एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 15: एक नई दिशा
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 14: छोटा सपना, बड़ा मोड़ पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 15: एक नई दिशा
विदाई की रात
कुछ देर बाद विक्रम माँ के पास धीरे से आकर बैठता है। माँ की आँखों में झपकती उम्मीद और चिंता साथ-साथ झलकती है। विक्रम मौली के पास जाता है। मौली मुस्कुरा रही है लेकिन उसकी नज़रों में एक मासूम सी बेचैनी है।
गाँव से विदाई
सुबह का सूरज जैसे धीरे-धीरे विदाई की घड़ी को करीब ला रहा था। स्टेशन पर रमा, मोहनलाल और मौली तीनों पहुंचे। मोहनलाल अब ज़्यादा चुप रहता है उसकी नज़रें ज़मीन पर हैं लेकिन दिल में बेटे को एक नई ऊँचाई पर देखने का गर्व भी है।
ट्रेन की सीटी बजी
विक्रम उठता है, बैग कंधे पर टाँगता है वही बैग, जिसमें कुछ किताबें, एक पुराना बटुआ, माँ का दिया पैसों का लिफाफा और मौली का कार्ड रखा है और मौली की बाँधी राखी जो उसने अपनी किताबों के पन्नों में रख ली है।
मोहनलाल पहली बार आँख से आँख मिलाकर कहते हैं, “जा बेटा… अब तुझे देखने के लिए ये आँखें और भी इंतज़ार करेंगी।”
रमा उसका माथा चूमती है, “जो बनना चाहता है, बन… पर अपना बचपना मत खो देना।”
विक्रम ट्रेन में बैठता है, खिड़की की ओर। ट्रेन धीमे-धीमे प्लेटफॉर्म से खिसकती है। मौली हाथ हिलती रहती है जब तक विक्रम दिखाई पड़ता है।
वो गांव को देखता है....वो पेड़, वो स्कूल, वो टूटी पगडंडी, हर चीज़ मानो एक तस्वीर की तरह उसके मन में उतर रही है।
अब ट्रेन रफ़्तार पकड़ चुकी है लेकिन दिल में एक नयी यात्रा की शुरुआत हो चुकी है....एक दिशा, जो सिर्फ शहर नहीं, गाँव को भी रोशन करेगी।
ट्रेन की खिड़की के पास बैठकर विक्रम ने जब गाँव को देखा तो सब कुछ धीमा लगने लगा। जैसे समय थम गया हो। उसने बैग से मौली की राखी निकाली, उस पर उँगली फिराई और मन ही मन कुछ बुदबुदाया,
“मैं जा रहा हूँ, लेकिन लौटूँगा ज़रूर… माँ के खेत के लिए, मौली के स्कूल के लिए… और हर उस बच्चे के लिए जिसके पास सपने हैं पर साधन नहीं।”
ट्रेन ने सीटी दी। खिड़की से बाहर की हवा अब नए शहर की ओर बह रही है । गाँव कहीं पीछे छूट रहा है लेकिन उसकी मिट्टी अब भी विक्रम के मन में साथ है।
"श्री विक्रम चौधरी - राज्य स्तरीय छात्रवृत्ति योजना के पात्र।"
ये सिर्फ़ एक सरकारी घोषणा नहीं है ये एक माँ की वर्षों की तपस्या का प्रमाण है।
एक और कागज जो विक्रम का सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज का एडमिशन का कन्फर्मेशन लेटर है उसे भी साथ ही मोड़कर अपने बटुए में रख दिया।
ट्रेन में बैठे-बैठे उसने अपनी डायरी निकाली और पहला वाक्य लिखा -
“यह शुरुआत है... उस सफ़र की, जो एक एकड़ ज़मीन से शुरू होकर लाखों ज़िंदगियों तक पहुँचेगा।”
तभी स्टेशन पर
अनाउंसमेंट के साथ ही एक ट्रेन धड़धड़ाती हुई प्लेटफार्म पर आकर रूकती है। ट्रेन की सीटी के साथ विक्रम की वर्तमान में वापसी होती है। स्टेशन की वही बेंच पर बैठा विक्रम कार्ड को फिर से हाथ में लेता है। उसे लगता है जैसे वक़्त ने उस कार्ड में मौली की आवाज़ कैद कर दी हो। विक्रम उठता है, कार्ड को सीने से लगाता है ओर चल पड़ता है। सामने से उसे आस्था आती हुई दिखाई देती है। सामान्य अभिवादन के पश्चात वो दोनों स्टेशन से बाहर निकलते हैं। स्टेशन के बाहर एक कार उसका इंतज़ार कर रही है उनके बैठते ही कार चल पड़ी। कार की मंज़िल गांव का एकमात्र विश्राम गृह (रेस्ट हाउस) है।
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग भाग 16: मौली लर्निंग हब — एक सपना, एक रहस्य
जो जल्द ही आपके सामने होगा, एक और भावनात्मक मोड़ के साथ।
👉 इस उपन्यास के सभी भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - एक एकड़ से शिखर तक
nicely written part. waiting for the next part! .
जवाब देंहटाएं