एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 16: मौली लर्निंग हब — एक सपना, एक रहस्य

 अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 15: एक नई दिशा पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 16: मौली लर्निंग हब — एक सपना, एक रहस्य

विश्राम गृह पहुँचते ही विक्रम का भव्य स्वागत होता है।  गांव के पंचायत समिति के गणमान्य सदस्य माला पहनाकर उसका स्वागत करते हैं।  आस्था के ज़रिये उन लोगों को पूरा संक्षिप्त विवरण (ब्रीफ) दी जा चुका  है और वे लोग बहुत प्रसन्न हैं यह जानकर कि  रीजनल सेंटर उनके अपने गांव के विक्रम की कंपनी एकांश के द्वारा स्थापित किया जा रहा है।  रमा और मोहनलाल से वे लोग पहले ही मिल चुके हैं और विक्रम भी जाकर माँ बाबा के चरण स्पर्श  कर आशीर्वाद लेता है इसके बाद वह और आस्था रीजनल सेंटर की ओर चले जाते हैं।  वहां की तैयारियों का जायज़ा विक्रम लेता है।  आस्था उसे सभी महत्वपूर्ण अपडेट्स बताती है और विक्रम कुछ मामूली सा हेरफेर कल के होने वाले उद्घाटन समारोह में करने का सुझाव देता है।  

इसके बाद विक्रम आस्था से कहता है, "आस्था, अब तुम बाकी काम देखो मुझे कहीं जाना है। "

विक्रम के हाथ में मिठाई का डिब्बा और कल का इनविटेशन कार्ड है उसकी कार सीधे उसके मास्टरजी सोहन गुरु जी के घर के आगे ख़ड़ी हो जाती है। कार रुकने की आवाज आते ही मास्साब बाहर निकलकर आते हैं।  देखते हैं कि एक अच्छी सुगठित कद काठी  का  खूबसूरत नौजवान कार से उतर रहा है।  सीधे आकर वह उनके पांव छूता  है। 

मास्साब को कुछ पल ही लगे और वो विक्रम को पहचान गए,
" विक्रम तुम यहाँ ?" आश्चर्य और ख़ुशी से उनकी बोली लड़खड़ा गई 

"जी गुरु  जी और मैं आपको अपने गांव के रीजनल डिजिटल सेंटर के उद्घाटन में आमंत्रित करने आया हूँ।"

"वो रीजनल सेंटर?" मास्साब बोले, " जिसकी भव्य बिल्डिंग बनी है!"

"हाँ गुरु  जी और आपको याद है ना कि मैंने कहा था कि गांव का हर बच्चा डिजिटली सशक्त बनाना चाहता हूँ ताकि सभी को पढ़ाई का अवसर मिले इसी कड़ी में पहला रीजनल सेंटर अपने नयागांव में स्थापित कर रहा हूँ। "

" वो तो किसी एकांश टेक्नोलॉजी द्वारा बनाया गया है। "

"जी एकांश टेक्नोलॉजी मेरी ही कंपनी है जो ग्रामीण डिजिटल शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही है।"

"बहुत बहुत ख़ुशी हुई मुझे ये जानकर वरना शहर जाकर तो गांव की मिटटी को भुला दिया जाता है।"

मास्साब इसी वर्ष रिटायर हो चुके हैं विक्रम ने मास्साब  से अनुरोध करते हुए कहा ," गुरु  जी, मेरा विनम्र आग्रह है कि आप इस सेंटर के अध्यक्ष का कार्यभार संभालें।"

"पर बेटा मैं कैसे? मैं तो कंप्यूटर नहीं जनता हूँ।" मास्साब हड़बड़ाकर बोले 

"गुरु  जी, शहर से हमारी ट्रेनिंग टीम आ चुकी है जो पहले स्कूल के शिक्षकों को प्रशिक्षित करेगी। साथ ही यह टीम गांव में अपने दो प्रशिक्षकों को स्थायी रूप से रखेगी आप लोगों को कोई परेशानी नहीं आएगी।  आप के अनुभव से यह सेंटर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहेगा।  आपको मेरी यह बात माननी होगी गुरु  जी। "

