एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 19: शब्दों से संवाद तक
अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 18: नई ज़मीन, नया आकाश पढ़कर शुरुआत करें।
भाग 19: शब्दों से संवाद तक
शहर में विक्रम का पहला सप्ताह बीत गया लेकिन वह सप्ताह कैलेंडर की तारीखों से नहीं, अनुभवों की गहराइयों से परखा गया। यहाँ हर दिन उसके लिए परीक्षा है , ना केवल एकेडेमिक बल्कि आत्मबल की भी। जहाँ कुछ छात्र नए वातावरण में जल्दी घुलमिल गए हैं वहीं विक्रम अब भी अपने भीतर सिमटा हुआ था।
कॉलेज के क्लासरूम्स, प्रयोगशालाएं, हॉस्टल के गलियारे और मेस की भीड़, सब कुछ उसके लिए नया है । वह अपने रूममेट्स शशांक और विवेक से धीरे-धीरे बात करने लगा है लेकिन उनके ग्रुप में शामिल होने की हिम्मत अभी नहीं जुटा पाया था। शशांक और विवेक उसकी मदद करने की कोशिश करते, बातें भी करते लेकिन विक्रम हर बार कुछ कहकर फिर खुद ही चुप हो जाता। जैसे अब भी अपने भीतर एक दीवार उठाकर बैठा हो उसने अपना दायरा जैसे निश्चित कर लिया हो।
क्लास में वह हमेशा सबसे आगे बैठता ध्यान से प्रोफेसर की हर बात सुनता, नोट्स को बड़ी संजीदगी से तैयार करता लेकिन जैसे ही जवाब देने की बारी आती उसका गला सूख जाता। अंग्रेज़ी के उच्चारण को लेकर उसकी हिचक अभी भी बनी हुई है। शब्द उसके दिमाग़ में साफ होते, लेकिन डर, संकोच और संदेह के कारण ज़ुबान पर आते-आते हिचकिचाहट में बदल जाते। इंग्लिश बोलते समय 'उसका उच्चारण सही बोल रहा हूँ कि नहीं ?', को लेकर उसकी झिझक अभी बनी हुई है।
शब्दों की साधना
“जैसे आप पढ़ते हो, वैसे ही मुझे भी पढ़ाना।”
यह वाक्य सिर्फ एक बहन की मासूम अभिलाषा नहीं है बल्कि वह विक्रम के लिए एक वादा है ।
उसी वादे को पूरा करने के लिए उसने एक छोटा-सा मिशन खुद से तय किया,
“हर दिन एक नया शब्द, हर दिन एक नई कोशिश।”
वह कॉलेज की लाइब्रेरी में अकेले बैठकर अंग्रेज़ी के अख़बार पढ़ने लगा। नई शब्दावली और कठिन शब्दों को एक अलग नोटबुक में लिखता, फिर शाम को हॉस्टल की छत पर जाकर उन शब्दों को जोर से दोहराता। वह शब्दों को सिर्फ़ पढ़ नहीं रहा है बल्कि खुद को भीतर से बदल रहा है जैसे अपने ही उच्चारण की दीवारें एक-एक कर तोड़ रहा हो।
असाइनमेंट और एक नई पहचान
पहले तो विक्रम को खुद भी यकीन नहीं हुआ। वह खड़ा हुआ, सबकी नज़रों का सामना किया और यह पहली बार है जब बिना किसी हिचकिचाहट के मुस्कराहट उसके चेहरे पर नज़र आई।
वही छात्र जो पहले उसका मज़ाक उड़ाते थे अब उसके पास आकर कहने लगे,
“भाई तेरे नोट्स चाहिए यार।”
“तू तो छा गया विक्रम!”
“तेरे दिमाग़ में जो चलता है, हम सोच भी नहीं सकते।”
“Bro, your notes… mind blowing yaar!”(भाई, आपके नोट्स... माइंड ब्लोइंग हैं यार!
“कहाँ से इतना लिखता है तू?”
“Concepts (अवधारणा) तू बिंदास पकड़ लेता है।”
लेकिन विक्रम अब भी चुप रहता है । वह जानता है यह अभी शुरुआत है। मंज़िल अभी बहुत दूर है और रास्ता लंबा।
पहला दोस्त
एक शाम वह लाइब्रेरी के कोने में बैठकर IEEE Journal (आई ई ई ई जर्नल) पढ़ रहा है तभी एक लड़का पास आकर बैठा। उसकी मुस्कराहट सहज है और आँखों में दोस्ती की गर्माहट।
“तुम विक्रम हो ना?” उसने पूछा।
विक्रम थोड़ा चौंका। पहले तो उसे संकोच हुआ, फिर धीरे से जवाब दिया,
“हाँ…”
लड़के ने हाथ बढ़ाया, “मैं आकाश! मैंने दो दिन पहले ही कॉलेज ज्वाइन किया है। मैं ECE (ई सी ई)में हूँ,तुम भी ECE में हो ना?”
