एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 17: नई ज़मीन पर पहला कदम

अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 16: मौली लर्निंग हब — एक सपना, एक रहस्य पढ़कर शुरुआत करें।

भाग  17: नई ज़मीन पर पहला कदम

उद्घाटन समारोह की चहल-पहल अब धीरे-धीरे थम चुकी है। एकांश रीजनल सेंटर व मौली लर्निंग हब का भव्य उद्घाटन संपन्न हो चुका है। गाँव के बच्चे अब उम्मीद की किताबों में अपना भविष्य खोजने लगे हैं। लेकिन उसी शाम, जब सारी भीड़ लौट चुकी होती है, विक्रम अपने लिए तय किए गए विश्राम गृह के कमरे में अकेला होता है। कमरे में सन्नाटा है, खिड़की से आती हवा पुराने आकाश की कोई पहचान लिए होती है।

वह कुर्सी पर बैठता है, सामने मेज़ पर "मौली लर्निंग हब" के उद्घाटन की कुछ तस्वीरें रखी हैं। वह एक तस्वीर उठाता है, मौली की मुस्कुराती हुई मूर्ति जो अब उस लर्निंग हब के गेट पर लगी है।

तभी एक पुरानी टीस उसे भीतर से कचोटती है। वह अपनी आँखें बंद करता है... और एक बार फिर अतीत में पहुँच जाता है।

कॉलेज का पहला दिन 

नौ साल पहले...... रेलवे स्टेशन से बाहर आते हुए विक्रम ने जैसे ही शहर की ओर कदम बढ़ाए, भीतर कुछ काँप सा गया। यह वही लड़का है जिसने वर्षों गाँव की कच्ची गलियों में नंगे पाँव भागते हुए खेतों की मिट्टी में सपनों के बीज बोए थे और अब वह शहर की चमकदार सड़कों पर अपना भविष्य ढूँढ़ने आया है ।

शहर में धूप कुछ अलग लग रही है, कम सुनहरी, ज्यादा तेज़। सड़कें चौड़ी हैं  लेकिन चेहरे अजनबी जिनकी चाल में आत्मविश्वास है बातचीत में धार है और पहनावे में एक अलग ही सहजता। और विक्रम? एक छोटे बैग में दो जोड़ी कपड़े, माँ की पोटली से निकले कुछ सिक्के, किताबें और मौली का बनाया “शुभ यात्रा” कार्ड साथ लेकर आया है।

इंजीनियरिंग कॉलेज के मेन गेट पर जब उसने कदम रखा तो मानो उसके सामने एक नया ब्रह्मांड खुल गया। सामने फैली बिल्डिंग की ऊँचाई ने उसे कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध कर दिया। क्लासरूम्स की बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ, कैम्पस में भागते छात्रों की ऊर्जा और हर कोने से आती अंग्रेज़ी के शब्दों की गूंज... सब कुछ उसे अचानक बहुत दूर ले गया....गाँव की उस खपरैल छत वाली कक्षा से जहाँ बोर्ड तक टूटा हुआ है। इंजीनियरिंग कॉलेज का विशाल कैंपस, ऊँची इमारतें, तेज़-तेज़ चलते छात्र, अंग्रेज़ी में बात करते प्रोफेसर, यह सब उसके लिए एक नई दुनिया है।

विक्रम चुपचाप रजिस्ट्रेशन फॉर्म लेकर हॉस्टल की ओर बढ़ा। कमरा नंबर 304 - तीसरी मंज़िल।

वह जो बैग लेकर आया है  वही जिसमें मौली का बनाया “शुभ यात्रा” कार्ड रखा  है उसे लेकर वह हॉस्टल के कमरे में पहुँचा। 

कमरे में पहले से दो छात्र मौजूद हैं, शशांक और विवेक। दोनों बड़े शहरों से आए हैं  स्मार्टफोन हाथ में, लैपटॉप से सजे डेस्क और पोस्टर्स से भरी दीवारें उनके आत्मविश्वास की गवाही दे रहे हैं।

विक्रम ने एक कोना देखा, एक डेस्क खाली दिखी। उसने धीरे से अपना बैग वहाँ रखा, माँ की तस्वीर निकालकर सबसे पहले डेस्क पर सजा दी। एक किनारे मौली का कार्ड भी रखा- रंगीन लेकिन अब थोड़ा मुड़ा हुआ।

“गांव से हो?” शशांक ने चौंककर पूछा।

विक्रम ने सिर हिलाया। उसे कोई शर्म नहीं है  इस बात में लेकिन शायद शब्द भी नहीं हैं।

“कोई बात नहीं,” विवेक ने हँसते हुए कहा, “यहाँ सबको शहर बना देता है।”

लेकिन विक्रम जानता है वह बदलने नहीं आया है, वो अपने गांव को ही कुछ लौटाने आया है।

