एक एकड़ से शिखर तक (धारावाहिक उपन्यास) – भाग 15: एक नई दिशा

अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा है तो भाग 14: छोटा सपना, बड़ा मोड़ पढ़कर शुरुआत करें।

भाग 15: एक नई दिशा

विदाई की रात

वो रात बाक़ी रातों से अलग है। घर में कोई त्योहार नहीं है फिर भी दिन में मौली ने दरवाज़े पर रंगोली सी सजाई है। रमा ने रसोई में बैठकर थोड़ा सा आटे का हलवा बनाया जो उसके पास उपलब्ध सामान में सबसे अच्छी चीज़ है।
विक्रम चुपचाप छत पर लेटा आकाश को देख रहा है। सितारे साफ़ दिख रहे हैं जैसे आसमान भी उसकी यात्रा की तैयारी में शामिल हो। नीचे बैठी रमा चुपचाप उसके लिए कुछ पुराने नोट गिन रही है और मौली ने अभी अभी कुछ बनाकर पेपर  रखा है।
“अब शहर जाने का वक़्त आ गया है, माँ…” विक्रम धीमे स्वर में कहता है।
रमा कुछ नहीं कहती, बस एक लंबा सन्नाटा कमरे में खिंच जाता है। फिर वह अपने आँचल से आँखें पोंछती है और कहती है, “जाना बेटा… पर खुद को मत छोड़ना। जैसे हो वैसे ही रहना।”
“भैया,” वो कहती है, “ये कार्ड मैंने खुद बनाया है। जब तुम थक जाओ तो इसे देख लेना… ताकत मिल जाएगी।”
मौली ने एक छोटा सा कार्ड बनाया है- “शुभ यात्रा भैया!” 
और उसमें छोटे छोटे फूल बनाये हैं  जिनमे लाल, नीला और पीला रंग भरा है। 
कार्ड के बीचोंबीच सुन्दर शब्दों में लिखा है-
“जैसे आप पढ़ते हो, वैसे ही मुझे भी पढ़ाना।”

विक्रम वो कार्ड किताबों के बीच रख लेता है मानो सपनों और ज़िम्मेदारियों के बीच एक पुल बन गया हो। विक्रम ने मौली की दी हुई राखी अपने बैग में रख दी। किताबों, कागज़ों और माँ के दिए पैसों के साथ वह पुराना छोटा बैग अब भारी लग रहा है, वज़न सपनों का है।

कुछ देर बाद विक्रम माँ के पास धीरे से आकर बैठता  है। माँ की आँखों में झपकती उम्मीद और चिंता साथ-साथ झलकती है। विक्रम मौली के पास जाता है। मौली मुस्कुरा रही है लेकिन उसकी नज़रों में एक मासूम सी बेचैनी है।

गाँव से विदाई

सुबह का सूरज जैसे धीरे-धीरे विदाई की घड़ी को करीब ला रहा था। स्टेशन पर रमा, मोहनलाल और मौली तीनों पहुंचे। मोहनलाल अब ज़्यादा चुप रहता है उसकी नज़रें ज़मीन पर हैं लेकिन दिल में बेटे को एक नई ऊँचाई पर देखने का गर्व भी है।

जल्दी ही  विक्रम तैयार होकर बाहर आया। माँ ने हल्दी- रोली अक्षत का तिलक किया, मौली ने पैर छुए। बिना ज़्यादा शब्दों के विदाई हो रही थी क्योंकि जो विदाई आँखों से दी जाती है वो ज़ुबान से कहने की ज़रूरत नहीं छोड़ती।

गाँव की पगडंडियां, पेड़, कुआँ, स्कूल का रास्ता, सब जैसे विक्रम को अपनी नज़रों में कैद करना चाह रहे हैं या विक्रम सभी नज़ारों को अपनी पलकों में कैद कर अपने साथ शहर ले जा रहा हों। स्टेशन पहुँचने तक रास्ते भर चारों ने ज़्यादा बात नहीं की लेकिन एक सन्नाटा लगातार साथ चल रहा था।

स्टेशन की वही पुरानी बेंच… वही चाय वाला जो थोड़ा अधेड़ उम्र का है । उसी बेंच पर सबने साथ बैठकर एक-एक कप चाय ली। रमा का हाथ विक्रम के कंधे पर है मौली उसकी गोद में सिर रखे बैठी है। मोहनलाल पास बैठा है।स्टेशन पर ट्रेन आने वाली है । प्लेटफॉर्म वैसा ही है हल्का टूटा, मिट्टी से सना और उम्मीदों से भरा।

ट्रेन की सीटी बजी

विक्रम उठता है, बैग कंधे पर टाँगता है वही बैग, जिसमें कुछ किताबें, एक पुराना बटुआ, माँ का दिया पैसों का लिफाफा और मौली का कार्ड रखा है और मौली की बाँधी राखी जो उसने अपनी किताबों के  पन्नों में रख ली है। 