मास्साब को विक्रम ने बोलने के लायक ही नहीं छोड़ा उनकी आँखों से आँसू बाह निकले परन्तु यह ख़ुशी के आँसू हैं। मास्साब ने सहर्ष स्वीकृति दे दी। 

इसके पश्चात विक्रम और भी कुछ शिक्षकों से मिला जो सेवानिवृत्त हो चुके हैं और उन्हें रीजनल सेंटर में काम करने के लिए मना  लिया।  प्रधानाध्यापक रमेश गुरु जी सेवानिवृत्ति के बाद गांव छोड़कर अपने पैतृक गांव में बस चुके हैं उनके अलावा सभी सेवानिवृत्त शिक्षकों को विक्रम ने रीजनल डिजिटल सेंटर में कार्य करने के लिए कहा सभी को बहुत अच्छा लगा और वे सहर्ष अपनी सेवाएं देने के लिए तैयार हो गए।  विक्रम ने आकर्षक वेतन की सुविधा उन सभी के लिए निर्धारित की है। 

उम्मीद और उलझन का स्वागत

”नयागांव का वो मैदान, जहाँ पहले कभी मेले लगते थे या कभी बैलगाड़ियाँ रुकती थीं आज एक अलग ही रूप में नज़र आ रहा है । नए रंगों से सजी दो मंज़िला इमारत, “एकांश रीजनल सेंटर” और उसके भीतर मुख्य हॉल पर चमकता नाम: “लर्निंग हब ” .... सम्पूर्ण दो मंज़िला इमारत को सजाया गया सुन्दर लाइटिंग से और सेंटर के प्रवेशद्वार पर रंगबिरंगी रंगोली बनाई गई है। "

इस उद्घाटन समारोह के लिए नयागांव का प्रत्येक घर आमंत्रित है। गांव  के बच्चे-बच्चे की आँखों में आशा झलक रही है। गांव  के लोग धीरे-धीरे इकट्ठा हो रहे हैं । कुछ उत्सुक, कुछ भावुक,और कुछ बस चुपचाप तमाशबीन। कुछ लोगों की आँखों में गर्व है, "हमारे गाँव से निकला लड़का आज इतनी बड़ी कंपनी का मालिक बन गया! ", तो कुछ के दिल में वही पुराना संशय , “इतना कुछ बन गया है, फिर भी गाँव लौटा है?” 

पर आज कोई बहस नहीं, कोई उलाहना नहीं। सबकी नजरें मंच की ओर हैं  जहाँ सफेद कुर्ते-पायजामे और नेहरू  जैकेट  में विक्रम चौधरी खड़ा है, अपने गांव में, अपने लोगों के बीच और अपने सपनों की मिट्टी में। 

विक्रम का भाषण: एक वादा, एक सच

प्रवेशद्वार के रंगीन फीते को विक्रम ने मास्साब सोहन गुरु जी और अपनी माँ एवं बाबा के हाथों से काट कर रीजनल डिजिटल सेंटर के उद्घाटन की प्रक्रिया संपन्न करवाई। 

विक्रम ने माइक संभाला। आसपास लगे कैमरे, मोबाइल,और मंच की सजावट के बीच उसकी आँखें सिर्फ़ बच्चों की तरफ थीं। वही छोटे चेहरे, वही उजली आँखें जिनमें कभी उसका अक्स झलकता था।

“यह भवन सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है,” विक्रम ने कहा, “यह एक सपना है। एक वादा है हर उस बच्चे से जो मिट्टी से उठकर आसमान छूना चाहता है। मैं जानता हूँ कि हर गाँव में एक विक्रम होता है….. और हर विक्रम के पास माँ परिवार और गुरुजी होते हैं जो परेशानियों से लड़ने की ताकत बनते हैं। 

वहा उपस्थित सभी लोग तालियां बजने लगे।  करतल ध्वनि की गड़गड़ाहट से पूरा मैदान गूंज उठा। 

थोड़ा रुककर विक्रम ने कहा, " और  हर विक्रम के पास कोई मौली होती है जो उसे उड़ने का साहस देती है।”

इस वाक्य के बाद मंच पर अचानक सन्नाटा छा गया। लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे। 

