एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 14: छोटा सपना, बड़ा मोड़
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 13: अंधेरा और आस पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 14: छोटा सपना, बड़ा मोड़
गांव की सुबह आज कुछ अलग है। सूरज कुछ तेज़ चमक रहा है और हवाओं में जैसे कोई अनकही खबर तैर रही थी। स्कूल से लौटते बच्चों की आवाज़ें, खेतों से आती मिट्टी की महक और रसोई से निकलती रमा की चुप्पी, सब में एक बेचैनी भरी हुई है ।
उस दिन पूरे गांव की निगाहें इंटरमीडिएट परीक्षा के रिज़ल्ट पर टिकी थीं। गांव के एकमात्र सरकारी स्कूल के बाहर नोटिस बोर्ड पर नामों की सूची लग चुकी है और वहां भीड़ जुट चुकी है।
विक्रम भी भीड़ में खड़ा है इसी बीच में स्कूल का चपरासी ननका विक्रम को कहता है,"विक्रम, प्रिंसिपल साहब ने बुलाया है।"
"जी काका।" कहता हुआ विक्रम साथ चल दिया
प्रधानाध्यापक गुरु जी के कमरे के अंदर से कुछ आवाज़े आ रही हैं। जैसे ही विक्रम ने अंदर प्रवेश किया, विक्रम के मास्टरजी सोहन गुरु जी ने अत्यंत हर्ष से उसका स्वागत करते हुए कहा , "विक्रम, तुमने हमारे स्कूल की शान बढ़ा दी।"
विक्रम ने नासमझी में उन्हें देखा।
प्रधानाध्यापक रमेश गुरु जी ने बहुत ख़ुशी से उसे बताया, "विक्रम तुमने बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में जिले में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर पूरे जनपद में टॉप किया है। हमारे स्कूल का नाम रोशन किया है। तुम्हे आगे पढने के लिए, उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए सरकार की तरफ से छात्रवृत्ति प्रदान की जाएगी। तुम जब तक पढ़ाई करना चाहो कर सकते हो , तुम्हारी फीस माफ़ रहेगी और छात्रवृत्ति के पैसों से तुम्हारे अन्य खर्चे आसानी से निकल जायेंगे। बहुत-बहुत बधाई हो बेटा !"
ललिता मैडम जी, महेश गुरु जी और अन्य सभी अध्यापकों ने भी उसे आशीर्वाद और शुभकामनाएं दी।
विक्रम ने बारी-बारी से सभी शिक्षकों के पैर छुए। उन्होंने उसका मुँह मीठा कराया।
"विक्रम चौधरी, मैथ्स-साइंस में जिला टॉपर।"
कुछ देर बाद गाँव के ही एक लड़के ने दौड़ते हुए आकर रमा के दरवाज़े पर आवाज़ लगाई“चाची! विक्रम भैया ने फिर से टॉप किया! इस बार तो पूरे जिले में नाम आया है!”
रमा बाहर आई, उसकी आँखों में खारा पानी है पर होठों पर मुस्कान।
मौली झूम उठी, “भैया फिर से टॉपर बन गए!”
विक्रम स्कूल से घर पहुंचा। उसका चेहरा शांत है जैसे ये उपलब्धि भी उसके भीतर कहीं गहराई में समा चुकी हो।
“माँ,” उसने रमा के पैर छूते हुए कहा , “माँ , मेरा परिणाम...मैंने इस बार भी जिले में टॉप किया है। अब मुझे आगे पढ़ाई करने के लिए छात्रवृत्ति मिलेगी। गुरु जी ने कहा है कि मेरी फीस माफ़ रहेगी और बाकी के खर्चे मेरी छात्रवृत्ति के पैसों से हो जायेंगे… अब बस इंजीनियरिंग का परिणाम अच्छा आ जाये।”
रमा ने ढेरों आशीर्वचनों से विक्रम को सराबोर कर दिया। उसकी आँखों में ख़ुशी के आँसू छलक आये।
मौली विक्रम के गले लग गई और कहने लगी," भैया तुम तो नंबर वन टॉपर हो। "
रमा ने विक्रम का मुँह मीठा कराया उसने खबर सुनते ही चावल की खीर बना ली थी।
मोहनलाल घर पर ही है आवाज़ सुनकर वो बाहर आ गया, विक्रम ने मोहनलाल के पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
विक्रम ने कहा, “बाबा, मैं आगे पढ़ना चाहता हूँ, इस बार अगर इंजीनियरिंग में दाखिला मिलेगा तो खर्चा छात्रवृत्ति से हो जायेगा। मुझे छात्रवृत्ति मिलेगी आगे पढ़ाई करने के लिए।”
मोहनलाल ने विक्रम के सिर पर हाथ फेरा और उस दिन वो गिलास नहीं उठाया। आराम से सभी ने बहुत दिनों बाद रात का खाना एक साथ खाया। बहुत दिनों बाद परिवार में ख़ुशी के पल आये हैं।
कुछ दिनों बाद