विक्रम ने हाथ मिलाया।
आकाश ने मुस्कराकर कहा, “पता है? तुम्हारे टॉप करने की खबर पूरे सेक्शन में फैल गई है। मैं तुमसे पहले भी मिलना चाहता था लेकिन क्विज और असाइनमेंट पूरे करने में लगा हुआ था थोड़ा लेट ज्वाइन कर पाया हूँ ना मैं। अच्छा हुआ आज तुमसे मुलाकात हो गई।" आकाश की आँखों से सच्चाई झलक रही है
आकाश ने हाथ आगे बढ़ाया,
“मुझसे दोस्ती करोगे?”
विक्रम की आँखों में हल्की चमक आ गई।
उसने आकाश का हाथ थाम लिया। आकाश सिर्फ पहला दोस्त नहीं बना बल्कि शायद वह वो सेतु बनने वाला है जो विक्रम को बाकी सभी से जोड़ने का काम भी करने वाला है।
नई शुरुआत: डिबेट क्लब
इस प्रकार कुछ दिन और बीते। अब दोनों की दोस्ती गहराने लगी। ‘आप’ से ‘तू’ तक का सफ़र चुपचाप तय हो गया।
एक दिन आकाश ने सुझाव दिया,
“तू लिखता बहुत अच्छा है, लेकिन क्लास में बोल नहीं पाता। डिबेट क्लब चलें? वहाँ सब सीख रहे होते हैं, कोई हँसता नहीं, वहां कोई जज नहीं करता है।”
विक्रम को लगा शायद यही मौका है अपनेआप को और निखारने का।
अगले दिन शाम को दोनों डिबेट क्लब पहुँचे। वहां का माहौल उन्हें दोस्ताना लगा । हर कोई एक-दूसरे को सुधारता, गलती होने पर चिढ़ाता नहीं, मज़ाक नहीं बनाता है।
जब विक्रम की बारी आई तो वह घबराया। लेकिन आकाश ने पीछे से धीरे से कहा,
“तू बस बोल, हम सब गाँव से ही तो निकले हैं।”
विक्रम ने बोलना शुरू किया,
“Education in rural India... is not only a problem of schools, but also of mindset… we need not only buildings, but hope. Education in rural India… is not only about infrastructure, but also about inspiration. We need not just books, but belief. ”
( ग्रामीण भारत में शिक्षा पर एक अनुच्छेद अंग्रेजी में)
कमरे में तालियाँ बजीं। हाँ, उसकी अंग्रेज़ी में अब भी ग्रामीण स्पर्श है पर शब्दों में आत्मा बसती है।
अब विक्रम हर शाम डिबेट क्लब जाता और हर बार खुद को थोड़ा बेहतर पाता। TED Talks सुनता, अंग्रेज़ी बोलने का अभ्यास करता, नए शब्दों की प्रैक्टिस करता और उन्हें सही उच्चारण से बोलने का अभ्यास करता।
आकाश सिर्फ़ उसका दोस्त नहीं, उसका प्रतिबिंब बन गया जो विक्रम की कमज़ोरियों को नहीं, उसकी क्षमताओं को देखता है ।और विक्रम अब धीरे-धीरे उस अंधेरे से बाहर निकल रहा था जिसमें गाँव के बच्चे अक्सर खो जाते हैं।
एक रात जब विक्रम अपनी डायरी में दिनभर की बातें लिख रहा है उसने एक वाक्य लिखा:
“पहले दिन मैं चुप था, आज मैं सुना गया… कल मेरी बात सब सुनेंगे।”
उसने मौली के कार्ड को खोला और धीमे से पढ़ा,
“जैसे आप पढ़ते हो, वैसे ही मुझे भी पढ़ाना।”
उसने कार्ड के नीचे जोड़ा -
“मैं पढ़ना सीख रहा हूँ, अब बोलना भी सीख जाऊँगा।”
उसने अपने भीतर किसी चुप्पी को पहली बार हारते देखा।
क्रमशः
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग... भाग 20: पहली उड़ान, पहली पहचान
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