"मौली? मौली तो ?" भीड़ में कुछ फुसफुसाहट उभरीं 

तभी विक्रम ने  मंच से “लर्निंग हब ” की ओर इशारा किया।  विक्रम लर्निंग हब के द्वार पर पहुँचा और वहां स्थित लाल कपडे से ढकी मूर्ति का अनावरण किया। वो छोटी सी  मौली की मुस्कराती मूर्ति , स्कूल यूनिफॉर्म में, एक किताब हाथ में.... लर्निंग हब की नाम पट्टिका को भी अनावरित किया गया और "मौली लर्निंग हब" चमक उठा। 

विक्रम मूर्ति के पास गया, उसने चुपचाप फूल चढ़ाए और मूर्ति के गले में माला पहनाई और हाथ जोड़े। 

जनसमूह ने मौली की मूर्ति के आगे सिर झुकाया और उसे श्रद्धांजलि अर्पित की। 

वहां एक पल को सन्नाटा छा गया ... 

सन्नाटे के पीछे की कहानी

गाँव के एक बुजुर्ग अपनी दाढ़ी सहलाते हुए बस इतना बोले, “अरे… छोटी बहन थी उसकी। पढ़ने में तेज़, मुस्कान लिए फिरती थी। कभी-कभी स्कूल के बाद बच्चों को पढ़ाती भी थी। फिर… अचानक गायब हो गई। उसका पता नहीं चल पाया फिर कभी।”

विक्रम ने मंच पर खड़े होकर कहा,

“मैं जहाँ भी गया, मौली मेरे साथ रही। उसकी राखी, उसके शब्द, उसकी उम्मीद… और वो सपना कि एक दिन हमारा गांव भी पढ़ेगा, सीखेगा। यही सपना अब इस भवन में ज़िंदा रहेगा। यही उसके प्रति मेरी असली श्रद्धांजलि है।”

रमा और मोहनलाल के साथ गांव के बहुत से लोग सिसक उठे। 

मंच के नीचे बैठे कुछ शिक्षक, कुछ माताएं और बहुत से बच्चे अब मौली को पहचान चुके हैं। कहानी के उस हिस्से को जो कभी लिखा नहीं गया, बस जिया गया विक्रम के द्वारा ... 

रीजनल सेंटर का उद्घाटन हुआ  सबके भीतर तक उतर गया। कोई नारा नहीं, कोई शो नहीं सिर्फ़ एक सच्चाई, एक भावना।

सभी पत्रकार और अतिथि मंच से लौटने लगते हैं। कुछ साक्षात्कार लेना चाहते हैं पर विक्रम मौन है।

उसकी आँखें अब भी तस्वीर पर टिकी हैं। आस्था पास आती है, “सर, प्रेस इंतज़ार कर रही है।”

विक्रम धीमे स्वर में कहता है, “उन्हें बताओ, आज मैं एक सीईओ नहीं, एक भाई के रूप में आया हूँ।”

 आस्था पत्रकारों को प्रेस रिलीज़ देती है और आने के लिए आभार व्यक्त करती है।

इधर विक्रम मौली की मूर्ति  के सामने बैठा है। उसके हाथ में वही पुराना कार्ड है, मौली का बनाया “शुभ यात्रा” कार्ड, जिसके कोने अब फट चुके हैं, पर शब्द वैसे ही चमकते हैं,

“भैया, जैसे आप पढ़ते हो, वैसे ही मुझे भी पढ़ाना।”

विक्रम मूर्ति की मुस्कान को एकटक निहारता है  जो आज  गाँव की उम्मीद बनकर खड़ी है। फिर आसमान की ओर देखता है। धीमी आवाज़ में बस इतना कहता है,

“मैंने वादा निभाया, मौली… लेकिन तुम कहाँ चली गईं?”

"हर भवन की नींव में सिर्फ़ सीमेंट नहीं होता, कुछ सपनों की राख भी होती है। ‘मौली लर्निंग हब’ उस राख से उगते एक फूल की तरह है जो ना केवल शिक्षा देगा बल्कि हर उस आँसू को उजाले में बदलेगा जो कभी किसी छोटे गाँव की गली में गुम हो गया था।"

क्रमश:

अगली कड़ी में जानेंगे विक्रम के कॉलेज का सफर, 
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग  भाग  17: नई ज़मीन पर पहला कदम
👉 पूरी कहानी एक साथ पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ - एक एकड़ से शिखर तक

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