रात को सब छात्र अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं - कोई ईयरफोन लगाए, कोई वीडियो कॉल पर, कोई पढ़ाई में डूबा, विक्रम को नींद नहीं आ पा रही है। हॉस्टल की छत पंखे की तेज़ आवाज़ के नीचे भी खाली लग रही है।

खिड़की से बाहर देखा तो शहर अब भी जाग रहा है। हॉर्न की आवाजें, हल्की चकाचौंध, दूर किसी ढाबे पर बैठे लोग.....  लेकिन विक्रम के लिए यह सब किसी और ग्रह की चीज़ें लगती हैं।

उसने चुपचाप अपनी डायरी निकाली जो माँ ने उसे दी है। पहले पन्ने पर लिखा हुआ है -
“यह शुरुआत है... उस सफ़र की जो एक एकड़ ज़मीन से शुरू होकर लाखों ज़िंदगियों तक पहुँचेगा।”
उसके नीचे उसने लिखा -
"खुद पे भरोसा रखना है , मैं  उस मिट्टी से बना हूँ जो फसल भी देती है और रास्ता भी।”

उसने कार्ड निकाला मौली का हाथों से बना “शुभ यात्रा”।
नीले और लाल फूलों के बीच छोटे अक्षरों में लिखा था -
“जैसे आप पढ़ते हो, वैसे ही मुझे भी पढ़ाना।”

उसकी आँखें भर आईं। गाँव छूट गया है लेकिन उस कार्ड के अक्षर, माँ की तस्वीर और भीतर की आग ने उसे कसकर बाँध रखा है। पहली रात वह ठीक से सो नहीं पाया। हॉस्टल का शोर, शहर की आवाज़ें और भीतर का खालीपन उसे सोने नहीं दे रहा है। रमा की आवाज़, मौली की हँसी और गाँव की मिट्टी अब बस याद बनकर रह गई है।

नई ज़मीन पर पहला कदम

सुबह जब अलार्म बजा तो विक्रम सबसे पहले उठ गया। उसने अपना बैग ठीक से रखा, जूते पॉलिश किए और क्लास के लिए तैयार हो गया। हालाँकि विक्रम के भीतर एक अजीब-सी हलचल है आखिरकार यह कोई सामान्य दिन नहीं है, यह उसके संघर्ष के नए अध्याय की पहली पंक्ति है। सुबह-सुबह उसने माँ की तस्वीर को प्रणाम किया और हॉस्टल से निकल पड़ा।

कॉलेज की इमारतें ऊँची और भव्य थीं। लॉबी में छात्र-छात्राओं की भीड़, किसी कॉरिडोर में इंग्लिश में बहस होती दिखी तो किसी कोने में ग्रुप डिस्कशन होता दिखाई दिया। उसके लिए यह माहौल नया है उतना ही अपरिचित जितना शहरी शोर गाँव के शांत खेतों से अलग  होता है।

सबसे पहले एक इंट्रोडक्टरी सेशन हुआ।  विक्रम ने देखा कि छात्र केवल शहर से ही नहीं है बल्कि दूरदराज़ के क्षेत्रों और गांवों से भी पढ़ाई करने के लिए आये हैं। फिर पहला लेक्चर 'एप्लाइड फिजिक्स' ('Applied Physics') का हुआ। प्रोफेसर तीव्र गति से  पढ़ाते हैं उनके शब्द विक्रम को समझ में तो आते हैं लेकिन वह उन्हें आत्मसात करने में थोड़ा समय लेता है। एक बार जब प्रोफेसर ने प्रश्न पूछा, तो विक्रम ने हिम्मत करके हाथ उठाया। जवाब सही दिया पर उसकी झिझक अंग्रेज़ी में दिखाई दी। क्लास में कुछ फुसफुसाहटें हुईं, कोई मुस्कराया भी।  

लेकिन प्रोफेसर ने कहा,
“Concept is clear, that’s more important. Good job!”
 ( तुम्हारे सिद्धांत समझे हुए हैं यही ज्यादा महत्व रखता है। बढ़िया जवाब/ काम!)

यह विक्रम का पहला ‘Good Job’ है उस शहर में। शायद यही पहला कदम है  नई ज़मीन पर।

कॉलेज के पहले दिन विक्रम को समझ आ गया है कि यहाँ का माहौल सिर्फ किताबों से नहीं चलता यहाँ आत्मविश्वास और संवाद भी पढ़ाए जाते हैं।

एक अन्य लेक्चर में जब प्रोफेसर ने सवाल पूछा और विक्रम ने जवाब देने की कोशिश की तो उसकी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी पर कुछ सहपाठियों ने हँसी उड़ा दी।

क्रमशः 

विक्रम के साथ आगे क्या होता है ?
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग - भाग 18: नई ज़मीन, नया आकाश 
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