटा," उसने धीरे से कहा, "इतना बोझ क्यों ले रहा है? तू पढ़ाई में अच्छा है ये सब करते हुए कैसे पढ़ेगा?"
विक्रम ने उसकी आँखों में देखा और मुस्कराया। वो मुस्कान थकी हुई थी पर हारी हुई नहीं।
"माँ," उसने कहा, "जिस तरह मिट्टी में डाले बीज वक्त पर फल देते हैं वैसे ही मेरी मेहनत भी किताबों में अंक बनकर उगेगी... माँ, मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।"
रमा कुछ पल तक उसे देखती रही। फिर उसका हाथ अपनी हथेली में लिया और उसकी पीठ पर धीरे से हाथ फेरा। वो स्पर्श, उस दिन की सबसे बड़ी राहत दे गया । शायद उस ममता में ही वो ताकत थी जिसने विक्रम को अगले दिन फिर उसी ऊर्जा से उठने की प्रेरणा दी।
विक्रम की हर सुबह अब दृढ़ संकल्प से शुरू होती है हर दिन अब उसके लिए सिर्फ़ जीने का नहीं, कुछ साबित करने का हो चला है। यह सिर्फ़ एक किशोर की मेहनत नहीं है यह एक पूरे परिवार के टूटे हुए सपनों को जोड़ने की कोशिश है।
कुछ ही हफ्तों में 12वीं की परीक्षा शुरु होने वाली है। वो जानता था यह साल उसके जीवन की दिशा तय करेगा। पहले ही 10वीं में जिले में टॉप करने वाला विक्रम अब एक नई परीक्षा के लिए तैयार हो रहा है, केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक भी।
विक्रम ने इंजीनियरिंग एंट्रेंस के लिए भी फॉर्म भर दिया था। कुछ लोगों ने यह कहकर डराया, "शहर की परीक्षाओं को गांव का लड़का कैसे पास करेगा भला ?" लेकिन वो बस निरंतर अपनी पढ़ाई में लगा रहता और खेत में माँ के साथ जुटा रहता। उसकी पढ़ाई अब एक मक़सद बन चुकी है । और खेतों की खामोशी, माँ की चुप्पी, मौली की मासूम ख्वाहिशें, इन सबने उसके इरादों को और मजबूत कर दिया है।
कुछ दिनों में बारहवीं बोर्ड की परीक्षा शुरु हो गई..... इन करीब बीस दिनों में रमा ने खेत का काम का बोझ अपने कन्धों पर ले लिया और विक्रम को पूरी तरह पढ़ाई पर ध्यान रखने के लिए बोला। परीक्षा समाप्त होने पर विक्रम ने माँ का हाथ बटाते हुए इंजीनियरिंग एंट्रेंस की तैयारी जारी रखी।उसने इंजीनियरिंग एंट्रेंस की तैयारी बिना कोचिंग के की, मोबाइल के पुराने मॉडल पर वीडियो लेक्चर देखे और स्कूल के पुराने नोट्स से खुद को तैयार किया।
इंजीनियरिंग एंट्रेंस परीक्षा का दिन आया। विक्रम बस से ज़िला मुख्यालय पहुँचा।
“तू परीक्षा देकर आ जा बेटा,” माँ ने विदा करते वक़्त कहा था, “बाक़ी भगवान पर छोड़ दे।”
विक्रम ने इंजीनियरिंग एंट्रेंस दे दिया है। उसका पेपर अच्छा हुआ लेकिन मन में कहीं बेचैनी है।
एक हफ्ते बाद... मई की एक तपती दोपहर, जब हवा भी थमी हुई है , घर के बाहर का पीपल भी जैसे पसीना बहा रहा था।
आज कक्षा 12 का परीक्षा परिणाम आने वाला है....सारा परिवार बेचैनी से इंतज़ार कर रहा है।
एक सुकून, एक बेचैनी और एक दिशा….यही है अंधेरा और आस की असल ज़मीन
क्रमशः
कभी-कभी ज़िंदगी ऐसे मोड़ पर ले आती है जहाँ उजाला पास होकर भी नज़र नहीं आता। भाग 13: “अंधेरा और आस” में हम विक्रम की कहानी के उस हिस्से से गुजरते हैं जहाँ हर ओर अंधेरा है मगर भीतर कहीं एक लौ अब भी टिमटिमा रही है।
एक बेटा जो खेत की मिट्टी में उम्मीद बो रहा है साथ में पढ़ाई भी कर रहा है सपनो को हकीकत में बदलने के लिए , एक माँ जो चुप रहकर भी सबसे बड़ी आवाज़ है और एक बहन जो अभी छोटी है पर समझने लगी है घर के हालत, यही है इस परिवार की सच्ची ताक़त। मोहनलाल का बिखराव उस गाँव की हर गली में गूंजता है, मगर विक्रम का संकल्प उतना ही खामोश और अडिग है।
इस भाग में ‘संघर्ष’ सिर्फ़ एक शब्द नहीं, वह हर साँस में जीया गया एक अनुभव है। और ‘आस’ कोई चमत्कार नहीं, वह एक लड़के की आँखों में पलता हुआ सपना है....
कहानी अब वहाँ पहुँच गई है जहाँ रोशनी की पहली किरण बस आने ही वाली है… लेकिन उससे पहले, यह अंधेरा बहुत कुछ सिखा कर जाएगा।
जानने के लिए पढ़ते रहिये अगला भाग - भाग 14: छोटा सपना, बड़ा मोड़
जो जल्द ही आपके सामने होगा, विक्रम के जीवन के एक और भावनात्मक मोड़ के साथ।
behad bhavpurn bhag!
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