एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 18: नई ज़मीन, नया आकाश

अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग  17: नई ज़मीन पर पहला कदम पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 18: नई ज़मीन, नया आकाश 

पहले दिन व्यावहारिक गणित (Applied Mathematics) की क्लास में जब प्रोफेसर ने एक सवाल पूछा तो विक्रम ने सोचा ये तो वही टॉपिक है जो उसने गांव में खुद किताब से पढ़ा है । 

उसने हाथ उठाया और थोड़ा हिचकते हुए उत्तर देना शुरू किया,

“Sir... we can derive... from integration… the curve...” (सर, इंटीग्रेशन के द्वारा...  हम वक्र प्राप्त कर सकते हैं ... )
उसकी आवाज़ धीमी और  उच्चारण में संकोच भरा हुआ है।
एक और छात्र ने धीमे से कहा,“जिला टॉपर बोले तो इंग्लिश नहीं आती भाई को !”

पीछे की बेंच से किसी ने फुसफुसा कर कहा, “ओ तेरे… देसी accent (लहजा )  वाला टॉपर!”

हालाँकि प्रोफेसर ने सिर हिलाकर कहा,“Yes, your concept is right!” (हाँ, तुम्हारी अवधारणा सही है)  और  उस क्षण विक्रम को महसूस हुआ कि यह कॉलेज केवल ज्ञान का नहीं, आत्मविश्वास का भी खेल है।

दोपहर को मेस में जब खाना खाने गया तो उसने देखा कि लंबी कतार मेस के बाहर लगी है । सबके हाथ में कार्ड्स थे, खाने के लिए प्रीपेड कूपन। विक्रम को इस सिस्टम की जानकारी नहीं थी। उसने रिसेप्शन पर जाकर पूछा, “भैया, खाना कैसे मिलेगा?”

“पहले कूपन लेना होगा,” कर्मचारी ने कहा।

उसने एक महीने का कूपन लिया और चुपचाप सबसे पीछे जाकर लाइन में लग गया। 
खाने की प्लेट लेकर एक कोने में बैठा ही था कि दो छात्र उसके पास से गुज़रे। 

एक ने दूसरे से कहा, “नए वाले को देख, जैसे गांव से सीधा उतर आया हो।”
दूसरे ने हँसते हुए जोड़ा,“हाँ गांव का ही लगता है। ।”

विक्रम ने उनकी ओर देखा नहीं, न कोई जवाब दिया। उसका ध्यान दाल-चावल और सब्जी  की उस थाली में था जिसे वह घर से दूर पहली बार बिना माँ के खा रहा है। 

कॉलेज के माहौल में जहाँ ब्रांडेड शर्ट्स, स्नीकर्स और स्मार्टफोन्स आम बात थी वहीं विक्रम की सादगी किसी और युग की लगती थी। उसकी माँ ने सिलवाए दो साधारण पैंट-शर्ट , एक जोड़ी पॉलिश किए जूते और स्कूल टाइम का बस्ता, यही उसका परिचय है।

क्लास खत्म होने के बाद जब वो लाइब्रेरी की ओर गया, तो रास्ते में कुछ छात्र आपस में हँसते हुए कुछ कहते रहे। कुछ छात्र उसके पहनावे पर फुसफुसा कर हँसे। एक ने तो मुँह पर हाथ रखकर मज़ाक उड़ाया, “भाई, ये इंजीनियरिंग नहीं, बोधगया का छात्र लगता है!”

उधर विक्रम की आँखें केवल किताबें खोज रही हैं जिन्हें पढ़कर वह अपनी मेहनत के नोट्स संजोएगा।

रात की दीवारों पर मौन

हॉस्टल में रात 10 बजे के बाद कुछ  शांति हुई  लेकिन वह शांति बाहर की है  विक्रम के भीतर नहीं। वो अपना बिस्तर ठीक करता है।  माँ की तस्वीर को देखा और मौली का कार्ड निकालकर थोड़ी देर उसके शब्दों को पढ़ा। 
“जैसे आप पढ़ते हो, वैसे ही मुझे भी पढ़ाना।”
वह कार्ड रंगीन और मासूमियत से भरा है जैसे वह विक्रम से कह रहा  हो, “रुकना मत भैया, तू अकेला नहीं है।”

उसने अपनी डायरी निकाली, एक नया पेज खोला और शीर्षक लिखा,
“Day One: Battle Begins”

फिर उसने अपनी पहली दिन की क्लास के सारे पॉइंट्स दोबारा लिखे, नए शब्दों के लिए डिक्शनरी खोली और नोटबुक में लिखा,
“Laughs can’t break me. My roots are deeper than their jokes.”
(“हँसी मुझे तोड़ नहीं सकती। मेरी जड़ें उनके चुटकुलों से कहीं ज़्यादा गहरी हैं।”)