मोहनलाल पहली बार आँख से आँख मिलाकर कहते हैं, “जा बेटा… अब तुझे देखने के लिए ये आँखें और भी इंतज़ार करेंगी।”
रमा उसका माथा चूमती है, “जो बनना चाहता है, बन… पर अपना बचपना  मत खो देना।”
विक्रम ट्रेन में बैठता है, खिड़की की ओर। ट्रेन धीमे-धीमे प्लेटफॉर्म से खिसकती है। मौली हाथ हिलती रहती है जब तक विक्रम दिखाई पड़ता है। 
वो गांव को देखता है....वो पेड़, वो स्कूल, वो टूटी पगडंडी, हर चीज़ मानो एक तस्वीर की तरह उसके मन में उतर रही है।

अब ट्रेन रफ़्तार पकड़ चुकी है लेकिन दिल में एक नयी यात्रा की शुरुआत हो चुकी है....एक दिशा, जो सिर्फ शहर नहीं, गाँव को भी रोशन करेगी।

ट्रेन की खिड़की के पास बैठकर विक्रम ने जब गाँव को देखा तो सब कुछ धीमा लगने लगा। जैसे समय थम गया हो। उसने बैग से मौली की राखी निकाली, उस पर उँगली फिराई और मन ही मन कुछ बुदबुदाया,
“मैं जा रहा हूँ, लेकिन लौटूँगा ज़रूर… माँ के खेत के लिए, मौली के स्कूल के लिए… और हर उस बच्चे के लिए जिसके पास सपने हैं पर साधन नहीं।”

ट्रेन ने सीटी दी। खिड़की से बाहर की हवा अब नए शहर की ओर बह रही है । गाँव कहीं  पीछे छूट रहा है लेकिन उसकी मिट्टी अब भी विक्रम के मन में साथ है। 

ट्रेन आगे बढ़ रही है तभी विक्रम ने अपनी जेब से वो स्कॉलरशिप का पत्र निकाला। उस पर लिखा है ,
"श्री विक्रम चौधरी - राज्य स्तरीय छात्रवृत्ति योजना के पात्र।"
ये सिर्फ़ एक सरकारी घोषणा नहीं है ये एक माँ की वर्षों की तपस्या का प्रमाण है।
एक और कागज जो  विक्रम का सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज का एडमिशन का कन्फर्मेशन लेटर है उसे भी साथ ही मोड़कर अपने बटुए में रख दिया।  

ट्रेन में बैठे-बैठे उसने अपनी डायरी निकाली और पहला वाक्य लिखा -
“यह शुरुआत है... उस सफ़र की, जो एक एकड़ ज़मीन से शुरू होकर लाखों ज़िंदगियों तक पहुँचेगा।”

ट्रेन की रफ्तार अब बढ़ गई थी, जैसे सपने पंख फैलाने लगे हों।
गांव अब पीछे रह गया....पर छूटा नहीं है ।
माँ की आँखें, मौली की राखी, गाँव के ताने, स्कूल की सीढ़ियाँ, खेत की मेड़ और बाबूजी की टूटी परछाईं से लेकर आशावादी निगाहें , सब इस सफ़र में उसके साथ चल पड़े।
विक्रम ने खिड़की की ओर देखा, ट्रेन धड़धड़ाती हुई अपने अगले स्टेशन की ओर बढ़ गई जैसे ज़िंदगी अगले अध्याय की ओर जा रही हो—एक नई दिशा की ओर...

तभी स्टेशन पर 

अनाउंसमेंट के साथ ही एक ट्रेन धड़धड़ाती हुई  प्लेटफार्म पर आकर रूकती है। ट्रेन की सीटी के साथ विक्रम की वर्तमान में वापसी होती है।  स्टेशन की वही बेंच पर बैठा विक्रम कार्ड को फिर से हाथ में लेता है। उसे लगता है जैसे वक़्त ने उस कार्ड में मौली की आवाज़ कैद कर दी हो। विक्रम उठता है, कार्ड को सीने से लगाता है ओर चल पड़ता है। सामने से उसे आस्था आती हुई दिखाई देती है। सामान्य अभिवादन के पश्चात वो दोनों स्टेशन से बाहर निकलते हैं। स्टेशन के बाहर एक कार उसका इंतज़ार कर रही है उनके बैठते ही कार चल पड़ी। कार की मंज़िल गांव का एकमात्र विश्राम गृह (रेस्ट हाउस) है।  

क्रमशः 
आगे के भाग में रीजनल सेंटर के उद्घाटन के साथ ही खुलेगा एक भयानक राज़.... क्या  है वो रहस्य ?
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग भाग 16: मौली लर्निंग हब — एक सपना, एक रहस्य
जो जल्द ही आपके सामने होगा, एक और भावनात्मक मोड़ के साथ।
👉 इस उपन्यास के सभी भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - एक एकड़ से शिखर तक

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