इंजीनियरिंग एंट्रेंस का परिणाम भी आता है। विक्रम का सेलेक्शन सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में होता है जो शहर में है।
जब गाँव को पता चला कि विक्रम को स्कॉलरशिप मिल गई है और अब वो शहर के प्रतिष्ठित सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में जाएगा तो बधाई देने वालों से ज्यादा ताना मारने वाले लोग सक्रिय हो गए।
“अभी से ऊँची उड़ान भरने लगा है... माँ को खेत में छोड़कर खुद कॉलेज जाएगा।”
“बेटे ने तो नाम कमा लिया, पर माँ वो तो खेत जोतेगी ।”
रमा सब सुनती रही लेकिन कुछ नहीं बोली। वो जानती है कि लोग वही कहते हैं जो खुद नहीं कर पाते।
विक्रम की आँखों में ये ताने आग बन कर जलते लेकिन वो उन्हें चुपचाप पीता रहा। उसके लिए अब समय है मेहनत कर खुद को साबित करने का ना कि जवाब देने का।
विक्रम के शहर जाने के दिन नज़दीक आने लगे। इस बार रक्षाबंधन पर वो अपने इंजीनियरिंग कॉलेज में होगा तो एक दिन मौली ने कहा, " भैया राखी पर नहीं होगा तो मैं उसके जाने से पहले उसे राखी बांधूंगी। "
माँ ने थोड़ा सा आटे का हलवा बनाया। मौली ने एक थाली में रोली, चावल रखा। और अपने हाथ से बनाई कलावा यानि मौली की राखी विक्रम के हाथों में बाँधी और उसे हलवा खिलाया, विक्रम ने भी प्यार से मौली को हलवा खिलाया।
“भैया, जब अफसर बन जाना तो मुझे भी अपने साथ पढ़ाना। मैं भी खूब पढ़ाई करुँगी बिलकुल तुम्हारी तरह। ”
“तू मेरी मौली नहीं, मेरी ताकत है। तुझसे किया वादा कभी नहीं भूलूँगा।”
अगले दिन उसने अपनी किताबों के बीच मौली की राखी सम्भालकर रख ली।
तैयारी की शुरुआत
रमा ने थोड़े-से पैसों से विक्रम के लिए दो जोड़ी नए कपड़े सिलवाए, एक छोटा बैग लिया और कुछ स्टेशनरी का सामान खरीदा। विक्रम ने खुद पुराने जूतों को पॉलिश किया।
मोहनलाल ने भी सभी तैयारियों में उत्साहपूर्वक भाग लिया। ऐसा लग रहा है मानो पुराना वाला मोहनलाल लौट आया है.... वह अब नियम से खेत में भी जाने लगा... अब शराब को हाथ भी नहीं लगाता है। शायद मोहनलाल को समझ आ गया है कि ज़िन्दगी नशे में रहकर नहीं गुजारी जा सकती है। विक्रम और रमा ने अपनी मेहनत के बल पर जो उम्मीद का दिया रोशन किया है वो अब नशे में उसको बुझाएगा नहीं ... और इस सब में उसके दोस्त कैलाश की ज्यादा नशे लेने की आदत की वजह से मृत्यु एक अहम् कारण है।
विक्रम, रमा और मौली, मोहनलाल में आये बदलाव से बहुत खुश हैं। विक्रम को थोड़ा चैन की साँस आई कि उसके जाने के बाद माँ को अकेले खेत में नहीं लगना पड़ेगा और एक दिन मोहनलाल ने इन लोगों के सामने शराब को हाथ नहीं लगाने की कसम खाई। घर में फिर से ज़िन्दगी वापिस आ रही है... विक्रम और मौली की मुस्कान लौट आई है , घर से बाहर उनके खिलखिलाने की आवाज़ें गूँजने लगी हैं।
पिता के होश में आते ही बच्चों का बालपन जग गया ... रमा के चेहरे पर कांति लौटने लगी है।
इधर विक्रम शहर की भीड़, हॉस्टल का अकेलापन और आगे की अज्ञात राहों को लेकर चिंतित नहीं है । उसे बस एक बात याद थी, माँ का वादा और मौली की उम्मीद।
“माँ, यहीं जाना है मुझे। ट्रेन वहीं उतरेगी और वहीं से मैं कुछ बनकर लौटूँगा।”
रमा भीतर जाकर कपड़े की एक पोटली लायी जिसमें कुछ पुराने नोट सहेज कर रखे थे।
“मैंने तेरे नाम ये जोड़े हैं ,” रमा बोली, “तेरे शहर जाने के दिन के लिए।”
विक्रम के गले में कुछ अटका। उसने माँ के हाथ थाम लिए।
“ये पैसे टिकट के लिए हैं। तेरा सपना अब बस एक टिकट दूर है, बेटा ।”
क्रमशः
देखते हैं कि आगे क्या होता है जानने के लिए पढ़िए भाग 15 : एक नई दिशा
जो जल्द ही आपके सामने होगा, एक और भावनात्मक मोड़ के साथ।
👉 पूरी कहानी एक साथ पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ - एक एकड़ से शिखर तक
nicely written part!
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