रात के एक बजे जब कमरे में बाकी सभी छात्र सो गए  विक्रम अब भी अपनी किताब में झुका हुआ है। उसके कानों में कुछ शब्द गूँजते रहे, “गाँव से आया है… देसी accent (लहजा ) वाला है…”
पर उन्हीं शब्दों के बीच उसे माँ की आवाज़ भी सुनाई दी, “बेटा, जहाँ बात बंद हो जाए, वहाँ मेहनत बोलती है।”
उसने मौली का कार्ड वापस डायरी में रखा, आँखें बंद कीं और एक गहरी साँस ली।
उस रात की शांति में, विक्रम ने कोई शिकायत नहीं की। कोई आँसू नहीं बहाए। वह सिर्फ़ पढ़ता रहा, उस उम्मीद में कि कल जब क्लास में फिर से खड़ा होगा, तो उसका जवाब सिर्फ़ सही नहीं होगा, बल्कि सटीक और स्पष्ट भी होगा बिना किसी हिचकिचाहट के.... 

कॉलेज के पहले दिन ने उसे सिखा दिया है  कि डिग्री केवल मार्कशीट से नहीं मिलती। उसके पीछे हर दिन की लड़ाई, हर ताने की चुपचाप जीत और हर रात की मेहनत शामिल होती है।
वह जानता है कि यह लड़ाई लंबी होगी लेकिन उसकी कमर कस ली है । गाँव की मिट्टी अब उसकी हड्डियों में है और माँ का विश्वास उसकी रीढ़ में।

अतीत से वर्तमान तक

तभी उसके कमरे में माँ और बाबा आ जाते हैं।  रमा उसे सोच में खोया जानकर वापिस जाने को होती है कि उनके क़दमों की आहट  से  विक्रम वर्तमान में लौट आता  है। 
"माँ, आप यहां! मैं थोड़ी देर में आपके रूम में आने वाला था। "
"हाँ बेटा, चलो बेटा खाना खा लो। "
"हाँ माँ  चलता हूँ ,आज मुझे भूख भी बहुत लगी है।"
चलते हुए वह बाबा से मुखातिब होता है," बाबा आज सभी कुछ ठीक से हो गया ना आप खुश तो हो ?"
मोहनलाल ने विक्रम के सिर पर हाथ रखकर डबडबाती आँखों से कहा," सब अच्छे से हो गया मेरी मौली को भी अच्छा लगा होगा।"
तीनों की आँखें नम हो आईं। 

इतने में वो डाइनिंग रूम तक आ पहुँचते हैं जहां आस्था भी उनका इंतज़ार कर रही है।  सभी  डाइनिंग रूम में आकर बैठते है। सर्विंग स्टाफ डिनर सर्वे करता है। बातें करते हुए  खाना खाते हैं फिर दिन भर के थके माँ बाबा सोने चले जाते हैं। विक्रम और आस्था भी सोने के लिए अपने-अपने कमरे में चले जाते हैं। 

अपने कमरे में आकर विक्रम  मौली की तस्वीर के पास जाता है। कमरे में अब भी सन्नाटा है। खिड़की के बाहर चाँदनी फैली है। वह सोचता है उस रात की बातें जब उसने मौली से वादा किया था कि एक दिन वह उसे भी पढ़ाएगा।

अब वह वादा किताबों के पन्नों से निकलकर एक इमारत बन चुका है - एकांश रीजनल सेंटर और मौली लर्निंग हब

विक्रम के हाथ में अब भी वह कार्ड है, थोड़ा फटा हुआ, किनारे मुड़ा हुआ… पर अक्षर जस के तस। उसे लगता है, जैसे कोई मासूम आवाज़ कान में कह रही हो,
“भैया, जैसे आप पढ़ते हो, वैसे ही मुझे भी पढ़ाना।”
वह उसे अपने वॉलेट (पर्स/बटुए))  में रखता है क्योंकि कुछ रिश्ते बस दिल के करीब रहते हैं चाहे वो लोग इस दुनिया में रहें या नहीं।

विक्रम अब तक खड़ा हो चुका है, कमरे की खिड़की खोलता है और दूर गाँव की ओर देखता है। वहां  कुछ बच्चों की हँसी सुनाई देती है जो अब मौली की तरह बिना डर के पढ़ सकते हैं।
वह हल्के से कहता है,
“नई ज़मीन तो मिल गई… अब नया आकाश बाँटना है।”

क्रमशः

विक्रम के साथ आगे क्या होता है?
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग...  भाग 19: शब्दों से संवाद तक
👉 आगे–पीछे के सभी भाग एक साथ यहाँ मिलेंगे - एक एकड़ से शिखर तक

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